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सियासत का परंपरागत स्वरूप चलेगा या नई राजनीति पकड़ेगी रफ्तार, 23 को फैसला

1952 से शुरू हुआ संसदीय राजनीति का सिलसिला 16वें चुनाव तक एक ही ढर्रे पर चला।

21.5.2019

सियासत का परंपरागत स्वरूप चलेगा या नई राजनीति पकड़ेगी रफ्तार, 23 को फैसला LokSabhaElections2019 LokSabhaChunav2019 ResultsWithAmarUjala Mahasangram ElectionCommission लोकसभाचुनाव2019 लोकसभाचुनावपरिणाम2019

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बूथ डाटा व संपर्क पर बड़ा काम चुनाव से पहले ही देश भ्रमण पूरा

देश में क्षेत्रीय दल जातीय राजनीति के लिए जाने जाते हैं। ऐसे दलों की रणनीति समर्थक जातिवर्ग के साथ चुनाव के दौरान कुछ अन्य जातियों को साधकर चुनावी बाजी जीतने की रही है। आमतौर पर माना जाता है कि कुछ जातियां ऐसी हैं, जो दल विशेष से हर हाल में जुड़ी रहेंगी। हालांकि 2014 के चुनाव में कांग्रेस के प्रति रोष और इस पार्टी को सबक सिखाने के बने माहौल ने इस धारणा में बदलाव की शुरुआत की। तब भी माना गया कि ऐसे वर्गों का इस तरह का बदला हुआ वोटिंग पैटर्न महज एक संयोग है।

देश में कई बार चुनाव के बाद कई दलों ने गलबहियां कर सत्ता का स्वाद चखा। वर्ष 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के चुनाव तक सिलसिला जारी रहा। बीते चुनाव में अकेले एक पार्टी (भाजपा) को बहुमत और उसकी अगुवाई वाले राजग को प्रचंड बहुमत मिला। अगर 2019 में भी यह सिलसिला जारी रहा तो विपक्ष को गठबंधन के लिए चुनाव के बाद नहीं, बल्कि हर हाल में चुनाव से पहले ही अमलीजामा पहनाना होगा। भाजपा की जीत यह साबित कर देगी कि मतदाता नेतृत्व के रूप में असमंजस की स्थिति को स्वीकार नहीं करेगा।

17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव के नतीजे भारतीय राजनीति में नई इबारत लिखेंगे। नतीजे यह भी साफ कर देंगे कि करीब सात दशक से चली आ रही परंपरागत राजनीति ही जारी रहेगी या अब नई राजनीति अपने सफर पर आगे बढ़ेगी, जिसका सूत्रपात पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी कार्यशैली से किया है। जाहिर तौर पर अगर देश में पहली बार विशुद्ध गैर कांग्रेसी सरकार लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतती है, तो राजनीति के चरित्र में कई अहम बदलाव होंगे। खासतौर पर विपक्ष को भाजपा और मोदी-शाह की नई राजनीतिक कार्यशैली से मुकाबले के लिए अपनी राजनीतिक कार्यशैली में बड़े बदलाव करने होंगे।

दरअसल, मसलन, सत्ताधारी और विपक्ष दोनों ही चुनावी वर्ष या उससे कुछ पहले ही चुनावी मोड में आए। चुनाव से ठीक पहले कुछ अहम विकास योजना या कल्याणकारी कार्यक्रम की घोषणा और लोकलुभावन नारों की बदौलत जीत-हार की पटकथा लिखी गई। हां, नब्बे के दशक में मंडल आयोग की रिपोर्ट आने के बाद कई क्षेत्रीय दलों ने अपने लिए जातिगत समर्थक वर्ग बनाने में सफलता हासिल की। इससे संसद और विधानसभा चुनावों में जातीय और अन्य क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर चेहरे तो बदले मगर, राजनीति उसी पुरानी परिपाटी पर चली।

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