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नॉलेज पैक: अमेरिका ने तालिबान बनाया और इजराइल ने हमास; आखिर इस संगठन को मदद और पैसा कहां से मिलता है, जानिए सबकुछ

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14-05-2021 08:02:00

नॉलेज पैक: अमेरिका ने तालिबान बनाया और इजराइल ने हमास; आखिर इस संगठन को मदद और पैसा कहां से मिलता है, जानिए सबकुछ America Taliban Israel hamas

‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय’। यह मुहावरा या कहावत ज्यादातर लोगों ने सुनी होगी। अब मुद्दे पर आते हैं। इजराइल और फिलीस्तीन के बीच जंग जारी है। फिलीस्तीनी जमीन से हमास (इजराइल और पश्चिमी देश इसे आतंकी संगठन बताते हैं) इजराइल पर हजारों रॉकेट दाग रहा है। जवाब में इजराइल हवाई हमले कर रहा है। इजराइल में 8 और हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी में 88 लोग मारे जा चुके हैं। दुनिया अमन बहाली की कवायद शुर... | Israel US; Who Is Funding Hamas Taliban ? All You Need To Know: हमास ने फिलीस्तीन के लिबरल लीडरशिप को धीरे-धीरे किनारे कर दिया और खुद फिलीस्तीन आंदोलन का झंडाबरदार बन गया।

Israel US; Who Is Funding Hamas Taliban? All You Need To KnowAds से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐपनॉलेज पैक:अमेरिका ने तालिबान बनाया और इजराइल ने हमास; आखिर इस संगठन को मदद और पैसा कहां से मिलता है, जानिए सबकुछतेल अवीव/वॉशिंगटन

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5 घंटे पहलेकॉपी लिंक‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय’। यह मुहावरा या कहावत ज्यादातर लोगों ने सुनी होगी। अब मुद्दे पर आते हैं। इजराइल और फिलीस्तीन के बीच जंग जारी है। फिलीस्तीनी जमीन से हमास (इजराइल और पश्चिमी देश इसे आतंकी संगठन बताते हैं) इजराइल पर हजारों रॉकेट दाग रहा है। जवाब में इजराइल हवाई हमले कर रहा है। इजराइल में 8 और हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी में 88 लोग मारे जा चुके हैं। दुनिया अमन बहाली की कवायद शुरू कर चुकी है। ये अब तक की कहानी का लब्बोलुआब है।

जो लोग इजराइल-फिलीस्तीन विवाद से ज्यादा वाकिफ नहीं हैं, उनके लिए हमास नया नाम है। इजराइल इसकी तुलना अलकायदा और इस्लामिक स्टेट (ISIS)से करता है। लेकिन, सच्चाई ये है कि हमास को जन्म देने वाला इजराइल ही है। ठीक वैसे ही, जैसे तालिबान को अमेरिका ने खड़ा किया। फिर तालिबान की मदद से अलकायदा बना। दोनों मामलों में एक चीज कॉमन है, और वो ये कि तालिबान हो या हमास- ये उन देशों के लिए ही मुसीबत बन गए, जिन्होंने इन्हें खड़ा किया। headtopics.com

अरब-इजराल की पुरानी दुश्मनीअरब देशों और इजराइल की दुश्मनी बहुत पुरानी है। 1948 में इजराइल दुनिया के नक्शे के तौर पर एक अलग देश बना। अमीर मुस्लिम देशों से घिरा इजराइल में यहूदियों की तादाद सबसे ज्यादा है। कुछ क्षेत्रों में अरब मूल के फिलीस्तीनी भी हैं। कई साल तक ये अमन से रहे, लेकिन इन दिनों इजराइल के यहूदियों और अरब लोगों में दंगे हो रहे हैं। वक्त के साथ इजराइल इतना ताकतवर हो गया कि आज मजबूरी में ही सही अरब देश उसके सामने घुटने टेक रहे हैं।

हमास: कैसे और क्यों बनाबहरहाल, इजराइल के जन्म के बाद भी फिलीस्तीन से उसका संघर्ष हर स्तर पर जारी रहा। फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात का भारत में भी काफी सम्मान रहा है। वो इंटरनेशनल फोरम्स पर ताकतवर थे। इजराइल को जब लगा कि डिप्लोमैटिक लेवल पर वो फिलीस्तीन के सामने कमजोर पड़ रहा है, तो 1970 के दशक आखिर में उसने फिलीस्तीन के एक कट्टरपंथी संगठन को उदारवादी फिलीस्तीनी नेताओं के विरोध में खड़ा कर दिया। इसको नाम दिया गया हमास। हालांकि, हमास की औपचारिक स्थापना 1987 में मानी जाती है।

theintercept.com के मुताबिक, इजराइल के पूर्व जनरल यित्जाक सेजेव ने कहा था- जहर से जहर मारने की यह नीति एक ऐतिहासिक गलती थी। इजराइली सरकार ने मुझे हमास के लिए बजट भी दिया था। इसका अफसोस हमें आज भी है। सेजेव 1980 के दशक में गाजा के गवर्नर भी रहे।इजराइल के मुताबिक, हमास में करीब 27 हजार लोग हैं। इन्हें आर्म्ड फोर्स के सैनिकों जैसी ट्रेनिंग दी गई है। (फाइल)

हमास की ताकत कैसे बढ़ती गईहमास ने फिलीस्तीन के लिबरल लीडरशिप को धीरे-धीरे किनारे कर दिया और खुद फिलीस्तीन आंदोलन का झंडाबरदार बन गया। इसमें 90% युवा फिलीस्तीनी हैं। एक रोचक तथ्य यह है कि हमास को ज्यादतर मुस्लिम देश ‘पत्थरों से जंग लड़ने वाला संगठन’ कहते हैं। लेकिन, सच्चाई क्या है? ये आप इन दिनों जारी जंग में देख सकते हैं। उनके पास हजारों रॉकेट भी हैं और लॉन्चर भी। आधुनिक हथियार भी हैं फॉरेन फंडिंग भी। लेकिन, ये भी सही है कि ये अब भी इजराइल की ताकत के सामने ये बिल्कुल बौने हैं। headtopics.com

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कहां से मिलती है फंडिंगtime.com ने 2014 में हमास पर एक स्पेशल रिपोर्ट पब्लिश की थी। इसमें कहा गया था- हमास को अब भी कुछ अरब देश चोरी-छिपे मदद कर रहे हैं। तुर्की और कतर से इसे पैसा मिलता है। हमास के एक नेता खालिद मेशाल ने तो कतर में इसका दफ्तर भी खोला था। वो तालिबान और मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए भी यही कर चुका है। पाकिस्तान के कुछ जानकार दावा करते हैं कि ईरान भी हमास को हथियार और पैसा देता है। हालांकि, ईरान शिया मुल्क है, जबकि अरब वर्ल्ड सुन्नी है। लेकिन, हो सकता है कि इजराइल और अमेरिका पर अपने एटमी प्रोग्राम को मंजूरी देने के लिए ईरान दबाव बनाना चाहता हो, और इसीलिए वो हमास के कंधे पर रखकर बंदूक चला रहा हो।

ये इसलिए भी मुमकिन है क्योंकि इजराइल और अमेरिका ने ईरान के जनरल सुलेमानी समेत कुछ और अहम लोगों की हत्यायें की थीं। ईरान ने इसका बदला लेने की धमकी दी थी। जो भी हो, इतना तो तय है कि हमास को कुछ देश फंडिंग कर रहे हैं। इजराइल और अमेरिका के डर से ये खुलकर कुछ नहीं बोलते।

अमेरिका बनाम तालिबानसोवियत संघ (बाद में इसका विभाजन हो गया) ने 1978 में अफगानिस्तान पर कब्जे की कोशिश की। स्थानीय लोगों से संघर्ष चलता रहा। तब अमेरिका ने पाकिस्तान के तब के तानाशाह जनरल जिया उल हक के साथ मिलकर अफगानिस्तान के कुछ लड़ाकों को इकट्ठा किया। उन्हें तगड़ी फंडिंग की। 1994 में एक नया संगठन बना- तालिबान। 2001 में 9/11 के हमलों के बाद अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान में एंट्री हुई। 20 साल बाद भी अमेरिका इसी तालिबान से लड़ रहा है, उससे बातचीत कर रहा है।

फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन के पूर्व प्रमुख यासिर अराफात के साथ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। (फाइल)हमास एक नजर मेंसंगठन:‘टाइम्स ऑफ इजराइल’ के मुताबिक, हमास में करीब 27 हजार लोग हैं। इन्हें 6 रीजनल ब्रिगेड में बांटा गया है। इसकी 25 बटालियन और 106 कंपनियां हैं। इनके कमांडर बदलते रहते हैं। headtopics.com

विभाग :हमास में 4 विंग हैं। मिलिट्री विंग के चीफ हैं- इज अद-दीन अल कासिम। पॉलिटिकल विंग की कमान इस्माइल हानिया के हाथों में हैं। इस विंग में नंबर दो पर हैं मूसा अबु मरजूक। एक और नेता हैं खालिद मशाल। इंटरनेशनल अफेयर्स के लिए यह मुस्लिम ब्रदरहुड पर निर्भर है। एक सोशल विंग भी है।

पॉलिटिकल एजेंडा :इजराइल के उन हिस्सों पर कब्जा करना, जिनमें ज्यादातर फिलीस्तीनी हैं। एक स्वतंत्र देश के रूप में खुद को स्थापित करना।अब तक क्या हासिल:कई साल बाद अब हमास इजराइल को परेशान कर पाया है। इसके सदस्य आम लोगों की भीड़ में शामिल होकर इजराइली सैनिकों पर हमले करते हैं। इजराइल की ताकत के चलते अब ज्यादा मदद नहीं मिल पा रही। हर बार झड़प में हमास को ही नुकसान हुआ। इस बार भी उसके 6 कमांडर मार गिराने का दावा इजराइल की तरफ से किया गया है।

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भारत की नीतिभारत और इजराइल के बीच डिप्लोमैटिक रिलेशन 1992 में बने। हालांकि, अनौपचारिक रिश्ते पहले भी थे। भारत ने हमेशा फिलीस्तीन की मांगों का समर्थन किया। 1988 में फिलीस्तीन को राज्य के तौर पर मान्यता भी दी। लेकिन, बदलते वक्त के साथ यह नीति इजराइल के पक्ष में झुकती चली गई। 2014 के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग बहुत तेजी से बढ़ा। फरवरी 2018 में जब नरेंद्र मोदी इजराइल गए तो फिलीस्तीन का दौरा भी किया। भारतीय विदेश मंत्रालय हमास शब्द के जिक्र से परहेज करता रहा है। इसके बजाए वो इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष को शांति से हल करने पर जोर देकर संतुलन बनाने की कोशिश करता है।

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पिछले एक साल में हमने चीन की नीयत देख ली, चीन की फितरत देख ली. लेकिन भारत की ताकत भी सबने देखी. फिर चाहे बात बॉर्डर पर आमने-सामने के टकराव की हो या फिर सेना को मजबूत बनाने की हो, या फिर चीन के खिलाफ हमेशा तैयारी करते रहने की सोच की हो, भारत ने कभी अपनी तैयारियों में कोई कमी नहीं की. भारत ने इस एक साल में सबसे ज़्यादा उन बातों पर ध्यान दिया, जो चीन के सामने हमेशा हमारी कमज़ोरी रही. जैसे बॉर्डर के इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर का चीन के मुकाबले कमज़ोर होना. चीन हमेशा इस कोशिश में रहता था कि बॉर्डर पर भारत अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत ना कर पाए. क्योंकि उसे डर था कि इससे भारत का रणनीतिक दबदबा बढ़ जाएगा. इसी वजह से उसने पहले डोकलाम और फिर पिछले साल गलवान से लेकर लद्दाख बॉर्डर पर टकराव किया. ये टकराव आज भी खत्म नहीं हुआ, लेकिन एक साल में बॉर्डर पर खेल पूरी तरह से पलट गया है. भारत ने सुपर फास्ट स्पीड में इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार किया है. सड़कें बनाई हैं, पुल बनाए हैं, रणनीतिक रास्ते तैयार किए हैं. और ये सब चीन के बड़े चैलेंज के बीच किया गया जो अपने आप में चीन के लिए करारा जवाब है. देखें खबरदार.

Matalab Musalmaan Bewkoof hai... Koi bhi inka istemaal kar saktaa hai...hai na...? Isko paisa milta hai iran deta hai paise weapon, lebanon deta hai weapons, syria deta hai and russian weapons bhi hain inke pass khane peene ke kiye paise nahi hai gareeb hain yeh gaza wale lekin ladne ke liye full ready ever ready. Turkey ko bhool gaya sbse baada support

Matalab Musalmaan Bewkoof hai... Koi bhi inka istemaal kar saktaa hai...hai na...? तालिबान - हमास- ISIS सभी एक ही बिरादरी संगठन : मरने - मारने वाले एक ही समुदाय के । दुनिया के आधी आबादी इनकी लेकिन किसी भी देश मे शांति नही यह सब उन राष्ट्रों का कमाल है जो अपने हथियार बनाते हैं और भेजते हैं यही उनको हथियार सप्लाई कर आते है ताकि उनके तैयार ज्यादा से ज्यादा बिक सके

mishra5051 Or tum ne Dalali kiya

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