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World Ozone Day 2021: क्षतिग्रस्त ओजोन से आपकी थाली पर संकट, रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

क्षतिग्रस्त ओजोन से आपकी थाली पर संकट, रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा #WorldOzoneDay2021

16-09-2021 14:00:00

क्षतिग्रस्त ओजोन से आपकी थाली पर संकट, रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा WorldOzoneDay2021

एक नई रिपोर्ट के मुताबिक ओजोन की परत को नुकसान पहुंचने से दुनिया में मक्के के उत्पादन में कमी आ रही है। दरअसल ओजोन लेयर क्षतिग्रस्त होने से सूरज की बहुत की ऐसी किरणें नीचे आ रही हैं जो मक्के की पत्तियों में केमिकल संतुलन को बिगाड़ रही हैं।

ओजोन की परत में छेद होने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। ये हम सब जानते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि ओजोन परत में हुई क्षति आपकी थाली पर भी असर डालती है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक ओजोन की परत को नुकसान पहुंचने से दुनिया में मक्के के उत्पादन में कमी आ रही है।  दरअसल ओजोन लेयर क्षतिग्रस्त होने से सूरज की बहुत की ऐसी किरणें नीचे आ रही हैं जो मक्के की पत्तियों में केमिकल संतुलन को बिगाड़ रही हैं। ये खुलासा यूएस एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट की रिसर्च यूनिट यूएसडीए एआरएस ग्लोबल चेंज एंड फोटोसिंथेटिक रिसर्च यूनिट की ओर से किए गए अध्ययन में हुआ है।

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यूं हुआ शोधगौरतलब है कि सूरज से आने वाली पराबैंगनी किरणों को रोकने में ओजोन परत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस परत के चलते हम कई खतरनाक विकिरणों से बच पाते हैं। शिकागो स्थित इलिनोइस विश्वविद्यालय के शोधकर्ता 20 सालों से फसलों पर ओजोन प्रदूषण के प्रभावों का अध्ययन एक खास तरह के फॉर्म पर कर रहे हैं। जहां ओजोन के अलग-अलग स्तर का फसलों पर अध्ययन किया जा रहा है। अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने मक्के की तीन प्रजातियों पर अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि ओजोन के प्रभाव के कारण हाइब्रिड फसलों की उपज में 25 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई। वहीं पारंपरिक प्रजातियों के उत्पादन पर कुछ खास असर नहीं हुआ। वहीं हाइब्रिड मक्के के पौधे ओजोन के प्रभाव के चलते जल्दी बूढ़े होने लगे।

यह भी पढ़ेंहाइब्रिड प्रजातियां ओजोन के प्रति बेहद संवेदनशीलओजोन के चलते पौधों में ये बदलाव क्यों हो रहा है ये जानने के लिए वैज्ञानिकों ने पौधे की पत्तियों की रासायनिक बनावट का अध्ययन किया। स्टडी में पाया गया कि पारंपरिक प्रजाति के पौधे की पत्तियों में ओजोन के प्रभाव के चलते कुछ खास बदलाव नहीं हुआ। वहीं हाइब्रिड पौधे की पत्तियों में टोकोफेरोल और फाइटोस्टेरॉल केमिकल की मात्रा बढ़ गई। ऐसे में इस स्टडी से साफ पता चला की हाइब्रिड प्रजातियां ओजोन के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। headtopics.com

यह भी पढ़ेंविश्व खाद्य संगठन, (संयुक्त राष्ट्र संघ) के पूर्व मुख्य तकनीकी सलाहकार एवं परियोजना प्रबंधक डा. राम चेत चौधरी कहते हैं कि क्लाइमेट चेंज के साथ ही ओजोन की परत को नुकसान पहुंचाने का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। ओजोन के प्रभाव के चलते पौधे की पत्तियों में बनने वाली बहुत सी ऊर्जा नष्ट हो जाती है। साथ ही पत्तों में टिशूज को भी नुकसान पहुंचता है। हमें पर्यावरण को बेहतर बनाने के साथ ही आने वाले समय के लिए ज्यादा प्रतिरोध वाली प्रजातियों का विकास करने की जरूरत है।

यह भी पढ़ेंक्या है मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉलदुनिया भर में ओजोन परत को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन रोकने के लिए 1987 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता किया गया था, इसी समझौते को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल कहा गया। यह पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसने ग्लोबल वार्मिंग की दर को कुछ धीमा किया है।

एक रिसर्च के मुताबिक मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की वजह से आज धरती के तापमान में कमी आई है। मध्य शताब्दी तक पृथ्वी औसत से कम-से-कम 1 डिग्री सेल्सियस ठंडी होगी, जो कि समझौते के बिना संभव नहीं था। कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2)  ग्रीनहाउस गैस की तुलना में हजारों गुना अधिक शक्तिशाली होती है। इसलिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने न केवल ओजोन परत को बचाया, बल्कि इसने ग्लोबल वार्मिंग को भी कम कर दिया। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का क्योटो समझौते की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग पर ज्यादा असर हुआ है। क्योटो समझौते को विशेष रूप से ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। जहां क्योटो समझौते के तहत की गई कार्रवाई से सदी के मध्य तक तापमान में केवल 0.12 डिग्री सेल्सियस की कमी आई, वही मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के शमन (मिटिगेशन) से तापमान 1 डिग्री सेल्सियस कम हुआ।

यह भी पढ़ेंरिसर्च करने वालों ने पाया कि प्रोटोकॉल के कारण ध्रुवों पर बर्फ को भी पिघलने से बचा जा सकता है, क्योंकि आज गर्मियों के दौरान आर्कटिक के चारों ओर समुद्री बर्फ की मात्रा लगभग 25 फीसदी से अधिक है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल तीन दशकों से अधिक समय से ग्लोबल वार्मिंग प्रभावों को कम कर रहा है। मॉन्ट्रियल ने सीएफसी को कम किया है, इसका अगला बड़ा लक्ष्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को खत्म करना है।  headtopics.com

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UP में जनता की जान की चिंता छोड़ अब्बाजान, चचाजान की राजनीति, देखें 10 तकआज हमें जनता की जान की चिंता छोड़कर अब्बा जान, चचा जान, अम्मी जान की होती राजनीति पर दस्तक देनी है. इसीलिए हमने आज की पहली दस्तक का नाम दिया है- जब तक है जान. यहां तीन तरह की जान है. पहली आम आदमी की जान यानी जिंदगी, जो उत्तर प्रदेश में डेंगू समेत दूसरे संक्रामक बीमारियों की चपेट में आ रही है. लेकिन उसकी जान बचाने की जगह यूपी में अब्बा जान, चचा जान, अम्मी जान की चर्चा हो रही है. अब सवाल है कि क्या पेड़ के नीचे इलाज कराती जनता की पीड़ा भी क्या अब्बाजान-चाचाजान की राजनीति में दब जा रही है? देखिए 10 तक का ये एपिसोड. Vaccination के बाद ये आजतक वालों की इतनी फटने क्यों लगी है.. 😆🤣 देखिए 10Tak, Sayeed Ansari के साथ.. अफ़गान स्टेट टीवी के इंटरव्यू में देखा गया मुल्ला बरादर! 😆

महज 5.50 लाख की Triber में आसानी से फिट हो जाएगी 7 लोगों की फैमिलीRenault Triber एक दमदार फैमिली कार है जिसमें 7 लोगों का बड़ा परिवार एक बार में ही फिट हो जाता है। इतना ही नहीं आपको ये जानकर हैरानी होगी कि भारत में मिलने वाली कुछ हैचबैक कारों के कीमत Triber से भी महंगी है। सिर्फ फिट ही नही करना हैं, फैमिली को सेफ्टी के साथ गंतव्य तक पहुंचाना भी है।,, सेफ्टी मेजर क्या हैं वो बताओ ,,, पैड ट्वीट😏