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रात की गोद में शाम पड़ी है, दरिया लिपटा हुआ है पीपल से

सुर्खियों से आगे : रात की गोद में शाम पड़ी है, दरिया लिपटा हुआ है पीपल से #surkhiyonseaage #column #navneetgurjar #DainikBhaskar

3.1.2020

सुर्खियों से आगे : रात की गोद में शाम पड़ी है, दरिया लिपटा हुआ है पीपल से surkhiyonseaage column navneetgurjar DainikBhaskar

कड़ाके की ठंड है। सूरज भी डर रहा है। कभी वह बादलों का घूंघट डाले रहता है, तो कभी कोहरे की चादर ओढ़ कर सोया रहता है। जागता भी है तो लगता है बादलों की बेंच पर बैठकर किसी याददाश्त की तरह गूंजती उदासी के लंबे-लंबे घूंट भर रहा हो। | surkhiyon se aage column by navneet gurjar

नवनीत गुर्जर Jan 03, 2020, 12:12 AM IST कड़ाके की ठंड है। सूरज भी डर रहा है। कभी वह बादलों का घूंघट डाले रहता है, तो कभी कोहरे की चादर ओढ़ कर सोया रहता है। जागता भी है तो लगता है बादलों की बेंच पर बैठकर किसी याददाश्त की तरह गूंजती उदासी के लंबे-लंबे घूंट भर रहा हो। ज्यादा भावुक होता है तो आंसू भी निकल आते हैं। हम लोग उसे मावठा कहते हैं। फसलों के लिए अच्छा भी। ख़राब भी। मतलब फसल गेहूं की हो तो अच्छा और अगर चने की हो तो सूरज के आंसू सीधे किसान की आंखों में दिखाई देने लगते हैं। धरती पर ठंड के अलग-अलग रूप हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रभाव भी। कहीं रात की गोद में शाम पड़ी सिसक रही है। कहीं दरिया लिपटा हुआ है पीपल से और ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ें मार रहा है। ... और कहीं पहाड़ियों के सीने पर पहली-पहली घास उगी है। हे! ठंड तुम कहां से उपजी हो। तुम्हारी दृष्टि झक सफ़ेद। दैत्यमय भी। देवमय भी। तुम्हारी आंखों में, भोर भी और सांझ भी। तुम्हारी सुगंध, जैसे सांझ की आंधी। तुम्हारे होंठ, जैसे करेले का घूंट। तुम एक हाथ से ख़ुशी बीजती हो और दूसरे हाथ से तबाही। जैसे सपने जम जाते हैं, पत्तों पर ओस की बूंदें पड़ी जम रही हैं। कई राज्यों में तो खेतों में लहलहा रही फसलों की कतारों के बीच की ‘नो मेन्यू लैंड’ को बर्फ़ ने हथिया लिया है। किसान इस बीचोबीच की घास को न छू सकता, न उखाड़कर फेंक सकता। वैसे तो धरती, आसमान सब नौ-नौ हैं लेकिन ठंड के जमाने में दो-दो आसमान दिखते हैं। कहीं असली, कहीं कोहरे वाला आसमान। कोहरे वाला आसमान लोगों की जान का दुश्मन बना बैठा है। ख़ासकर, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब में। भाई लोग फिर भी नहीं मानते। सौ से नीचे कोई गड्डी चलाने को तैयार ही नहीं होता। राजस्थान धूज रहा है। जैसे नेशनल रजिस्टर की सारी गाज यहीं गिरने वाली हो। उत्तर प्रदेश ठिठुर रहा है। जैसे प्रदर्शनों के दौरान हुई तबाहियों का सारा हिसाब योगीजी अचानक आई ठंड से ही वसूलने वाले हों। बहरहाल, ठंड ज़बर्दस्त है और विपक्ष के खिलाफ तमाम हथियार खोल देने वाली केंद्र सरकार ने भी कंबल ओढ़ लिया है। उधर, विपक्ष भी सड़क से घर में सिमट गया है। जैसे दांतों के बीच जीभ सिमटी रहती है। दिल्ली में ठंड है, लेकिन केजरीवाल का कंबल उतर गया है। वे लगातार लोगों के लिए काम कर रहे हैं। चुनाव इसी साल हैं और भाजपा या कांग्रेस की अब यहां वैसी हैसियत नहीं रही, जैसी पांच साल पहले हुआ करती थी। दिल्ली वाले आप के भरोसे ही ख़ुश लग रहे हैं। ख़ैर मिट्टी डालिए इन राजनीतिक बातों को, कड़ाके की ठंड के इन दिनों में भी ठंडे पानी से नहाने वालों से पूछिए उनके हाल! साफ़-साफ़ कहने लगते हैं- हे ठंड! तुम्हारे गहनों की छटा कितनी भयानक! तुम्हारा आलिंगन! जैसे कोई कब्र में उतरता जाए!! और पढो: Dainik Bhaskar

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कोई शराबी होगा 😁😁

ग्रेटा थनबर्ग के पिता- 'वो ख़ुश है, पर मुझे चिंता होती है'जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के पिता किस बात से हैं चिंतित? जबरदस्ती हीरो बनाना इसे कहते हैं रंग भेद और चाटुकारिता की दुनिया मे। कुछ भी करलो पर कोई फर्क नहीं पडेगा। राजकर्ताओं को कोई चिंता नहीं हैं और लोग पैसों के गुलाम हो गये हैं। जबतक मौत सामने नहीं आयेगी तब तक सुधरेंगे नहीं।

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नए साल के जश्न ने बिगाड़ी दिल्ली-एनसीआर की हवा, आज से छंट सकता है प्रदूषणनए साल के जश्न के बाद बुधवार को दिल्ली-एनसीआर की हवा गंभीर स्तर पर रही। लेकिन आज से इसमें सकारात्मक परिवर्तन आने का अनुमान है। pollution DelhiPollution weather fog delhiairquality What about ban on new year crackers? Or its not polluting air? Anyone? इस वक़्त मीडिया, बुद्धिहीन समाज, सेलिब्रिटी सब आंखें मूंदे हैं।। दीवाली पर ही इनकी आंखें खुलती हैं।

क्या सरकार प्रदर्शनकारियों से नुक़सान की भरपाई करवा सकती है?अदालतें कह चुकी हैं कि नुक़सान के पैसे प्रदर्शनकारियों से वसूले जाएं लेकिन सरकारें इन निर्देशों की व्याख्या अपने-अपने तरीक़े से करती हैं. नहीं करवा सकती क्योंकि व्यवस्था के लिए सरकार जिम्मेदार हैं और अनहोनी के लिए प्रशाशन! Yes 100% कोई सक हैं बिकाऊ मीडिया

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