Pm Narendra Modi, Pm Nehru

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वनडे मैच खेलने आए मोदी ‘पॉलिटिकल’ टेस्ट के बन गए सबसे बड़े खिलाड़ी

नरेंद्र मोदी करीब 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. अब 2014 से वे देश के प्रधानमंत्री हैं. वे दोनों जगहों को मिलाकर 18 साल और 10 महीने तक सत्ता के शीर्ष पर रह चुके हैं. आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कीर्तिमान किसी के नाम नहीं है @brajeshksingh

14-08-2020 10:54:00

नरेंद्र मोदी करीब 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. अब 2014 से वे देश के प्रधानमंत्री हैं. वे दोनों जगहों को मिलाकर 18 साल और 10 महीने तक सत्ता के शीर्ष पर रह चुके हैं. आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कीर्तिमान किसी के नाम नहीं है brajeshksingh

नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) करीब 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. अब 2014 से वे देश के प्रधानमंत्री हैं. वे दोनों जगहों को मिलाकर 18 साल और 10 महीने तक सत्ता के शीर्ष पर रह चुके हैं. आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कीर्तिमान किसी के नाम नहीं है, देश के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू के नाम भी नहीं. | News in Hindi - हिंदी न्यूज़, समाचार, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ इन हिंदी

शेयर करें:नरेंद्र मोदी 2014 से देश के प्रधानमंत्री हैं.नरेंद्र मोदी भारत के इतिहास में सबसे लंबे कार्यकाल वाले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री तो बन ही गए हैं, साथ में वे सबसे लंबे समय तक चुनी हुई सरकार की अगुआई करने वाली शख्सियत भी हो गए हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर करीब पौने तेरह साल तक लगातार कार्य करने वाले मोदी पिछले सवा छह वर्षों से देश के प्रधानमंत्री हैं. इस तरह वे दोनों जगहों पर कुल मिलाकर 18 साल और दस महीने तक सत्ता के शीर्ष पर रह चुके हैं. स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा कीर्तिमान किसी के नाम नहीं है, देश के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू के नाम भी नहीं.

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सात अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गांधीनगर के हेलीपैड ग्राउंड पर मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी. यह सरकार में किसी भी स्तर पर उनका पहला प्रवेश था. मुख्यमंत्री बनने के पहले मोदी सरपंच का चुनाव भी नहीं लड़े थे, विधायक और सांसद बनना तो दूर की बात. ये बात अलग थी कि अपनी कुशल रणनीति और सांगठनिक कौशल के जरिए वे गुजरात में लगातार दूसरी दफा बीजेपी की सरकार बनवा चुके थे, जिसके लिए गुजरात बीजेपी के संगठन महामंत्री के तौर पर उन्होंने जमीन तैयार की थी. हालांकि यह भी संयोग ही था कि 1995 में शंकरसिंह वाघेला के विद्रोह के बाद जब मोदी को गुजरात छोड़ना पड़ा और फिर संगठन में आगे बढ़ते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर वे पहुंच चुके थे, तो गुजरात में उनकी औपचारिक वापसी संगठन की जगह सीधे सरकार में हुई. उस मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने हटाकर मोदी को सीएम बनाने का फैसला किया था, जिस पहली बार 1995 में नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री ही बनवाया था और जिस कारण सीएम पद के बाकी महत्वपूर्ण दावेदार शंकरसिंह वाघेला, कांशीराम राणा या फिर सुरेश मेहता उनसे नाराज हुए थे.

ऐसे में जब सात अक्टूबर 2001 के दिन नरेंद्र मोदी को तत्कालीन पीएम अटलबिहारी वाजपेयी और उस वक्त उप प्रधानमंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी के कहने पर गुजरात में बीजेपी सरकार की कमान औपचारिक तौर पर संभालनी पड़ी, तो उनके सामने चुनौतियां गंभीर थीं. वर्ष 2000 और 2001 में हुए कई चुनावों में गुजरात में बीजेपी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. जिस राजकोट नगरनिगम पर पहली बार सत्तर के दशक में जनसंघ ने कब्जा जमाया था या फिर जिस अहमदाबाद नगर निगम पर मोदी के रणनीतिक कौशल के कारण पहली बार 1987 में बीजेपी ने कब्जा जमाया था और जो शहरी इलाके बीजेपी के सबसे बड़े वोट बैंक माने जाते थे, उन महानगरों के चुनावों में बीजेपी को करारी हार मिली थी. यही नहीं, साबरकांठा लोकसभा और साबरमती विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों में भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. साबरमती में मिली हार तो खुद लालकृष्ण आडवाणी के लिए खतरे का संकेत थी, क्योंकि ये विधानसभा क्षेत्र उनके लोकसभा क्षेत्र गांधीनगर का हिस्सा था, जहां से पहली बार न सिर्फ वो 1991 में चुनाव जीते थे, बल्कि खुद वाजपेयी ने यहां से 1996 में सेफ सीट के तौर पर चुनाव जीता था, जब लखनऊ में

उनकी जीत शंका के घेरे में थी.इससे भी अधिक परेशानी राज्य सरकार की छवि को लेकर थी. भ्रष्टाचार के आरोप तो लग ही रहे थे, साथ में 26 जनवरी 2001 को आए भूकंप, जिसमें दस हजार से भी अधिक लोगों की जान गई थी, उसमें राहत और पुनर्वास कार्यों में देरी को लेकर भी बीजेपी की राज्य सरकार की आलोचना हो रही थी. सरकार तेजी से कुछ करते हुए नहीं दिख रही थी. गुजरात में विधानसभा चुनाव भी साल-डेढ़ भर बाद ही होने वाले थे, आखिरी चुनाव 1998 में हुए थे. जाहिर है, जो गुजरात बीजेपी और संघ परिवार की प्रयोगशाला के तौर पर देश के राजनीतिक पंडितों के बीच चर्चा के केंद्र में रहता था, वहां बीजेपी सबसे कमजोर हालत में थी. शहर तो ठीक, जिला और तालुका पंचायत चुनावों में भी बीजेपी को करारी हाल मिली थी. ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व की चिंता स्वाभाविक थी और इसलिए गुजरात में बीजेपी की डूबती नैया को पार लगाने की जिम्मेदारी उस नरेंद्र मोदी को सौंपी गई थी, जिन्होंने पार्टी के हित में अपना बलिदान देने की बात करते हुए एक औपचारिक पत्र तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कांशीराम राणा को लिखते हुए गुजरात के संगठन महामंत्री के पद से इस्तीफा देते हुए 1995 में ही दिल्ली की राह पकड़ ली थी. वे राजनीतिक विशेषज्ञ और नामचीन पत्रकार भी मोदी को ही एकमात्र विकल्प गुजरात में हालात को ठीक करने के लिए मान रहे थे, जो बाद के वर्षों में मोदी से भाव न मिलने के कारण उनके कट्टर आलोचक बन गए.

स्वाभाविक तौर पर परिस्थितियां गंभीर थीं, जब अक्टूबर 2001 के शुरुआती दिनों में मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. इसलिए शपथ ग्रहण के बाद हुई कैबिनेट की पहली बैठक में ही उन्होंने अपने साथी मंत्रियों और नौकरशाहों के सामने साफतौर पर अपना एजेंडा रखते हुए कहा कि वे गुजरात में वनडे मैच खेलने आए हैं, टेस्ट मैच नहीं. उस वक्त वनडे मैचों का क्रेज बढ़ चुका था, पांच दिन वाले टेस्ट मैच से लोग ऊबने लगे थे. ऐसे में वनडे मैच खेलने की बात करते हुए मोदी ने अपनी बेचैनी और प्राथमिकता दोनों को सामने रखने की कोशिश की थी, बिना लाग-लपेट के. प्राथमिकता ये थी कि बहुत जल्द कच्छ के भूकंप पीड़ितों के लिए राहत और पुनर्वास कार्य को तेजी से आगे बढ़ाना है. इसके लिए आवश्यक योजनाओं और नीतियों को लागू करना है. साथ में प्रशासन को साफ-सुथरा बनाना है, क्लीन करना है और गुजरात को विकास की राह पर आगे बढ़ाना है, सुशासन की तस्वीर साफतौर पर दिखानी है, गुजरात की आम जनता को भी और देश को भी.

मोदी ने स्वाभाविक तौर पर इसके लिए तेजी से कदम उठाए. भ्रष्ट छवि वाले अधिकारियों को फटाफट किनारे लगाया, पार्टी नेताओं के बीच बोर्ड और कॉरपोरेशन के अध्यक्ष और सदस्य की रेवडी को बांटना तत्काल बंद किया. प्रशासनिक अधिकारियों और मंत्रियों के कामकाज में सुधार लाने के लिए सालाना तालीम शिविरों का आयोजन शुरु किया, कर्मयोगी जैसा शब्द इस्तेमाल में आया और यहां तक कि देश के सबसे प्रतिष्ठित मैनेजमेंट संस्थान आईआईएम-अहमदाबाद में अपने अधिकारियों और मंत्रियों को लेकर ट्रेनिंग हासिल करने के लिए भी बैठे सरकार के कार्य में कुशलता बढ़ाने के लिए.मोदी ने अपने जीवन का पहला चुनाव खुद 2002 में लड़ा. वे जनवरी-फरवरी के महीने में राजकोट-2 सीट से चुनाव लड़े. कांग्रेस तो सामने जाति कार्ड के साथ खड़ी ही थी, खुद पार्टी के अंदर से भी भीतरघात की आशंका थी, राजकोट से ही संबंध रखने वाले केशुभाई पटेल सीएम की कुर्सी से हटाए जाने के कारण साफतौर पर नाराज थे. बावजूद इसके मोदी वहां से जीत हासिल करने में कामयाब रहे, हालांकि मार्जिन बहुत बड़ी नहीं थी. कड़े मुकाबले में चुनाव जीतने की खुशी अभी मनाई ही जाती कि तीन दिन बाद 27 फरवरी 2002 को राज्य के गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के एस-6 डिब्बे में आग लगाकार अयोध्या से वापस आ रहे 59 कारसेवकों को मुस्लिमों की एक आक्रामक भीड़ ने जलाकर मार दिया, जो बाद में चले मुकदमे के दौरान मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों और व्यक्तियों की सोची-समझी साजिश का नतीजा माना गया. इसके अगले ही दिन गुजरात के ज्यादातर हिस्सों में दंगे भड़क उठे, जिसमें जान-माल का नुकसान कई दिनों तक होता रहा.

दंगों के बाद ही मोदी को हटाने के लिए दबाव बनाया जाने लगा, विपक्षी दल हमलावर हुए. मोदी पर दंगों को रोकने में लापरवाही का आरोप लगा, जबकि मोदी ने उसी दिन दंगों को काबू में करने के लिए औपचारिक तौर पर सेना की मांग कर डाली थी और पड़ोसी राज्यों से रिजर्व पुलिस की मांग, जिसे दिग्विजय सिंह की अगुआई वाली तत्कालीन एमपी सरकार ने ठुकरा भी दिया था. इसके बाद अगले एक दशक तक तक लगातार कानूनी दांव-पेंच का सिलसिला चलता रहा. 2004 में कांग्रेस की अगुआई में केंद्र में आई यूपीए सरकार ने अगले 10 वर्षों तक मोदी को दंगों और मुठभेड़ों के मामले में फंसाने की कोशिश भी की, लेकिन मोदी के मामले में आखिरकार खुद सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित की गई एसआईटी ने क्लीन चिट दी, जिसे संबंधित अदालतों ने सही भी माना और इस तरह सत्यमेव जयते की बात कहते हुए मोदी ने इस प्रकरण पर ताला लगने की उम्मीद के साथ अपना मशहूर ब्लॉग पोस्ट लिखा.

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हालांकि इस दांव-पेंच के बीच ही मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पौने तेरह साल के कार्यकाल के दौरान उस गुजरात मॉडल को विकसित किया, जिससे पूरे देश में उनकी सकारात्मक छवि बनी, उस नेता की छवि जो बिना आराम, लगातार सुशासन और विकास की प्रक्रिया का आगे बढ़ाते हुए भ्रष्टाचार, छद्म धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण की राजनीति के खिलाफ आक्रामक ढंग से लड़ाई लड़ रहा है. यही वजह रही कि 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही मोदी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जाने लगा और 2013 आते-आते खुद बीजेपी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. 2014 के मई महीने में जब मोदी ने औपचारिक तौर पर पहली बार उस सरकार की कमान संभाली, जिसे बीजेपी अकेले अपने बूते पर बनाने में कामयाब रही थी, तो इस ऐतिहासिक कामयाबी के लिए कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार था, तो वो खुद मोदी थे, पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता और सबसे बड़े कैंपेनर. उसके बाद 2019 का लोकसभा चुनाव भी मोदी पहले से भी बड़े मैंडेट के साथ जीत कर पिछले सवा छह साल से लगातार देश के प्रधानमंत्री बने हुए हैं और देश तो ठीक दुनिया के भी सर्वश्रेष्ठ नेताओं में अपनी जगह बना चुके हैं, अपनी कूटनीति का लोहा मनवा चुके हैं. भला किसने सोचा था कि जो व्यक्ति अक्टूबर 2001 के महीने में सिर्फ पचास ओवर का वनडे मैच खेलने के लिए मैदान में उतरा था, वो पौने उन्नीस साल बाद भी अपनी इनिंग को लगातार आगे बढ़ा रहा होगा, बिना किसी ब्रेक के, अंतर सिर्फ ये कि खेलने की जमीन बदल चुकी है, पहले गुजरात का पॉलिटिकल ग्राउंड था और अब देश का. मोदी इस मैराथन इनिंग के दौरान इतनी छूट तो ले ही सकते हैं, आखिर खुद एक समय गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष तो रह ही चुके हैं. मोदी की इस जंबो पारी से देश के लोगों को परेशानी नहीं, बल्कि खुशी ही है, यही वजह है कि बतौर मुख्यमंत्री गुजरात में तीन विधानसभा चुनाव अपनी पार्टी को जिताने वाले मोदी पूरे देश के लोगों में अपनी चाह पैदा कर दो बार अपनी अगुआई में लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिला चुके हैं. ये मैराथन टेस्ट पारी कब खत्म होगी, ये किसी को पता नहीं, न तो विपक्षी दलों को और न ही राजनीतिक पंडितों को, जो हर बार मोदी की पारी समाप्त होने की भविष्यवाणी करते हैं और मोदी हर दफा पहले से भी बड़े जनसमर्थन के साथ अपनी पारी को आगे बढ़ाते जाते हैं, चुनावों के रुप में नियमित ड्रिंक्स इंटरवल के साथ.

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)ब्लॉगर के बारे मेंब्रजेश कुमार सिंहGroup Consulting Editor और पढो: News18 India »

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brajeshksingh महान ही बनाते है कीर्तिमान जो मेहनत करते हैं बाकी नाम बाले तो सिर्फ हराम की खाने का बनते हैं? brajeshksingh हर हर मोदीजी घर घर मोदीजी brajeshksingh brajeshksingh Narendra Modi has become the first non-Congress Prime Minister to complete his term. However, he is the only Prime Minister who has not held a press conference!

brajeshksingh मतलब गुजरात 18 साल से भुगत रहा हैं? brajeshksingh ज़रा ये भी बता दो इस के राज में कितने दंगे हुए कितने लोग मरे कितने बेरोज़गार हुए कितनी चीज़ें बिक गईं कितनी नफ़रतें फैलीं कैसी बीमारी आई देश कितना बदनाम हुआ कितनी दरिंदगी हुई brajeshksingh जुठ की राजनीति में भी brajeshksingh विकाउ मीडिया

brajeshksingh New Plane of shere Hind🙏

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