कोरोना वायरस: सिर्फ़ 50 हज़ार में वेंटिलेटर बना रहे हैं युवा इंजीनियर्स

कोरोना वायरस: सिर्फ़ 50 हज़ार में वेंटिलेटर बना रहे हैं युवा इंजीनियर्स

01-04-2020 13:13:00

कोरोना वायरस: सिर्फ़ 50 हज़ार में वेंटिलेटर बना रहे हैं युवा इंजीनियर्स

भारत में वेंटिलेटर्स की कमी की बात किसी से छिपी नहीं है. कुछ युवा इंजीनियर्स इस कमी को पूरा करने की अनोखी कोशिश कर रहे हैं.

वेंटिलेटर्स को बनाने की लागतइस नए कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले हर छह में से एक मरीज़ की हालत गंभीर हो जाती है. इसमें सांस लेने में परेशानी होना भी शामिल है.दुनिया के अन्य देशों के अस्पतालों की तरह ही भारत में भी मरीज़ों की भीड़ बढ़ने पर डॉक्टरों के सामने ये सवाल खड़ा हो जाता है कि वो किसे बचाने की कोशिश करें, और किसे जाने दें.

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अभी, भारत में दो कंपनियां वेंटिलेटर बनाती हैं. इनके लिए वो विदेशों से उपकरण मंगाती हैं. इन वेंटिलेटर्स को बनाने की लागत लगभग डेढ़ लाख रुपये आती है.इनमें से एक कंपनी एगवा (AgVa) हेल्थकेयर की योजना है कि वो एक महीने में 20 हज़ार वेंटिलेटर का निर्माण करेगी.

इसके अलावा भारत ने चीन से 10 हज़ार वेंटिलेटर मंगाने का भी ऑर्डर दिया है.प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाCorona Virus का सबसे ज़्यादा ख़तरा किन लोगों को है?पोर्टेबल वेंटिलेटर के प्रोटोटाइपलेकिन इन सबसे, वेंटिलेटर की कुल संभावित मांग का बस एक छोटा सा हिस्सा ही पूरा किया जा सकेगा.

शरीर में लगाए जा सकने वाले जिस वेंटिलेटर को बनाने की कोशिश नोक्का रोबोटिक्स स्टार्ट अप कंपनी के इंजीनियर कर रहे हैं, उसकी लागत क़रीब 50 हज़ार रुपए आने का अनुमान है.काम शुरू करने के पांच दिन के भीतर ही, इस कंपनी के सात इंजीनियर्स के एक ग्रुप ने एक पोर्टेबल वेंटिलेटर के तीन प्रोटोटाइप तैयार कर लिए हैं.

इनका परीक्षण कृत्रिम फेफड़ों में किया जा जा रहा है.ये एक प्रोस्थेटिक उपकरण होता है, जो ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है और ख़ून से कार्बन डाई ऑक्साइड को अलग करता है.इस कंपनी के इंजीनियर्स की योजना है कि अगर ज़रूरी मंज़ूरी मिल गई, तो 7 अप्रैल से उनके बनाए वेंटिलेटर्स का प्रयोग मरीज़ों पर किया जा सकेगा.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाकोरोनावायरस से एशियाई देशों पर कैसा ख़तरा?एक प्रेरणादायक कहानीबेंगलुरु के जयादेवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ कार्डियोवैस्कुलर साइंस एंड रिसर्च के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर दीपक पद्मनाभन कहते हैं,"ये लक्ष्य हासिल किया जा सकता है."

डॉक्टर दीपक पद्मनाभन इस प्रोजेक्ट में नोक्का रोबोटिक्स के प्रमुख सलाहकार हैं.वो कहते हैं,"इसका प्रयोग कृत्रिम फेफड़ों पर हुआ है और वो अच्छे से काम करते दिखे हैं."सांस लेने में मदद करने वाली एक सस्ती और शरीर में लगाए जा सकने वाली देसी मशीन का निर्माण एक प्रेरणादायक उदाहरण है.

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जिसमें भारत के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े संस्थान मिल कर काम कर रहे हैं. भारत में ऐसा आम तौर पर देखने को नहीं मिलता है.आईआईटी कानपुर में बायोलॉजिकल साइंस के प्रोफ़ेसर अमिताभ बंदोपाध्याय इस प्रोजेक्ट से जुड़े प्रमुख लोगों में से हैं.प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

कोरोनावायरस: मशीन जो साबित हो सकती है वरदानवेंटिलेटर कैसे बनाए जा सकते हैं...वो कहते हैं,"कोरोना वायरस की महामारी ने हम सब को जिस तरह एकजुट कर दिया है, उसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी."नोक्का रोबोटिक्स के युवा इंजीनयरों ने इंटरनेट पर उपलब्ध वैज्ञानिक उपकरणों को तलाशा. फिर ये जानकारी जुटाई कि वेंटिलेटर कैसे बनाए जा सकते हैं.

अधिकारियों से इजाज़त लेने के बाद उन्हें पहला प्रोटोटाइप बनाने में कुल आठ घंटे लगे थे.प्रोजेक्ट से जुड़े डॉक्टरों का कहना है कि इस प्रोटोटाइप को बनाने में अमरीका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी (MIT) के बनाए कुछ डिज़ाइन ख़ास तौर से मददगार साबित हुए. अब चूंकि विदेशों से आयात ठप है.

इसलिए वेंटिलेटर बना रहे इंजीनयर्स ने फेफड़ों को ऑक्सीजन की आपूर्ति नियमित करने वाले इसके प्रमुख पुर्ज़े यानी प्रेशर सेंसर, को इस्तेमाल हो चुके ड्रोन और बाज़ार में उपलब्ध अन्य स्रोतों से हासिल किया.प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाकोरोनावायरस संक्रमण के बाद शरीर में क्या बदलाव होते हैं?

पुणे से क़रीब 400 किलोमीटरवेंटिलेटर में प्रेशर सेंसर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. क्योंकि ये फेफड़ों को इस दबाव के साथ हवा पहुंचाता है, जिससे उन्हें चोट न पहुंचे.स्थानीय अधिकारियों ने ऐसी स्थानीय कंपनियों को खुलवाने में मदद की, जहां पर वेंटिलेटर के कल-पुर्ज़े मिल सकते थे.

हर वेंटिलेटर को बनाने में डेढ़ से दो सौ तक कल पुर्ज़े लगते हैं.स्थानीय अधिकारियों ने उन इंजीनियरों को भी दोबारा उनकी कार्यशाला तक पहुंचाया, जो लॉकडाउन के कारण पुणे से क़रीब 400 किलोमीटर दूर नांदेड़ चले गए थे.कुछ बड़े भारतीय उद्योगपतियों (जिनमें मेडकिल उपकरण बनाने वाली प्रमुख कंपनी भी शामिल हैं) ने प्रस्ताव दिया है कि इन मशीनों को बनाने में उनके कारखानों का प्रयोग किया जा सकता है.

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प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाक्या एक बार कोरोनावायरस से संक्रमित होने के बाद भविष्य में उससे बचा जा सकता है?कंपनी की योजनायोजना ये है कि मई महीने तक इस प्रोटोटाइप से 30 हज़ार वेंटिलेटर तैयार कर लिए जाएं. यानी कंपनी की योजना प्रति दिन डेढ़ से दो सौ वेंटिलेटर बनाने की है.

सोशल मीडिया के असरदार लोग भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ गए हैं.लीथियम बैटरी बनाने वाले आईआईटी के छात्र रहे राहुल राज, केयरिंग इंडियन्स नाम के समूह के लिए आम जनता के बीच से पैसे जुटाने का काम किया.ताकि, इस महामारी से जूझने के लिए संसाधन और अनुभवों को इकट्ठा किया जा सके. राहुल राज के प्रयासों से 24 घंटे के भीतर एक हज़ार लोग इस अभियान से जुड़ गए थे.

राहुल राज ने बताया,"हमने एक स्थानीय सांसद और स्थानीय पुलिस से मदद मांगते हुए एक ट्वीट किया कि वेंटिलेटर बनाने वालों की मदद करें. और उन लोगों से संपर्क किया, जो ऐसे प्रोजेक्ट में दिलचस्पी ले सकते थे."प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाकोरोना और लॉकडाउन के दौर में मदद करने वाले हाथ

'बिना ताम-झाम वाली मशीन'विदेशों में काम करने वाले कई डॉक्टर और उद्यमी, उसी भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान में पढ़े हैं, जहां के ये इंजीनियर्स हैं. जैसे गूगल के सुंदर पिचाई.सुंदर पिचाई ने इन युवा इंजीनियरों से एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के ज़रिए बात की.

उन्हें सलाह देने के साथ साथ उन्होंने कुछ सवाल भी पूछे कि वो इस मशीन को कैसे विकसित कर रहे हैं.सुंदर पिचाई ने उन्हें मशीन के उत्पादन का प्रबंधन करने के लिए लगभग डेढ़ घंटे तक मशविरा दिया.एक इन्फो टेक कंपनी के पूर्व प्रमुख ने नोक्का रोबोटिक्स के जोशीले डेवेलपर्स को बताया कि वो इस मशीन के लिए कल पुर्ज़े कैसे जुटा सकते हैं.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाCorona Virus की लड़ाई में India किस देश से क्या-क्या सीख सकता है?ऑक्सीजन की आपूर्तिऔर आख़िर में, डॉक्टरों के एक ग्रुप ने इस मशीन को बनाने के हर चरण को परखा और इन युवा इंजीनियरों से मुश्किल सवाल भी पूछे.और अंत में एक दर्जन से ज़्यादा जाने माने पेशेवर लोगों, जिनमें फेफड़े के विशेषज्ञ, दिल के विशेषज्ञ डॉक्टर, वैज्ञानिक, इनोवेटर, पूंजी लगाने वाले उद्यमियों ने इन इंजीनियरों की मदद की.

डॉक्टरों का कहना है कि उनका लक्ष्य बिना ताम-झाम वाली सांस लेने में मददगार मशीन बनाने का है, जो भारतीय परिस्थितियों में कारगर साबित हो सके.वेंटिलेटर, अस्पतालों के ऑक्सीजन प्लांट से गैस आपूर्ति से चलते हैं लेकिन, भारत के बहुत से क़स्बों और गांवों में पाइप से ऑक्सीजन की आपूर्ति के संसाधन नहीं हैं.

ऐसे में ये वेंटिलेटर बनाने वाले ये भी पता लगा रहे हैं कि क्या वो ऑक्सीजन सिलेंडर से चल सकने वाले वेंटिलेटर बना सकते हैं.प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाकोरोना वायरस: नई टेक्नॉलॉजी से मिलेगी मदद?सावधान रहने की ज़रूरतडॉक्टर पद्मनाभन कहते हैं,"एक तरह से हम इस वेंटिलेटिंग मशीन का आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि उसे पुराने दौर में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, जहां हम 20 साल पहले थे."

नोक्का रोबोटिक्स के सह संस्थापक और सीईओ निखिल कुरेले कहते हैं,"हम तजुर्बेकार लोग नहीं हैं. लेकिन हमें आसानी से किसी चीज़ को बनाना आता है. हम जो रोबोट बनाते हैं, उन्हें बनाने का काम बहुच पेचीदा है. लेकिन, जान बचाने वाली ये मशीन बनाने में जोखिम है. तो हमें बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है. ताकि ऐसा उत्पाद बना सकें, जिसे हर स्तर से मंज़ूरी मिल जाए."

केवल एक हफ़्ते के अंदर ही भारत को पता चल जाएगा कि नोक्का रोबोटिक्स के ये युवा इंजीनियर अपने मक़सद में सफल रहते हैं या नहीं.प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहाकोरोनावायरस किस तरह एक से दूसरे को फैलता है और सतह पर ये कितनी देर तक ज़िंदा रह सकता है?वेंटिलेटर कैसे काम करते हैं?

मेडिकल वेंटिलेशन दो तरह से काम करता है1. मेकैनिकल वेंटिलेशन--इस्तेमाल हुई हवा (कार्बन डाई ऑक्साइड) मरीज़ के शरीर से निकाली जाती है.-सांस लेने वाली नली में एक ट्यूब डाली जाती है.-मरीज़ के फेफड़ों के भीतर ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है.मेकैनिकल वेंटिलेटर में ह्यूमिडिफायर भी होता है, जो शरीर के तापमान के हिसाब से हवा का तापमान बनाए रखता है और उसमें नमी मिलाता है.

2. बाहर से दिया जाने वाला वेंटिलेशन- और पढो: BBC News Hindi »

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