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67 सालों के आंकड़ों से समझें, कभी देश की इकलौती राष्ट्रीय पार्टी रही कांग्रेस कैसे खोती गई जनाधार

साल 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर तक कोई पार्टी कड़ी टक्कर नहीं दे सकी थी, लेकिन

25.5.2019

आजादी के बाद से अरसे तक देश की इकलौती राष्ट्रीय पार्टी रही कांग्रेस ने 1984 में 415 सीटों पर जीत के साथ रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन हाल के वर्षों में अपना जनाधार खोती चली गई। BJP4India LokSabha Election results2019 LokSabha Election s2019

साल 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर तक कोई पार्टी कड़ी टक्कर नहीं दे सकी थी, लेकिन

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में 'मोदी लहर' में भाजपा को अपार सफलता मिली थी और सत्ता में रही कांग्रेस ने अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन किया था। इस बार नतीजे के एक दिन पहले तक सरकार बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस 'मोदी' नाम की सुनामी में बह गई और 17 राज्यों में खाता भी नहीं खोल पाई। यह वही कांग्रेस पार्टी है, जो एक समय देश की एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी और कई आम चुनावों में आराम से जीत दर्ज करती रही।

आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव अक्टूबर 1951 से लेकर फरवरी 1952 के बीच हुआ था। पहला लोकसभा चुनाव 489 सीटों पर लड़ा गया था। कांग्रेस के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, भारतीय बोल्शेविक पार्टी, जमींदार पार्टी समेत 53 पार्टियां मैदान में थीं। 38 सीटों पर 47 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव में कुल 1874 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे। कांग्रेस ने 264 सीटों पर जीत दर्ज की थी और सरकार बनाई थी। भाकपा को 16, सोशलिस्ट पार्टी को 12 और भारतीय जनसंघ को तीन सीटें मिली थी।

1962 का आम चुनाव पंडित जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के देहांत से लेकर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने का गवाह रहा। कांग्रेस ने 494 सीटों में से 361 सीटें जीती। तीसरे आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के खाते में 29 सीटें आई थीं। स्वतंत्र पार्टी को 18, जनसंघ को 14, जबकि सोशलिस्ट पार्टी को 12 सीटों पर जीत मिली थी। 1959 में इंदिरा को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था और इस चुनाव में जीत और प्रधानमंत्री के रूप में आधिकारिक तौर पर भारतीय राजनीति में जोरदार उपस्थिति बनी।

1971 में विपक्ष के 'इंदिरा हटाओ' नारे पर इंदिरा गांधी का'गरीबी हटाओ' नारा भारी पड़ा। उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस नेे लोकसभा की 545 सीटों में से 352 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस (ओ) के खाते में सिर्फ 16 सीटें ही आई। भारतीय जनसंघ ने चुनाव में 22 सीटें जीतीं। सीपीआई ने चुनाव में 23 सीटें जीतीं। जबकि सीपीआईएम के खाते में 25 सीटें आईं। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने दो सीटें जीतीं जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के खाते में 3 सीटें आईं। स्वतंत्र पार्टी के खाते में सिर्फ 8 सीटें आई।

1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को रिकॉर्ड तोड़ सीटें मिलीं। इंदिरा गांधी की हत्या से पैदा हुई हमदर्दी ने राजीव गांधी को सत्ता पर बैठाया। यह चुनाव कांग्रेस पूरी तरह इंदिरा की सहानूभूति पर लड़ रही थी। जबकि विपक्ष के पास इसका कोई तोड़ नहीं था। कांग्रेस ने 401 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल कर इतिहास रचा। यह चुनाव 542 लोकसभा सीटों के लिए हुआ था। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। यह दोनों सीटें भाजपा के बड़े नेता अटल या आडवाणी ने नहीं जीतीं थी। यह सीटें गुजरात और आंध्रप्रदेश में जीती गई थीं। उस वक्त कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए थे।

1996 में 11वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। 161 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 140 सीटें मिली और पार्टी दक्षिण में भी पिछड़ गई। अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री का पद संभाला लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण 13 दिन ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाए। जनता दल के नेता एचडी देवेगौडा ने एक जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार का गठन किया, लेकिन उनकी सरकार भी 18 महीने ही चली। देवेगौड़ा के कार्यकाल में ही विदेश मंत्री रहे इन्द्र कुमार गुजराल ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में 1997 में पदभार संभाला। कांग्रेस इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी।

साल 1999 के आम चुनाव में कांग्रेस और सिमटी। इस चुनाव में विदेशी सोनिया बनाम स्वदेशी वाजपेयी का माहौल बनाया गया। भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज्यादा 182 सीटें मिली और वाजपेयी केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रहे, जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ 114 सीटें आई थीं। सीपीआई ने चुनाव में 33 सीटें जीतीं। यह पहली बार था जब अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में केंद्र में किसी गैर-कांग्रेसी सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

2009 आम चुनाव: 206 सीटों के साथ दोबारा पीएम बने मनमोहन

2014 में हुए देश के 16वें आम चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई गैर-कांग्रेसी सरकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। 2014 में एनडीए ने कुल 336 लोकसभा सीटों पर रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी, जिनमें से 282 सीटें अकेले भारतीय जनता पार्टी की थी। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव शर्मनाक प्रदर्शन वाला रहा। कांग्रेस महज 44 सीटों पर सिमट गई। 1984 में जहां कांग्रेस ने बहुमत की सरकार बनाई थी, वहीं 2014 में भाजपा ने अपने दम पर सरकार बनाई।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में 'मोदी लहर' में भाजपा को अपार सफलता मिली थी और सत्ता में रही कांग्रेस ने अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन किया था। इस बार नतीजे के एक दिन पहले तक सरकार बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस 'मोदी' नाम की सुनामी में बह गई और 17 राज्यों में खाता भी नहीं खोल पाई। यह वही कांग्रेस पार्टी है, जो एक समय देश की एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी और कई आम चुनावों में आराम से जीत दर्ज करती रही।

आइए देश के पहले आम चुनाव से अब तक हुए चुनावों पर नजर डालते हैं कि कैसे कांग्रेस अपना जनाधार खोती चली गई:

1962 का आम चुनाव पंडित जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के देहांत से लेकर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने का गवाह रहा। कांग्रेस ने 494 सीटों में से 361 सीटें जीती। तीसरे आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के खाते में 29 सीटें आई थीं। स्वतंत्र पार्टी को 18, जनसंघ को 14, जबकि सोशलिस्ट पार्टी को 12 सीटों पर जीत मिली थी। 1959 में इंदिरा को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था और इस चुनाव में जीत और प्रधानमंत्री के रूप में आधिकारिक तौर पर भारतीय राजनीति में जोरदार उपस्थिति बनी।

1971 पांचवा आम चुनाव: इंदिरा विरोध के बावजूद कांग्रेस को मिली जीत

23 जनवरी 1977 ही वो दिन था जब अचानक इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के जरिए देश में आम चुनाव की घोषणा की। देश में तीन दिन में ही चुनाव संपन्न हो गए। चुनाव 16 मार्च 1977 से लेकर 19 मार्च 1977 के बीच हुए। 22 मार्च 1977 को आए चुनाव नतीजे ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को मात्र 153 सीटें ही मिली थीं। इस चुनाव में पूरा विपक्ष समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में गोलबंद हुआ था। जनता पार्टी को चुनाव चिन्ह नहीं मिल पाया था, जिसकी वजह से पार्टी ने 'भारतीय लोक दल' के चिन्ह"हलधर किसान" पर चुनाव लड़ा और 298 सीटें जीतीं।

1991 आम चुनाव: राजीव गांधी की हत्या के बाद मिलीं 244 सीटें

1996 में 11वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। 161 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 140 सीटें मिली और पार्टी दक्षिण में भी पिछड़ गई। अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री का पद संभाला लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण 13 दिन ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाए। जनता दल के नेता एचडी देवेगौडा ने एक जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार का गठन किया, लेकिन उनकी सरकार भी 18 महीने ही चली। देवेगौड़ा के कार्यकाल में ही विदेश मंत्री रहे इन्द्र कुमार गुजराल ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में 1997 में पदभार संभाला। कांग्रेस इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी।

साल 2004 के 14वें लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का 'इंडिया शाइनिंग' का नारा असफल रहा और कांग्रेस सत्ता में लौटी। कांग्रेस की जीत भाजपा के लिए करारा झटका थी क्योंकि साल 1999 में जीत के बाद पहली बार भाजपा केंद्र में पांच साल सरकार चलाने में सफल रही थी। इस चुनाव में कांग्रेस को 145 सीटें मिलीं। जबकि भाजपा के खाते में 138 सीटें आई। सीपीएम के खाते में 43 सीटें गई और सीपीआई 10 सीटें जीतने में कामयाब रही।

2014 आम चुनाव: कांग्रेस का शर्मनाक प्रदर्शन, विपक्ष को तरसी

2014 के आम चुनाव में जहां मोदी लहर दिखी थी, तो वहीं 2019 लोकसभा चुनाव में मोदी सुनामी का माहौल बना। 2014 में 44 सीटें लाने वाली कांग्रेस कुछ ही सीटों का इजाफा कर सकी और 52 पर ही पहुंच सकी। शर्मनाक बात यह रही कि देश के 17 राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया।

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एक दिन ऐसा भी आयेगा जब INCIndia ' 0 ' पर होगी,

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