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आभासी के संजाल में

आभासी के संजाल में in a new tab)

20-09-2021 00:49:00

आभासी के संजाल में in a new tab)

दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी की घूर्णन गति चार गुनी हो गई हो।

थोड़ा पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मन में कितने ही सवाल खड़े हो जाते हैं। क्या आज के बच्चे समाज से जुड़ पाएंगे? क्या उनकी व्यवहारिकता उपयुक्त होगी? क्या वे कभी समझ पाएंगे साथ बैठना, रहना, सामाजिक दायित्व का निर्वाह है? ऐसा लगता है कि उनका हंसना-बोलना, सोना-जागना, उठना-बैठना सब कुछ इंटरनेट ही निर्धारित करता हो। कितना अंतर आ चुका है पिता और पुत्र के संबंधों और जीवनशैली में! क्या यह बदलता परिवेश हमें उन्नत कर रहा है? आज भी हम नब्बे के दशक वाले लोग हाथ चलाने से ज्यादा मुंह चलाना पसंद करते हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि हम पुराने लोग बातें करने में, मजलिस बिठाने में ज्यादा यकीन करते आए हैं। लेकिन आज के बच्चे और युवा केवल अंगुलियों के सहारे जी रहे हैं। कंप्यूटर-मोबाइल पर एक अंगुली लगाई और सारा काम हो गया। बात भी वही- चैटिंग से। मुंह को आराम ही आराम। भाई पांच-सात साल पहले तक अगर दिनभर में कोई बोल-बोल कर थक न जाए तो नींद न आए वाली बात थी।

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तकनीक का विकास, सुविधाओं की बढ़त जीवन के लिए आवश्यक है। समाज और देश के लिए अच्छा है। लेकिन सबसे जरूरी अपना विकास है जो शायद कुंठित होता जा रहा है। कारण कुछ भी हो, आज की युवा पीढ़ी स्वकेंद्रित होती जा रही है। यह अच्छा है कि अगर आप अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए कुछ निर्णय लेते हैं, लेकिन अपने दायित्व को ताक पर रख कर कार्य करना अपेक्षित नहीं। बच्चों और युवाओं को जब तक अपने कर्तव्य और दायित्व का बोध नहीं होगा, समाज की उन्नति संभव नहीं। मुझे लगता है कि कुछ समय निकाल कर परिवार और समाज को देना व्यवहारिकता का ज्ञान कराती है। यह प्रसंग भी इसलिए कि आज के बच्चे पूरी तरह समाज से कटे हुए हैं। वे न तो बाजार जाते हैं, न सब्जी-भाजी खरीदते हैं और न शाम होने पर दोस्तों के साथ मैदान में खेलने जाते हैं। उनके पास वीडियो गेम है और समय बिताने के लिए इंटरनेट है। आॅनलाइन व्यवस्था ने उन्हें और भी पंगु बना दिया है। घर से बाहर निकले बिना ही सब कुछ उपलब्ध हो रहा है। पढ़ाई भी। इस तरह वे एक ही जगह कैद होकर रह गए हैं। लोगों से मिलना, समाज में छोटे-बड़े तबकों की स्थिति को देखना, उनसे बोलना, उनकी सुनना, यह सब आज की पीढ़ी नहीं कर सकती, क्योंकि उनकी मानसिकता बदलती जा रही है।

बहरहाल, आॅनलाइन व्यवस्था ने बाजार के संघर्ष से तो लोगों को बचा लिया है, लेकिन उसी संघर्ष से उत्पन्न जीवन के मूल्य को समझने का मौका छीन लिया है। यहां एक बात और स्पष्ट है कि आॅनलाइन खरीदारी हमेशा लाभदायक नहीं होती। इसके लिए हमारी समझ और आंखें- दोनों खुली होनी चाहिए, वरना हम घाटे के शिकार हो सकते हैं। आज जिस तरह आॅनलाइन खरीद-बिक्री का जाल बिछ रहा है। हमारी बुद्धि हमें धोखा दे सकती है। इन सब बातों से बेखबर आज के बच्चे खुद को इंटरनेट का सर्वज्ञाता समझ बैठते हैं और कई गलतियां भी करते जाते हैं। headtopics.com

मैं बस इतना नहीं समझ पाती कि क्या यह कंप्यूटर-मोबाइल परिवार-समाज के साथ बिताए जाने वाले बहुमूल्य समय को कभी दे पाएंगे? एक वक्त बीत जाने के बाद यही बच्चे परिवार के मूल्य को समझेंगे, उन लम्हों को ढूंढ़ेंगे, जो उन्हें अपनों के साथ बिताने थे। लेकिन अपनी नादानी की वजह से वे उन्हें गवां चुके होंगे। परिवार, समाज, राष्ट्र एक ऐसा बंधन है जो हमें यह समझाता है कि हमारा महत्त्व क्या है और किस स्थान पर हम किस तरह काम आ सकते हैं। हम सभी एक डोर से बंधे होते हैं। कहीं न कहीं, कभी न कभी एक इंसान ही दूसरे के काम आता है। इसके लिए हमें अपनी महत्ता और व्यवहारिकता का बोध होना जरूरी है। जब तक हम समाज से नहीं जुड़ेंगे, अपना आकलन नहीं कर पाएंगे। हमारा विकास इसी समाज और राष्ट्र में निहित है। हमारी नैतिकता हमें कर्तव्य से बांधती है और हमारा कर्तव्य हमें कर्म के लिए प्रेरित करता है। उस वक्त बहुत दुख होता है जब आज के बच्चों और युवाओं को समाज और परिवार से दूर होते देखती हूं। जब सोचती हूं कि व्यक्ति का स्वार्थ उसके दायित्व से बड़ा होता जा रहा है तो पीड़ा होती है। मैं नहीं कह सकती कि यह पाश्चात्य का प्रभाव है या बदलती सोच का, लेकिन जो भी है, मानवीय मूल्यों के विपरीत है।

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