एनआरसी के डर से मूल निवासियों का रजिस्टर बना रहा है नगालैंड?

एनआरसी के डर से मूल निवासियों का रजिस्टर बना रहा है नगालैंड?

16.7.2019

एनआरसी के डर से मूल निवासियों का रजिस्टर बना रहा है नगालैंड?

नगालैंड में मूल निवासियों का स्पेशल रजिस्टर बनाए जाने की तैयारी से डरे हुए हैं ग़ैर नगा समुदाय.

प्रमोद सिंह अन्य लोग भी परेशान अजय यादव, सीताराम जैसे बिहार से आकर बसे लोगों को भले ही दीमापुर में 20 से 30 साल हुए है लेकिन इस शहर में गैर नगा लोगों की एक और ऐसी आबादी है जिनका इतिहास सौ साल से भी अधिक पुराना है. श्री दिगंबर जैन समाज, दीमापुर के अध्यक्ष ओमप्रकाश सेठी कहते है,"पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह नगालैंड में भी अवैध प्रवासन की काफ़ी समस्या है. ऐसे में नगा आइडेंटिटी को सुरक्षित करना बेहद ज़रूरी हो गया है. आईएलपी हो या फिर इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने की बात हो हम इसका समर्थन करते है. लेकिन सरकार को कई पीढ़ियों से यहां बसे गैर नगा लोगों के बारे में भी ध्यान रखने की ज़रूरत है. समाज के लोग पूछते है कि अगर उनका नाम रजिस्टर में शामिल नहीं किया गया तो आगे भविष्य क्या होगा. नगालैंड में हमारी यह तीसरी पीढ़ी है." वहीं दीमापुर बंगाली समाज के अध्यक्ष एडवोकेट के.के. पाल कहते है,"दीमापुर यहां का एक वाणिज्यिक केंद्र हैं और भारत के करीब हर राज्य के लोग यहां सालों से बसे है. हमारा नगा समुदाय के साथ बहुत पूराना मित्रतापूर्ण सबंध है. बात जहां तक आईएलपी लागू करने की है तो इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि दीमापुर बहुत तेजी से विकसित होता हुआ शहर है. यहां रोजाना 40 ट्रेनें आती है जिसमें हजारों की संख्या में लोग व्यापार के लिए आते है. यहां हवाई अड्डा है जहां केवल दीमापुर ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्र के लोग भी आना-जाना कर रहें है. लिहाजा आईएलपी लगाने से यहां कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो सकती है." इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma एडवोकेट पाल आगे कहते है,"इस शहर में काम के लिए काफी लोग बाहर से आ रहें है. इसमें हो सकता है अवैध आप्रवासी भी हो. हम चाहते है कि नागा आइडेंटिटी को सुरक्षित किया जाए और डिमापुर का ग्रोथ भी बाधित न हो. क्योंकि नगालैंड में इतनी अधिक साक्षरता दर होने के बाद भी 15-29 वर्ष आयु वर्ग में बेरोज़गारी की दर 56 प्रतिशत है." जबकि दीमापुर मुस्लिम कांउसिल के अध्यक्ष अहिदुर रहमान भी एडवोकेट पाल की बात से इत्तेफाक रखते हुए मानते है कि दीमापुर में आईएलपी लागू होने पर व्यापार को काफी नुकसान होगा. वो कहते है,"दीमापुर में पिछले कुछ सालों में अस्थायी लोगों की भीड़ बढ़ी है. इस तरह की भीड़ के कारण यहां अपराध से लेकर कई तरह की परेशानियां खड़ी हो गई है. लेकिन इनको रोकने के लिए सभी को एक व्यवस्था में डाल देना ठीक नहीं रहेगा. दीमापुर में मुसलमानों का इतिहास काफी पुराना है. शहर में जो मस्जिद है वो 1906 में बनी थी. कब्रगाह उससे भी पुरानी है. लिहाज़ा पुराने बाशिंदों को मान्यता मिलनी चाहिए. हमारे पूर्वजों ने यहां के लिए बहुत कुछ किया है." इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma हालांकि जेसीपीआई संयोजक चोपी ग़ैर नगा लोगों की चिंता का जबाव देते हुए कहते है,"जो भारतीय नागरिक है वो यहीं रहेंगे. किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है. इंडिजेनस सर्टिफिकेट का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है और उसे रोकने के लिए नए सिरे से इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाया जा रहा है." दीमापुर अर्बन कांउसिल चेयरमैन फ़ेडरेशन के अध्यक्ष सेनथुंगो लोथा कहते है," जो इंडिजेनस लोग है वो इंडिजेनस की तरह रहेंगे. जो बाहर के लोग है वो बाहर के हिसाब से रहेंगे. यह व्यवस्था किसी को यहां से बाहर निकालने के लिए नहीं है." नए सिरे से इंडिजेनस सर्टिफिकेट जारी करने को लेकर राज्य सरकार पर दबाव बना रहें सर्वाइवल नगालैंड नामक संगठन के सलाहकार टिया लोंगचर कहते है,"पहले घर-घर जाकर सर्वे किया जाएगा. अगर फिर भी इस प्रक्रिया में कोई छूट जाता है तो एनआरसी की तरह ही यहां के लोगों को भी दावे और आपत्ति के लिए पूरा समय दिया जाएगा. इसमें किसी को भी घबराने की ज़रूरत नहीं है." इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma सुमिया समुदाय नगा प्रथा के तहत नए समुदायों को अपनाने की एक और चिंता सामने आई है. दरअसल सुमी नगा जनजाति की महिलाओं के साथ काफ़ी संख्या में मुसलमान पुरुषों ने शादी की है. ऐसे में इनके बच्चों को यहां सुमिया समुदाय के तौर पर जाना जाता है. सुमी नगा के पास यहां बड़े पैमाने में खेती योग्य ज़मीन है. हालांकि नगा स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन जैसे संगठन का कहना है कि इंडिजेनस लोगों की श्रेणी में केवल उन्हें ही शामिल किया जाएगा जो खून से नगा है. आखिर नगालैंड के लिए दीमापुर इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है? देश के अन्य हिस्सों में भले ही लोगों ने दीमापुर का नाम एक बड़े शहर के तौर पर नहीं सुना होगा लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहासकार इसे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान के रूप में जानते हैं. जापानियों के साथ युद्ध के समय ब्रिटिश की 14 वीं सेना के लिए दीमापुर मुख्य आपूर्ति डिपो हुआ करता था. इसी वजह से जापानी सेना ने दीमापुर पर कब्जा करने का लक्ष्य बनाया था. दरअसल रेलहेड के कारण दीमापुर इतना रणनीतिक रुप से अहम बन गया था. दीमापुर आज भी राज्य का आर्थिक केंद्र है.यहां के 90 फिसदी व्यापार पर गैर नगा लोगों का नियंत्रण है. इमेज कॉपीरइट DILIP/ASSAM लेकिन लोगों में उत्पन्न हुई इस चिंता के लिए नगालैंड सरकार का कामकाज सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है. दरअसल नगालैंड सरकार ने बिना कोई तौर तरीके बनाए सीधे इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाने का फैसला ले लिया, जिससे कई लोगों के मन में शंका उत्पन्न हो गई है. नगालैंड सरकार का कहना है कि वह प्रदेश में जारी हुए नकली स्वदेशी निवासी प्रमाण पत्र की जाँच करने के उद्देश्य से नगालैंड के मूल निवासियों का रजिस्टर तैयार करने जा रही है. सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक एलायंस सरकार ने दीमापुर में आईएलपी लागू करने को लेकर बनी अभिषेक सिंह कमेटी की सिफारिशों को भी मंजूरी दे दी है. अर्थात आईएलपी लागू होने के बाद कोई भी बाहरी व्यक्ति नगालैंड सरकार की अनुमति के बिना इस शहर में प्रवेश नहीं कर सकेगा. फिर चाहे वो भारतीय नागरिक ही क्यों न हो. दरअसल आईएलपी व्यवस्था अपने ही देश में एक आंतरिक वीजा की तरह है जिसके तहत किसी भी अन्य राज्य के व्यक्ति को अनुमति लेकर ही उस प्रदेश (आईएलपी वाले) में प्रवेश करना पड़ता है. वैसे तो आईएलपी व्यवस्था दीमापुर जिले को छोड़कर नगालैंड के सभी 11 जिले में पहले से लागू है लेकिन अब इसे समूचे नगालैंड में अर्थात सभी 12 जिलों में लागू करने का निर्णय लिया गया है. नेफ़्यू रियो की सरकार ने पिछले महीने 29 जून को रजिस्टर ऑफ़ इंडिजेनस इन्हेबिटेंट्स ऑफ़ नगालैंड (RIIN) को लेकर जो अधिसूचना (No.CON-3/PAP/65/10) जारी की थी उसके अनुसार 10 जुलाई से नामित टीमों को गांव और शहरी इलाकों में घर-घर जाकर लोगों के बारे में जानकारियां संग्रह करना था. लेकिन गैर नगा लोगों ने ही नहीं बल्कि नगा समुदाय के कई संगठनों ने भी सवाल खड़े किए कि बिना किसी मोडालिटीज के सरकार यह कदम कैसे उठा सकती है. नगालैंड के शीर्ष संगठन नगा होहो के अध्यक्ष चुबा ओज़ुकुम ने पत्रकारों से कहा,"रियो सरकार को यह फैसला लेने से पहले इस मुद्दे पर सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करनी चाहिए थी. हम सभी नगा हैं और दूसरे राज्यों के नगा भी यहां रह रहे हैं. सरकार ने बिना कोई कट-ऑफ तारीख स्पष्ट किए सीधे अधिसूचना जारी कर दी. नगाओं को विभाजित करने की इस प्रक्रिया के दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं." इमेज कॉपीरइट DILIP/ASSAM क्या कहती है सरकार सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के डिमापुर जिले के नेता डेविड नैइखा ने रजिस्टर ऑफ़ इंडिजेनस इन्हेबिटेंट्स ऑफ़ नागालैंड के संदर्भ में संपर्क करने पर एक लिखित जबाव के ज़रिए बताया,"मैंने इस विषय को लेकर पार्टी के शीर्ष नेताओं से संपर्क किया था. चूंकि यह प्रक्रिया अपने शुरुआती चरण में है और सरकारी मशीनरी द्वारा अभी तक कोई ठोस तैयारियां नहीं की जा सकी हैं, इसलिए उन लोगों ने प्रारंभिक टिप्पणी करने से मना कर दिया." इस तरह की प्रतिक्रियाओं के बाद राज्य सरकार ने फिलहाल इस प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोकते हुए 17 जुलाई को सभी नागरिक संगठनो के साथ विचार विमर्श करने के लिए एक बैठक बुलाई है. केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता कर रहे चरमपंथी संगठन एनएससीएन (आईएम) ने भी इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए है. एनएससीएन (आईएम) ने नगाओं के निहित अधिकारों के लिए सरकार के इस कदम को"विरोधाभासी" बताया है. भारत सरकार के साथ 2015 में फ्रेमवर्क समझौता पर हस्ताक्षर करने वाले एनएससीएन (आईएम) ने एक बयान जारी कर नगालैंड सरकार की आलोचना करते हुए कहा,"सभी नगा क्षेत्रों का एकीकरण आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार द्वारा स्वीकार किया गया है जो कि नगाओं का वैध अधिकार है." नगालैंड के सबसे बड़े सशस्त्र समूह ने इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने के विषय को उन समूहों की साज़िश क़रार दिया, जो 1960 के 16-बिंदु समझौते पर सहमत हुए थे. इमेज कॉपीरइट DILIP/ASSAM दरअसल 26 जुलाई, 1960 को नई दिल्ली और नगा पीपुल्स कन्वेंशन के बीच हस्ताक्षरित उस समझौते ने 1 दिसंबर, 1963 को नगालैंड के राज्य का मार्ग प्रशस्त किया था. नया राज्य पहले असम का नगा हिल्स-तुएनसांग क्षेत्र था. नगा आबादी वाले क्षेत्रों की आजादी के लिए चली लंबी लड़ाई को ध्यान में रखते हुए नए राज्य का गठन 'भारतीय संघ के भीतर" और"विदेश मंत्रालय के तहत" करने के लिए यह समझौते किया गया था. एनएससीएन (आईएम) ने अपने बयान में कहा," इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाने की सरकार की यह कवायद दरअसल नगाओं के निहित अधिकारों में विभाजन लाने और उन्हें कमजोर करने के लिए किया जा रहा है जबकि केंद्र सरकार के साथ शांति प्रक्रिया अंतिम निपटान पर है." नगालैंड सरकार के अनुसार, इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाने का उद्देश्य राज्य के गैर-इंडिजेनस निवासियों को नौकरियों और लाभार्थी योजनाओं के लिए इंडिजेनस निवासी प्रमाण पत्र प्राप्त करने से रोकना है. नगालैंड के अलावा अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और म्यांमार में 50 से अधिक नगा जनजाति हैं. एनएससीएन (आईएम) का शांति मुख्यालय दीमापुर के पास हेब्रोन में है जहां अधिकतर कैडर टांगखुल सुमदाय के है जो मुख्य तौर पर मणिपुर के उखरूल और कामपोंग जिले से है. ऐसे में रियो सरकार को इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने से पहले कट-ऑफ तारीख तय करते समय काफी सावधानी बरतनी होगी. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप और पढो: BBC News Hindi

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