यूपी में जनस्वास्थ्य की हालत चिंताजनक | DW | 30.11.2021

अस्पतालों में डिलीवरी और परिवार नियोजन के साधनों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी के चलते यूपी में जनस्वास्थ्य की तरक्की की बातें कही जा रही हैं लेकिन जानकार इससे जुड़े कई मापदंडों को लेकर अब भी परेशान हैं.

05-12-2021 19:24:00

अस्पतालों में डिलीवरी और परिवार नियोजन के साधनों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी के चलते यूपी में जनस्वास्थ्य की तरक्की की बातें कही जा रही हैं लेकिन जानकार इससे जुड़े कई मापदंडों को लेकर अब भी परेशान हैं. . . DWHindi UttarPradesh

अस्पतालों में डिलीवरी और परिवार नियोजन के साधनों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी के चलते यूपी में जनस्वास्थ्य की तरक्की की बातें कही जा रही हैं लेकिन जानकार इससे जुड़े कई मापदंडों को लेकर अब भी परेशान हैं.

इतना ही नहीं राज्य में हर पांच में से चार महिलाओं को मां बनने से पहले फॉलिक एसिड जैसी जरूरी दवाएं नहीं मिल पातीं. अभी भी यूपी के सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन की सुविधाएं नहीं हैं. इतना ही नहीं तीन-चौथाई बच्चों को जन्म के एक घंटे के अंदर मां का दूध नहीं मिल पा रहा है. जानकार मानते हैं, इन समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन नहींजानकार कहते हैं कि यूपी में अस्पतालों में डिलीवरी बढ़ी है लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सीजेरियन के जरिए ज्यादातर बच्चे प्राइवेट अस्पतालों में ही पैदा हो रहे हैं. सरकारी अस्पतालों में 100 में से सिर्फ 6 बच्चे सीजेरियन से पैदा हो रहे हैं. पब्लिक हेल्थ पर काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था वात्सल्य की डॉ नीलम सिंह भी इस बात पर मुहर लगाती हैं. वह बताती हैं,"यूपी के सरकारी अस्पतालों में सीजेरियन की सुविधाएं ही नहीं हैं. इससे भी खतरनाक हैं प्राइवेट हॉस्पिटल, जहां अब ज्यादातर सीजेरियन हो रहे हैं. क्योंकि कई बार इनमें गायनेकोलॉजिस्ट ही नहीं होते, पैसों के लालच में सामान्य डॉक्टर ही डिलीवरी करा देते हैं. यह खतरनाक हो सकता है."

वीडियो देखें07:08मां बनने की सही उम्रनेशनल न्यूट्रिशन मिशन के तहत महिला और बाल स्वास्थ्य पर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में काम कर चुके विनय कुमार कहते हैं,"यूपी में अधिकतर मांएं पैदा होने के तुरंत बाद बच्चों को दूध नहीं पिला रही हैं. इसकी वजह उन्हें ब्रेस्टफीडिंग के लिए स्पेशल काउंसलिंग न मिल पाना है जबकि इसके लिए जानकार स्वास्थ्य कर्मियों की नियुक्ति की जाती है लेकिन ऐसी कोई सुविधा जमीन पर न मौजूद होने के चलते, बच्चे ऐसे जरूरी पोषण से छूट जा रहे हैं. इसका असर उनके बाद से जीवन में दिखेगा." headtopics.com

कुपोषण से बच नहीं सकते बच्चेडिलीवरी के बाद भी विशेषज्ञ डॉक्टरों के न होने के चलते गड़बड़ियां जारी रहती हैं. विनय कुमार कहते हैं,"मां के पहले गाढ़े दूध का महत्व जानने के बाद भी डॉक्टर बाहर से पाउडर्ड मिल्क लाकर बच्चे को पिलाने की सलाह देते हैं. इस तरह के दूध की बिल्कुल मनाही है, फिर भी. ऐसा दूध कंपनियों और डॉक्टरों की साठ-गांठ से बेचा जाता है. फिर अगले छह महीने भी इसी तरह बाहर का दूध पिलाने का क्रम जारी रहता है, जबकि सामान्यत: बच्चे को मां का दूध पिलाया जाना चाहिए. यह बाद में बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है."

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वीडियो देखें09:45ब्रेस्ट्स: कुदरत का करिश्माजानकार बताते हैं कि एनएफएचएस के आंकड़ों के मुताबिक यूपी में 6 महीने से 2 साल के बीच 94 फीसदी बच्चों को पर्याप्त खाना नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में कुपोषण को खत्म करने का सपना भी बेईमानी है. बिना पूरे पोषण के बच्चों का विकास कैसे होगा. यही वजह है कि अब भी 100 में से 40 बच्चों की उम्र के हिसाब से लंबाई कम है. और बहुत से बच्चों का उम्र के हिसाब से वजन नहीं बढ़ रहा. इसके अलावा अति कुपोषित बच्चों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है. ओवरवेट बच्चों की संख्या भी बढ़कर दोगुनी हो गई है. 5 साल से कम उम्र के 66 फीसदी बच्चे एनिमिक हैं, जबकि 2015 में यह आंकड़ा 63 फीसदी था.

सरकार का ढीला रवैयाविनय कुमार बताते हैं कि इन बीमारियों की रोकथाम के लिए बच्चों को आंगनवाड़ी और स्कूल में दवाएं दिए जाने की व्यवस्था की जाती है लेकिन अधिकांशत: ये दवाएं यहां तक पहुंचती ही नहीं. उनका मानना है, कोरोना के बाद ये हालात और खराब हुए हैं क्योंकि अब ज्यादातर बच्चे स्कूल और आंगनवाड़ी जा ही नहीं रहे. जिससे यह प्रक्रिया पूरी तरह से रुक गई है और सरकार इसके लिए अतिरिक्त प्रयास भी नहीं कर रही.

फूड रैंकिंगः अच्छा खाना, बुरा खानाखाना नंबर वनशोधकर्ताओं ने खाने की 8,000 से ज्यादा चीजों को रैंकिंग दी है. 100 का स्कोर यानी सबसे सेहतमंद खाना और 1 का स्कोर यानी सबसे खराब खाना.फूड रैंकिंगः अच्छा खाना, बुरा खानासबसे अच्छा खानाइस रैंकिंग के मुताबिक सबसे ज्यादा स्कोर सब्जियों, फलों और बीजों को मिला है. लगभग सभी कच्चे फलों को 100 के आसपास ही स्कोर मिला. सब्जियों का औसत स्कोर 69.1 रहा जबकि फलों का 73.9. headtopics.com

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फूड रैंकिंगः अच्छा खाना, बुरा खानासबसे खराब स्कोरसबसे कम स्कोर मिला है स्नैक्स और मिठाइयों को. इनका औसत स्कोर 16.4 रहा. शोधकर्ताओं का कहना है कि जिन चीजों का स्कोर 30 से नीचे हैं उन्हें कम से कम खाना चाहिए.फूड रैंकिंगः अच्छा खाना, बुरा खानाऔसत खानाइस रिसर्च के मुताबिक 31 से 69 के स्कोर वाली चीजें औसत होती हैं और उन्हें कम मात्रा में खाना ही सेहतमंद होता है. जैसे स्टार्च वाली सब्जियों का स्कोर 43.2 आंका गया. अंडों को 42.67 जबकि समुद्री खानों को 67 अंक मिले.

फूड रैंकिंगः अच्छा खाना, बुरा खानापीने की चीजेंसोडा और एनर्जी ड्रिंक्स 27.6 के औसत स्कोर के साथ पीने की सबसे खराब चीजें रहीं जबकि सब्जियों के जूस को 100 अंक मिले. फलों के जूस का औसत 67 रहा.फूड रैंकिंगः अच्छा खाना, बुरा खानामांसगोमांस का स्कोर सबसे खराब 24.9 रहा जबकि समुद्री जीवों का मांस 67 के स्कोर के साथ सबसे ऊपर रहा. पोल्ट्री उत्पादन 42.67 के साथ औसत रहे.

रिपोर्ट: विवेक कुमारजानकार मानते हैं कि मिड डे मील या आंगनवाड़ी के खाने की गुणवत्ता के प्रति समाज का संदेह, भ्रष्टाचार, भोजन बनाने की ठीक व्यवस्था का न होना भी बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली वजहें हैं. वे यह भी कहते हैं कि कुपोषण की शुरुआत तो मां से ही हो जाती है. एनिमिक महिला जब प्रेग्नेंट होती है तो बच्चे के कुपोषित पैदा होने का डर रहता है. यूपी में आधी से ज्यादा महिलाओं को एनिमिया है. ऐसे में बच्चों को कुपोषण से कैसे बचा सकते हैं, वह भी बिना आयरन, फॉलिक एसिड जैसे तत्वों की कमी पूरी किए बिना?

डॉ नीलम सिंह कहती हैं,"कुपोषण कई वजहों से बना हुआ है. यह एक लंबी और कई चरण की प्रक्रिया है. शादी की उम्र, फैमिली प्लानिंग, अवेयरनेस इन सबका बहुत रोल होता है. ऐसे में किशोरावस्था से ही लड़कियों के स्वास्थ्य पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है." headtopics.com

स्वास्थ्यकर्मियों की खराब छविजानकार सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों, जैसे एएनएc, आशा और आंगनवाड़ी कर्मियों की खराब छवि को भी सरकारी प्रयासों के ढंग से लागू न हो पाने की एक वजह मानते हैं. उनके मुताबिक न ही इन स्वास्थ्यकर्मियों का ईमानदारी से, योग्यता के आधार पर चयन होता है और न ही उन्हें पर्याप्त ट्रेनिंग मिल पाती है. साथ ही उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उन्हें सम्मानजनक मेहनताना भी नहीं मिलता. इन वजहों से उनकी सोशल इमेज बहुत कमजोर होती है और कई बार महिलाएं और उनके परिवार इन स्वास्थ्यकर्मियों की बातों पर ध्यान नहीं देते.

घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएंघरेलू हिंसा जायज?राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के ताजा सर्वे के मुताबिक तीन राज्यों तेलंगाना (84 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (84 प्रतिशत) और कर्नाटक में (77 प्रतिशत) से अधिक महिलाओं ने पुरुषों द्वारा अपनी पत्नियों की पिटाई को सही ठहराया.

घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएंमहिलाओं और पुरुषों की रायएनएफएचएस ने 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुरुषों और महिलाओं की घरेलू हिंसा पर राय ली. तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की 83 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने खुद माना है कि पति द्वारा उनके खिलाफ हिंसा सही है. कर्नाटक की 80 प्रतिशत महिलाओं का ऐसा ही मानना है.

घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएंपिटाई पर पुरुषों का पक्षघरेलू हिंसा पर इसी सवाल के जवाब में सबसे अधिक कर्नाटक में (81.9 प्रतिशत) पुरुषों ने इसको जायज माना है. पत्नियों की पिटाई को सबसे कम (14.2 प्रतिशत) हिमाचल प्रदेश के पुरुषों ने जायज माना.

घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएंहिमाचल में सबसे कम सहमतिपतियों द्वारा पिटाई को जायज ठहराने वाली महिलाओं की सबसे कम संख्या हिमाचल प्रदेश में 14.8 प्रतिशत थी.घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएंक्या था सवाल?इस सर्वे में सवाल किया गया था:"आपकी राय में पति का अपनी पत्नी को पीटना या मारना जायज है?" इस सर्वे में कई तरह की परिस्थितियों को भी शामिल किया गया था.

घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएंघरेलू हिंसा का आम कारणसर्वे के मुताबिक घरेलू हिंसा को सही बताने वाले सबसे आम कारणों का हवाला दिया गया. सबसे आम कारण जो सामने आए वे थे ससुराल वालों का अनादर करना और घर व बच्चों की उपेक्षा करना.घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएं

घरेलू हिंसा एक वैश्विक समस्याभारत ही नहीं कई विकसित देशों में भी घरेलू हिंसा आम समस्या है. अमेरिका और यूरोपीय देशों में भी महिलाएं इसकी शिकार होती हैं. हर साल 25 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जाता है. इस दिन को दुनिया भर में महिला हिंसा के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है.

घरेलू हिंसा पर क्या कहती हैं भारतीय महिलाएंहिंसा की शिकार होतीं महिलाएंलैंगिक बराबरी के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएन वीमेन के मुताबिक दुनिया भर में हर तीसरी महिला के साथ शारीरिक या यौन हिंसा हुई है.रिपोर्ट: आमिर अंसारीविनय कहते हैं कि दक्षिण भारतीय राज्यों के मुकाबले आधी या उससे भी कम सैलरी पाने वाली ये स्वास्थ्यकर्मी सर्वे भरने और चुनाव की ड्यूटी करने जैसे काम भी करती हैं. ऐसे में जनस्वास्थ्य का काम कई बार प्राथमिकता नहीं रह जाता. डॉ नीलम सिंह उत्तर भारत में ऐसी कई स्वास्थ्यकर्मियों के कुशल न होने पर भी चिंता जताती हैं.

जानकार मानते हैं यूपी में सरकार की ओर से स्वास्थ्य कार्यक्रमों और बीमारियों के प्रति जागरूकता के कार्यक्रमों में भी कमी आई है, जिससे एड्स जैसी बीमारियों के बारे में लोगों की जानकारी कम हो रही है.

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अमर जवान ज्योति वॉर मेमोरियल में 'विलीन', कैसे 50 साल तक 'अंखड' रही 'ज्योति'

जिस तरह राजधानी दिल्ली की पहचान है इंडिया गेट, उसी तरह पचास वर्षों से इंडिया गेट की अमिट पहचान रही है अमर जवान ज्योति. लेकिन आज इंडिया गेट की ये पहचान खत्म हो गई और अमर जवान ज्योति नेशनल वॉर मेमोरियल में मौजूद अमर जवान ज्योति में विलीन हो गई है. इसके लिए बाकायदा आयोजन हुआ. इस सेरेमनी के दौरान अमर जवान ज्योति पर पुष्प चढ़ाकर उसका सम्मान किया गया. फिर मशालों के जरिए अमर जवान ज्योति को वॉर मेमोरियल ले जाकर वहां की ज्योति से मिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई. इंडिया गेट पर 50 वर्षों से जलती आ रही अमर जवान ज्योति बुझ गई. लेकिन इसे लेकर अब राजनीति की ज्वाला भड़क उठी है. आज खबरदार में आपको बताएंगे अमर जवान ज्योति के बारे में.