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नवनीत गुर्जर का कॉलम: बच्चियो! गलियों में खेलकर भी आओ तो हम तुम्हारे पैर धो दें!

नवनीत गुर्जर का कॉलम: बच्चियों! गलियों में खेलकर भी आओ तो हम तुम्हारे पैर धो दें! @Navneet88727599 #columnist

05-08-2021 08:10:00

नवनीत गुर्जर का कॉलम: बच्चियों! गलियों में खेलकर भी आओ तो हम तुम्हारे पैर धो दें! Navneet88727599 columnist

देश के कई हिस्सों में बाढ़ है। जहां बाढ़ नहीं है, वहां बादलों ने घेरा डाल रखा है। बादल अंधेरों की तरह घिरते जा रहे हैं। कभी-कभी बूंदें उदासी की तरह रह रहकर टपकती भी हैं, पर बादल हैं कि खुलते नहीं। धुलते नहीं… और घुलते भी नहीं। कई प्रदेशों में लम्बे समय से सूरज कहीं खो गया है। अपना चांद हमें खुद ही बेलना पड़ रहा है। बाढ़ मंद नहीं पड़ रही। नीचे पेट फुलाए हुए फैला पानी देखकर लगता है- धरती पर आसमान उत... | Girls! Come even after playing in the streets, then let us wash your feet!

नवनीत गुर्जर का कॉलम:बच्चियो! गलियों में खेलकर भी आओ तो हम तुम्हारे पैर धो दें!6 घंटे पहलेकॉपी लिंकनवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्करदेश के कई हिस्सों में बाढ़ है। जहां बाढ़ नहीं है, वहां बादलों ने घेरा डाल रखा है। बादल अंधेरों की तरह घिरते जा रहे हैं। कभी-कभी बूंदें उदासी की तरह रह रहकर टपकती भी हैं, पर बादल हैं कि खुलते नहीं। धुलते नहीं… और घुलते भी नहीं। कई प्रदेशों में लम्बे समय से सूरज कहीं खो गया है। अपना चांद हमें खुद ही बेलना पड़ रहा है। बाढ़ मंद नहीं पड़ रही। नीचे पेट फुलाए हुए फैला पानी देखकर लगता है- धरती पर आसमान उतर आया है। बेघर लोगों को लग रहा है जैसे एक आसमान उन्होंने नीचे बिछा रखा है और दूसरे को ओढ़ा हुआ है। पानी के बीच पीने के पानी को मोहताज हैं लोग। खाने का तो दूर-दूर तक जिक्र नहीं है। पता भी नहीं।

बंटवारे के समय बरती जाती सावधानी तो भारत में होता करतारपुर साहिब: राजनाथ सिंह 'कौन कब साथ आ जाए, नहीं बता सकते', उद्धव के बयान से शिवसेना-BJP गठबंधन की अटकलों को हवा 'काउंसिल को लगा कि पेट्रोल-डीजल को GST दायरे में लाने का अभी वक्त नहीं' : निर्मला सीतारमण

इसके उलट कई हिस्सों में बादल बरस नहीं रहे। छाए हुए हैं, पर न बरसते हैं, न धूप निकलने देते हैं। धूप के टुकड़े कहीं सूरज की उंगली पकड़ते हैं और अंधेरे का मेला देखते हुए भीड़ में खो जाते हैं। कहीं बूंदा बांदी होती भी है तो उमस बढ़ जाती है। बाढ़ में फंसे हुए लोग प्रार्थना कर रहे हैं कि हे! सूरज, तू बादलों के महल में सोया क्यों है? जागता क्यों नहीं? तू पूरा का पूरा न भी निकले, अगर अपना कांधा भी आगे कर दे तो हम अपनी आंखों के कलश से उसे गीला कर दें! लेकिन सूरज है कि किसी की सुनने को तैयार नहीं है। सच है, ज़हन में बसे हुए साए कभी घर की छत नहीं बन सकते, लेकिन कल्पना तो की ही जा सकती है, क्योंकि एक कल्पना ही है जो उम्रभर शरीर के अंगों की तरह हमारे साथ रहती है।

कल्पना से याद आया- हम भारतीयों ने हॉकी में बच्चियों की जीत की कल्पना कर ली। इसी कल्पना, इसी भारतीय भावना का प्रभाव था कि अर्जेंटीना से हार के बाद हमारी हॉकी प्लेयर मोनिका मलिक बिलख रही थी। टीम की अन्य बच्चियां भी फूट-फूटकर रो रही थीं। इन बच्चियों से वही भारतीय भावना कह रही है कि मत रोओ, बच्चियो! तुम अब भी महान हो। सब ने देखा कि तुमने कितना पसीना बहाया। कितना संघर्ष किया। तुम खूब लड़ीं। headtopics.com

तुम खूब भिड़ीं। अब खेल का मैदान है तो हार-जीत में से किसी को तो गले लगाना ही होता है। इस बार हार नसीब हुई है। तो क्या हुआ? कोई बात नहीं, अगली बार निश्चित ही हमें जीत मिलेगी। फिर, बच्चियो! तुम तो अगर गलियों के कीचड़ में खेलकर भी आओ तो हम तुम्हारे पैर धो दें! तुम्हारे पैरों की धूल हम अपने सिर पर रख लें।

तुमने तो हमारी हॉकी को ओलिंपिक के सेमी फाइनल तक पहुंचाने का पराक्रम किया है। ठीक है, यहां आकर हार गए, लेकिन इस हार के पीछे जाने कितनी जीत छिपी हैं, हम उन जीतों का जश्न मनाएंगे। यही भारतीय भावना है। यही भारतीय परम्परा है। तुम खेलो। खेलती रहो। आगे बढ़ती रहो!

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