उत्तराखंड की नैनी झील कैसे तबाही की झील में तब्दील हुई - BBC News हिंदी

उत्तराखंड की नैनी झील कैसे तबाही की झील में तब्दील हुई

20-10-2021 08:48:00

उत्तराखंड की नैनी झील कैसे तबाही की झील में तब्दील हुई

उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में बारिश के सारे रिकॉर्ड टूट गए हैं और मशहूर नैनी झील से पानी ओवरफ़्लो होकर बह रहा है. प्राकृतिक आपदा में अब तक 46 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है.

Bharti Joshi/BBCइसी तरह कुमाऊँ के मैदानी इलाक़ों में भी बारिश का रिकॉर्ड टूटा है और पंतनगर मौसम विज्ञान केंद्र में 24 घंटों में 403.2 एमएम बारिश दर्ज की गई है. जबकि अब तक दर्ज आँकड़ों में 10 जुलाई 1990 को सबसे अधिक बारिश 228 एमएम दर्ज की गई थी.बिक्रम सिंह ने बताया कि बंगाल की खाड़ी से उठने वाली नम हवाओं को पश्चिमी विक्षोभ ने 75 अंश पूर्व की ओर आकर रोक दिया जिससे नम हवाएं ऊपर की ओर उठने से यह भारी बरसात हुई.

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मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक उसके हर एक केंद्र में भारी से अत्यंत भारी (हैवी टू एक्स्ट्रीमली हैवी) रेनफ़ॉल दर्ज हुआ है जो कि एक अभूतपूर्व स्थिति है. हालांकि अब यह स्थिति टल गई है और अब मौसम सामान्य हो जाएगा.नैनी झील हुई ओवरफ़्लोवहीं भारी बरसात के बीच नैनीताल की मशहूर नैनी झील के ओवरफ़्लो हो जाने से मल्लीताल में नैनादेवी मंदिर परिसर, मॉल रोड, और तल्लीताल के नया बाज़ार इलाक़े में बाढ़ आ गई और कई दुकानों और घरों में पानी भर गया.

तल्लीताल निवासी राजीव लोचन साह ने बताया, ''चारों ओर पानी से घिरे हम जैसे किसी टापू में हैं. हर तरफ़ ख़ौफनाक मंज़र है. हमने पूरी रात ऐसे ही डर में गुज़ारी है.''इमेज स्रोत,Bharti Joshi/BBCतल्लीताल कृष्णापुर में रहने वाली प्रियंका बिष्ट कहती हैं, ''मैंने अपनी ज़िंदगी में नैनी झील को ऐसे बाढ़ की तरह ओवरफ़्लो होते कभी नहीं देखा. झील से इतना पानी बह रहा है कि नया बाज़ार और भवाली रोड में दुकानों और लोगों के घरों में पानी भर गया है. लोगों का बहुत नुकसान हुआ है.'' headtopics.com

नैनीताल शहर में रहने वाले पर्यावरणविद् और इतिहासकार शेखर पाठक कहते हैं, ''इतिहास में भी नैनीताल के पास इस तरह की एक्सट्रीम प्राकृतिक परिस्थितियाँ बनीं हैं. 1920-21 में भी इसी तरह की भारी बारिश हुई थी और उससे पहले 1880 में सितम्बर की 14 से लेकर 18 तारीख में भारी बरसात के बाद नैनी झील के ऊपरी छोर की पहाड़ी पर एक बड़ा भूस्खलन आया था. जिसकी चपेट में आकर 155 लोगों की मौत हो गई थी. इस बार की भारी बरसात और बाढ़ ने यहाँ भय का माहौल पैदा कर दिया है.''

'चिपको आंदोलन' के लिए प्रसिद्ध गांव जिस पर क़ुदरत का क़हर टूटापाठक यह भी बताते हैं, ''नैनीताल झील के ज्ञात इतिहास में अब तक ऐसा ओवरफ़्लो नहीं देखा गया है. एक तो अभूतपूर्ण बरसात इसका कारण रही है, दूसरी वजह यह रही कि लेक ब्रिज में बनाया गया पानी का पैसेज भी नासमझी के साथ बनाया गया है. उसे और बड़ा बनाया जाना था. बरसात के चलते झील में पानी लाने वाले सारे ही नालों से इतना पानी आया कि उस रफ़्तार के साथ उसकी निकासी नहीं हो पाई और तल्लीताल के इलाक़े में बाढ़ आ गई.''

नैनीताल ज़िले के ही रामगढ़, रामनगर, कैंची, ओखलकॉंडा और दूसरे इलाक़ों के अलावा, उधम सिंह नगर, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चम्पावत ज़िलों में भी बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं से लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.राहत और बचाव से जुड़ी एजेंसियां बचाव कार्य में लगी हैं और वायु सेना के दो हैलीकॉप्टर भी प्रभावित इलाक़ों में राहत के लिए भेजे गए हैं. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अतिवष्टि प्रभावित क्षेत्रों का हवाई दौरा किया है और लोगों से धैर्य और संयम रखने की अपील की.

इमेज स्रोत,Bharti Joshi/BBCक्या है आपदा की वजहेंआमतौर पर मानसून के ख़त्म हो जाने बाद अक्टूबर महीने में इस तरह की भारी बरसात को लेकर पर्यावरणविद् और वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह की घटनाएँ मौसम चक्र में हो रहे परिवर्तन का स्पष्ट संकेत हैं.पीपल्स साइंस इंस्टिट्यूट से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा कहते हैं, ''यह लगातार देखा जा रहा है कि पहले जो बरसात चौमासा (बरसात के मौसम में) में हुआ करती थी, बीते समय में उसका व्यवहार अब बदल गया है. वैज्ञानिकों ने 1980 के दशक में ही यह कहना शुरू कर दिया था कि जब मौसम परिवर्तन होगा तो तापमान बढ़ेगा और जो बरसात होगी वो कम दिनों के लिए होगी लेकिन ज़्यादा भारी होगी. तो इस साल भी और हाल के सालों में भी हमने यही होते देखा है.'' headtopics.com

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रवि चोपड़ा उत्तराखंड हिमालय के कच्चे पहाड़ों के लिए इस तरह की भारी बरसात को ख़तरनाक बताते हैं, ''उत्तराखंड के पहाड़ कमज़ोर हैं. ख़ासतौर पर वहाँ, जहाँ मेन बाउंड्री फ़ॉल्ट और मेन सेंट्रल थ्रस्ट है. ऐसे में भारी बरसात में यहाँ ढेरों भूस्खलन आ जाते हैं और कई बसासतें इनकी चपेट में आ जाती हैं और दुर्घटनाएँ होती हैं.''

मौसम विभाग की ओर से 18 सितम्बर से तीन दिन के लिए डबल रेड अलर्ट जारी किया गया था और 2013 की तरह की भयंकर बारिश की आशंका जताई गई थी. जिसके बाद से उत्तराखंड के सभी ज़िलों में प्रशासन ने आपदा राहत से जुड़े कर्मियों को तैनात रहने के आदेश दे दिए थे और चारधाम यात्रा को भी रोक दिया गया था.

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