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कोरोना से बच्चों पर असर की ग्राउंड रिपोर्ट: स्मार्टफोन न होने से गांव का हर तीसरा बच्चा पढ़ाई से महरूम, शहरी बच्चों में मेंटल हेल्थ बड़ी समस्या

कोरोना से बच्चों पर असर की ग्राउंड रिपोर्ट: स्मार्टफोन न होने से गांव का हर तीसरा बच्चा पढ़ाई से महरूम, शहरी बच्चों में मेंटल हेल्थ बड़ी समस्या

16-09-2021 18:00:00

कोरोना से बच्चों पर असर की ग्राउंड रिपोर्ट: स्मार्टफोन न होने से गांव का हर तीसरा बच्चा पढ़ाई से महरूम, शहरी बच्चों में मेंटल हेल्थ बड़ी समस्या

कोविड के चलते पिछले 18 महीनों में स्कूली बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। शहरी इलाकों में तो कुछ हद तक डिजिटल लर्निंग की सुविधाएं ज्यादा रहीं, लेकिन गांवों में खास करके सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सिर्फ कागजों पर ही 2 क्लास आगे बढ़े हैं, असल में वे कुछ भी नया नहीं सीख पाए हैं। डिजिटल डिवाइड की इस हकीकत को समझने के लिए दैनिक भास्कर शहरी और ग्रामीण इलाकों में ग्राउंड जीरो पर पहुंचा।... | Uttar Pradesh School Reopening Ground Report ऑनलाइन क्लास के लिए रोजाना लिंक भेजे जाते हैं जिन पर सवेर रोजाना क्लास कर रहे हैं। हर तरह की सुख सुविधाओं से लैस हैं, कंप्यूटर, मोबाइल, आइपैड, फास्ट स्पीड इंटरनेट।

कोविड के चलते पिछले 18 महीनों में स्कूली बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। शहरी इलाकों में तो कुछ हद तक डिजिटल लर्निंग की सुविधाएं ज्यादा रहीं, लेकिन गांवों में खास करके सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सिर्फ कागजों पर ही 2 क्लास आगे बढ़े हैं, असल में वे कुछ भी नया नहीं सीख पाए हैं। डिजिटल डिवाइड की इस हकीकत को समझने के लिए दैनिक भास्कर शहरी और ग्रामीण इलाकों में ग्राउंड जीरो पर पहुंचा। इसके लिए हमने दिल्ली से करीब 80 किमी दूर UP के हापुड़ जिले के पूठा हुसैनपुर गांव और नोएडा के एक शहरी इलाके को चुना। वहां के पैरेंट्स, टीचर्स और बच्चों से बात की।

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आइए पहले हापुड़ चलते हैं...हापुड़ जिले में स्थित पूठा हुसैनपुर दलित बहुल गांव है। यहां ज्यादातर परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ने जाते हैं। गांव के सरकारी स्कूल में जैसे ही हम दाखिल हुए वैसे ही बच्चों की हंसी-ठिठोली, शोर-शराबा हमारे कानों में गूंजने लगा। इसी गांव की रहने वाली 9 साल की महक चौथी क्लास में पढ़ती है और पिछले 18 महीने में एक भी दिन स्कूल नहीं गई है। घर पर इतनी गरीबी है कि दो वक्त के भोजन के लिए मां-पिता को संघर्ष करना पड़ता है।

लवेश जाटव पिछले 18 महीने में महज दो चार दिन ही स्कूल जा पाए हैं। उनके पापा मजदूरी करते हैं, स्मार्टफोन खरीदने के पैसे नहीं हैं।महक की मां सरिता बताती हैं,"बेटी महक चौथी क्लास में पहुंच गई है, लेकिन उसे कुछ नहीं आता है। मास्टरों ने पता नहीं इसे कैसे चौथी क्लास में पहुंचा दिया। हमारे घर में कॉल करने वाला फोन तक नहीं है। मेरी बेटी के दो साल पूरी तरह से खाली चले गए।" headtopics.com

इसी तरह लवेश जाटव पिछले 18 महीने में महज दो चार दिन ही स्कूल जा पाए हैं। 12 साल के लवेश चार भाई बहन हैं। 6 लोगों के परिवार में सिर्फ एक मोबाइल फोन है। वह भी बिना इंटरनेट वाला। पिछले साल जब लॉकडाउन लगा तो लवेश 6वीं में थे। अब जब दूसरी लहर के बाद जब स्कूल खुले हैं, तो कागजों पर वे आठवीं क्लास में आ चुके हैं, लेकिन 7वीं क्लास में कुछ भी नहीं सीख सके हैं।

लवेश बताते हैं कि स्कूल के टीचर कहते थे कि अपने पिता से स्मार्टफोन खरीदने की जिद करो, लेकिन हमारे पापा दिहाड़ी मजदूर हैं, उनकी हैसियत स्मार्टफोन खरीदने की नहीं थी। अब लवेश फिर से स्कूल जाने लगे हैं और अभी पुरानी ही क्लास की चीजें सीख-समझ रहे हैं।ज्यादातर बच्चों को पुरानी क्लास की चीजें ही रिवाइज कराई जा रहीं

पूठा हुसैनपुर गांव के स्कूल में 256 बच्चे पढ़ते हैं। ज्यादातर बच्चे दलित और गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। स्कूल आने के अलावा उनके पास पढ़ाई का कोई जरिया नहीं है।8वीं तक लगने वाले इस स्कूल के हेडमास्टर राजकुमार शर्मा बताते हैं कि उनके स्कूल में 256 बच्चे पढ़ते हैं। कोविड संकट की वजह से पिछले 18 महीनों में उनका स्कूल सिर्फ डेढ़ महीने ही लग सका, वह भी कई प्रतिबंधों के साथ। स्कूल के सिर्फ 50% बच्चे ही थोड़ी बहुत पढ़ाई कर पाए हैं। बच्चों का पढ़ाई का स्तर पहले के मुकाबले भी गिर गया है। अभी हम पिछला रिवीजन ही करा रहे हैं, नया पढ़ाना तो अभी दूर की बात है। आठवीं क्लास में पढ़ने वाला बच्चा छठवीं क्लास के स्तर का भी नहीं है, उसे जो कुछ आता था 2 साल में वह भी भूल गया है। अब उनको सब पुराना ही पढ़ा रहे हैं।

हुसैनपुर के इसी स्कूल में पढ़ाने वाली राधा शर्मा 6वीं की क्लास टीचर हैं। राधा अपने छात्रों को गणित और विज्ञान पढ़ाती हैं। वे बताती हैं कि पिछले डेढ़ साल में बच्चों की पढ़ाई पर बहुत ज्यादा असर पड़ गया है। इस वक्त में लर्निंग गैप बहुत ज्यादा हो गया है। हमारी प्राथमिकता है कि हम लर्निंग गैप को भरें। इसके बाद बच्चों की बुनियादी भाषा और अंक ज्ञान सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। जो बच्चा 8वीं में हैं, उसको हम 6वीं क्लास की चीजें भी रिवाइज कराते हैं और साथ में 8वीं क्लास की भी कुछ-कुछ नई चीजें बताते हैं। headtopics.com

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हुसैनपुर के इसी स्कूल में पढ़ाने वाली राधा शर्मा 6वीं की क्लास टीचर हैं। वे बताती हैं कि बच्चों के बीच लर्निंग गैप ज्यादा हो गया है। इसे अब हम कम करने की कोशिश कर रहे हैं।अब चलते हैं डिजिटल इंडिया की तरफ...नोएडा में रहने वाले 10 साल के सवेर अरोड़ा एक कॉन्वेंट स्कूल में 6वीं क्लास में पढ़ते हैं। पिछले डेढ़ साल में सिर्फ 4 दिन ही वे स्कूल गए हैं। हालांकि इस दौरान वे अपने स्कूल और टीचर्स से डिजिटल माध्यमों के जरिए कॉन्टैक्ट में रहे हैं। कंप्यूटर, मोबाइल, आइपैड और फास्ट स्पीड इंटरनेट जैसी हर तरह की सुख सुविधाओं से लैस हैं। प्रॉपर क्लासेज, होमवर्क, असाइनमेंट्स, प्रोजेक्ट स्कूल की तरफ से हर चीज कराई जाती है।

सवेर बताते हैं कि सब कुछ होने के बावजूद कई बार इंटरनेट की स्पीड घट जाती थी। कई बार टीचर की बात ठीक से सुनाई नहीं देतीं। सवेर लगातार घर में रहकर ऑनलाइन लर्निंग से परेशान भी हो गए हैं। वे जल्द से जल्द पहले की तरफ स्कूल जाना चाहते हैं, अपने पुराने दिनों में लौटना चाहते हैं।

सवेर के बड़े भाई प्रवीर उसी स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ते हैं। वे बताते हैं कि मैंने पिछले डेढ़ साल में उन्होंने काफी सारी नई चीजें सीखी हैं। स्कूली पढ़ाई के अलावा दूसरे स्टडी प्रोजेक्ट और प्रैक्टिकल लर्निंग की तरफ उनका रुझान बढ़ा है। हाल में ही उन्होंने 3D तकनीक से जुड़े लेक्चर्स का फायदा भी उठाया है।

शहरी क्षेत्रों में पढ़ाई भले ज्यादा प्रभावित नहीं हुई, लेकिन बच्चों के मेंटल हेल्थ पर असर पड़ा हैप्रवेर और सवेर के पिता अमित अरोड़ा का प्रिंटिंग का कारोबार है। वे बताते हैं कि- पिछले दो साल में बच्चों की जिंदगी पर बहुत ज्यादा असर हुआ है। पढ़ाई करने के लिए तो फिर भी डिजिटल तरीके हैं, लेकिन बच्चों का खेल-कूद बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ है। बच्चों की मेंटल हेल्थ पर बुरा असर हुआ है। headtopics.com

स्कूल चिल्ड्रन्स ऑनलाइन एंड ऑफलाइन लर्निंग (SCHOOL) सर्वे के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 37% स्कूली बच्चे कोविड संकटकाल में बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं कर सके हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में रहने वाले सिर्फ 8% छात्र ही डिजिटल तरीकों से पढ़ाई कर सके हैं। ये सर्वे अगस्त 2021 में देश के 15 राज्यों में किया गया जिसमें 1362 लोगों ने हिस्सा लिया। सर्वे के मुताबिक आधे बच्चे कुछेक शब्दों से ज्यादा नहीं पढ़ सके।

नोएडा के रहने वाले प्रवीर 7वीं क्लास में पढ़ते हैं। उनके घर पर ऑनलाइन क्लास करने की हर तरह की सुविधा है, उन्होंने कई नई चीजें भी कोरोना के दौरान सीखी है।सर्वे में अहम भूमिका निभाने वाली डेवलपमेंटल इकनॉमिस्ट रीतिका खेड़ा ने भास्कर से बताया- हमारे सर्वे में जो नतीजे आए हैं वो घबरा देने वाले रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के 50% लोगों के पास तो स्मार्टफोन ही नहीं था। अगर किसी के पास स्मार्टफोन है, तो डेटा और कनेक्टिविटी की दिक्कतें हैं। 70% पैरेंट्स ने बताया कि उनके बच्चों के शिक्षण का स्तर बढ़ने की बजाए, उल्टा गिर गया है। तो अब जरूरी ये है कि जो बच्चे कागजों पर आगे बढ़ गए हैं उनके लिए कुछ ब्रिज कोर्सेज चलाने के बारे में सोचा जाना चाहिए। ’

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UN की बच्चों की पढ़ाई पर काम करने वाली संस्था UNICEF के स्कूलों के लगातार बंद रहने की वजह से दक्षिण एशियाई देशों के बच्चों में शिक्षा की असमानता भयानक स्तर पर पहुंच गई है। रिपोर्ट के मुताबिक 14-18 साल के 80% बच्चों का ऑनलाइन एजुकेशन के दौर में शैक्षणिक स्तर गिरा है। 6-13 साल के 42% बच्चे किसी भी तरह की रिमोट लर्निंग तरीकों का इस्तेमाल ही नहीं कर सके।

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इतिहास में पहली बार ट्रेन से चला प्याज: 220 टन लाल प्याज किसान व्यापारियों ने सीधे असम भेजा, 1836km का सफर करेगा

राजस्थान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब यहां होने वाली प्याज को ट्रेन से किसी दूसरे राज्य में भेजा गया है। पहली बार अलवर की प्याज रेल से असम भेजा गया है। पूरे प्रदेश में इससे पहले कभी भी प्याज को मालगाड़ी से ट्रांसपोर्ट नहीं किया गया। किसान रेल के जरिए किसानों की उपज को भेजने की उत्तर पश्चिम रेलवे ने यह शुरुआत की है। | उत्तर पश्चिम रेलवे के क्षेत्र में किसान रेल की अलवर से शुरूआत, 220 टन प्याज अलवर से असम भेजी

इसमे नया क्या है गरीब बेसहारा की चिंता क्यों होगी सरकार को जिनसे पैसा मिलना रिश्वत मिलनी है जैसे बड़े स्कूल माफिया शिक्षा वाले ap के ठेकेदार इनकी मिलीभगत से ये कमाल होगा पहले डोनेशन स्कूल फीस admson के पैसे लगतेथे अब ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर माफिया सक्रिय गररेब की सुनवाई नही होगी बच्चों की सही तरह से पढ़ाई तो,,,,सत्र 2022 से ही शुरू होगी,,, और वो भी तब होगी जब ऑफ लाइन,, क्लास सारे बच्चों के साथ शुरू होगी कोरोना काल में हर परिवार का भविष्य दांव पर लगा हुआ था,,, तो छोटे छोटे बच्चो का मन पढ़ाई में कैसे लगता

सरकार से निवेदन है कि जल्द से जल्द बच्चों के स्कूल खोली जाए खासकर के गांव में

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