अखिलेश और जयंत का 'यूपी बदलो' का नारा मोदी-योगी के ख़िलाफ़ कितना चलेगा - BBC News हिंदी

अखिलेश यादव और जयंत चौधरी का 'यूपी बदलो' का नारा मोदी-योगी के ख़िलाफ़ कितना कामयाब होगा

07-12-2021 13:50:00

अखिलेश यादव और जयंत चौधरी का 'यूपी बदलो' का नारा मोदी-योगी के ख़िलाफ़ कितना कामयाब होगा

अखिलेश यादव और जयंत सिंह ने मेरठ की रैली में बड़ी भीड़ जुटाकर ताक़त दिखाई और कहा कि उत्तर प्रदेश में बदलाव आना तय है. वहीं गोरखपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला किया.

एपिसोड्ससमाप्तहाल में मीडिया में समाजवादी पार्टी और आरएलडी के गठबंधन को लेकर अफ़वाहों का बाज़ार गर्म था और सीटों के बंटवारे को लेकर नोकझोंक की ख़बरें आ रही थीं.इस 'परिवर्तन संदेश रैली' का एक मक़सद उन अफ़वाहों और अटकलों पर रोक लगाना भी रहा. तीन कृषि क़ानूनों के कारण पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट बहुल इलाक़े में राजनीतिक ज़मीन तैयार होने के बाद आरएलडी और समाजवादी पार्टी दोनों ही अपने पक्ष में बने राजनीतिक माहौल को क़ायम रखना चाहती हैं.

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लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉक्टर सुधीर पंवार 2017 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर पश्चिम उत्तर प्रदेश की थाना भवन सीट से विधान सभा चुनाव लड़ चुके हैं.डॉक्टर पंवार कहते हैं, "सीटों और उम्मीदवारों का एलान आने वाले समय में होगा. क़रीब-क़रीब सीटें तय हो चुकी हैं. लेकिन उनका एलान समय देख कर और स्ट्रैटेजी के साथ होगा. अगर अभी से एलान कर देंगे तो फिर भाजपा उस हिसाब से अपनी रणनीति तैयार करने लगेगी."

सीटों के समझौते के बारे में आरएलडी के प्रदेश प्रवक्ता इस्लाम चौधरी का कहना है, "सीटों पर सहमति बन चुकी है और वहां कोई मतभेद नहीं है."पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर लंबे समय से नज़र बनाए हुए नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी का कहना है, "गठबंधन फ़ाइनल है. पश्चिम की 36 सीटों पर सहमति बनी है और इसमें एक दो सीटें कम ज़्यादा हो सकती हैं. सीटों में शायद नाम नहीं खुलेंगे, लेकिन सीटों की संख्या खुल जाये. इनमे से कुछ सीटों पर यह हो सकता है कि सिंबल मेरा, कैंडिडेट तुम्हारा की बात तय हो गई हो. दोनों पार्टी दो-तीन सीटों पर ऐसा भी कर सकती है." headtopics.com

उत्तर प्रदेश की 'ग़रीबी' की चर्चा चुनाव में क्यों नहीं हो रही?दंगों की परछाई अब भी बरक़रार?सामाजिक एकता को फिर से क़ायम करने के लिए आरएलडी ने 60 से अधिक ज़िलों में "भाईचारी एकता ज़िंदाबाद" सम्मलेन किया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इन सम्मेलनों में भारी तादात में लोग शामिल भी हुए.

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वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी कहते हैं, "मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद जो यहाँ का ताना बाना टूटा था, उसे जोड़ने की कोशिश अजित सिंह ने ही कर दी थी. उन्होंने जगह-जगह भाईचारा सम्मलेन भी किया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में चौधरी जयंत सिंह और अजीत सिंह ने चुनाव अच्छा लड़ा लेकिन वो दोनों हार गए."

वो आगे कहते हैं, "किसान आंदोलन इनके लिए सियासी संजीवनी बना. पश्चिम के किसान आंदोलन में अधिकतम भागीदारी जाटों की रहती है. साथ ही अजित सिंह की कोरोना से मौत की सहानुभूति भी है, और आजकल जाट दिल्ली में चौधरियों की चौधराहट वापस मिलने की बात भी कर रहे हैं. अजित सिंह और जयंत सिंह के हारने के बाद जाट अपने आप को दिल्ली की सियासत में कमज़ोर महसूस करते थे. इसीलिए यहाँ पर जाटों के लामबंद होने से आरएलडी की स्थिति पहले से मज़बूत हो रही है."

समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए डॉक्टर सुधीर पंवार का कहना है कि जाटों और मुसलमानों में नई एकता की वजह सामाजिक नहीं बल्कि आर्थिक है.उनके मुताबिक़, "हम लोग उसे हिन्दू-मुस्लिम एकता कह कर उसका सिम्प्लिफ़िकेशन कर रहे हैं. आज सरकार की किसानों, मज़दूरों और ग़रीबों के प्रति नीतियों की वजह से एक नई सामाजिक एकता देखने को मिल रही है. जाट मुस्लिम एकता जो आर्थिक कारणों से बनी एकता है, उसे हम भाजपा के पक्ष में मज़बूत कर रहे हैं. रूरल इकोनॉमी (ग्रामीण अर्थव्यवस्था) के संकट ने लोगों को साथ किया. हक़ीक़त यह है और दिखाया यह जा रहा है कि मीटिंग में जाट-मुसलमान साथ बैठने लगे. उनमें धर्मगुरुओं ने समझौता थोड़े ही न कराया है. दोनों के साथ रहने की एक आर्थिक वजह है." headtopics.com

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इमेज स्रोत,Getty Imagesक्या हैं समीकरणपश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुसलमानों से जुड़ी राजनीति मेरठ, बागपत, बुलंदशहर, ग़ाज़ियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, हापुड़, शामली, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, संभल, आगरा, फ़िरोज़ाबाद, मथुरा जैसे ज़िलों में देखने को मिलती है.

अक्टूबर में इकोनॉमिक टाइम्स की छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पश्चिम उत्तर प्रदेश के 14 ज़िलों में लगभग 71 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें से 2017 में भाजपा ने 51 सीटें जीती थीं. पश्चिम में इतनी भारी संख्या में सीटों ने भाजपा को भारी बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी. इस रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में जाट बिरादरी के कुल 13 विधायक हैं जिससे जाटों का भाजपा को समर्थन साफ़ ज़ाहिर है.

पश्चिम उत्तर प्रदेश में सपा और आरएलडी सात प्रतिशत जाट वोट और 29 प्रतिशत मुसलमान वोट के एक साथ होने की उम्मीद लगा रही है. लेकिन अब कृषि क़ानूनों की वापसी के बाद सरकार से नाराज़ जाट वोटरों को क्या भाजपा 2022 में फिर से अपने साथ जोड़ने में कामयाब होगी?इस बारे में पत्रकार शादाब रिज़वी का कहना है, "लम्बे समय तक किसान सरकार के साथ अड़े रहे, और अब उनका झुकाव कहीं न कहीं आरएलडी की तरफ़ देखा जा रहा था. तो यह माना जा रहा है कि भाजपा का हाल 2014, 2017 और 2019 के चुनावों जैसा नहीं रहेगा. कुछ वापसी की उम्मीद ज़रूर जताई जा रही है.

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि क़ानून वापस हो गए हैं तो अब हमें भाजपा का साथ देने में कोई ख़ास परेशानी नहीं है और अगर आने वाले समय में एमएसपी, मुक़दमे वापसी और मुआवज़े की माँग भी सरकार मान लेती है तो हो सकता है कि भाजपा में जाट वोटर की कुछ वापसी की रणनीति एक हद तक कामयाब हो सकती है. headtopics.com

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तुम्हारी औकात नहीं है UP बदलने की , औकात तो सिर्फ मोदी योगी में है जो UP बदल रहे हैं| 🚩🚩जय श्री कृष्णा 🚩🚩 Mudde to kayi chunav me lekin jaha tak lag raha up chunav jati dharam bhari padne wali hai up me mudde pe जिस गाड़ी पर सपा का झंडा, उसके अंदर भारी गुंडा!_________स्व० चौधरी अजीत सिंह। सात्विक सत्य शिखर पार्टी के सक्षम श्री शिव मिश्र ही इस बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री

22 में सिर्फ अखिलेश 💯 कामयाब!! तय है बदलाव। बाइस में साईकिल। टांय टांय फिस्स। एक अच्छा काम बताओ जो इन दोनों ने यूपी के विकास और किसान के लिए किया हो एक ने केवल सैफई चमकाई और RLD जिसकी सरका उसी में मंत्री पद चाहिए बस। जनता ने सब को देखा है।

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