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शाह बानो केस में क्यों झुके राजीव गांधी, क्या है शाह बानो केस

Shah Bano Case : 1986 में राजीव गांधी सरकार की वह गलती जिसने लिख दी कांग्रेस के पतन और बीजेपी के उभार की स्क्रिप्ट!

1986 में राजीव गांधी की वह गलती, जिसने कांग्रेस के पतन और BJP के उभार की स्क्रिप्ट लिख दी!

20-10-2021 05:57:00

1986 में राजीव गांधी की वह गलती, जिसने कांग्रेस के पतन और BJP के उभार की स्क्रिप्ट लिख दी!

35 साल बीत गए। कांग्रेस कमजोर होती गई लेकिन आज भी भी मुस्लिम तुष्टीकरण के दाग नहीं धो पाई है। आज हिंदू अस्मिता और हिंदुत्व भारतीय राजनीति में न्यू नॉर्मल है। नरेंद्र मोदी तो हिंदुत्व की राजनीति के चैंपियन के तौर पर उभरे हैं लेकिन कांग्रेस और दूसरी पार्टियां भी पीछे नहीं दिखना चाहती।

गलतियां महंगी पड़ती हैं। जितनी बड़ी गलती होगी, कीमत भी उतनी बड़ी चुकानी पड़ती है। कमजोर गलती करे तो शायद बहुत महंगी न पड़े, लेकिन जब ताकतवर गलती करता है तो बहुत ही महंगा पड़ता है। चूक बड़ी हो तो खामियाजा भी बड़ा होगा और अगर ये बड़ी चूक कोई ताकतवर करे तो बहुत ही भारी पड़ती है, कभी-कभी तो इतनी भारी कि खामियाजा पीढ़ियां भुगतती हैं। राजीव गांधी ने भी प्रधानमंत्री रहते एक ऐसी ही गलती की थी जिसका खामियाजा आज भी कांग्रेस को भुगतना पड़ रहा है। एक ऐसी गलती जिसने कभी 2 लोकसभा सीटों तक सिमटने वाली बीजेपी को लगातार दो बार अकेले दम पर पूर्ण बहुमत के करिश्मे तक पहुंचा दिया। एक ऐसी गलती जिसने सेक्युलरिज्म की पवित्रता नष्ट कर दी, सेकुलर को 'सिकुलर' रूपी गाली बना दिया। आज किस्सा राजीव गांधी की उसी गलती की।

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कट्टरपंथियों के आगे राजीव गांधी का सरेंडरसेकुलरिज्म भारतीय संविधान की तासीर में है। संविधान की प्रस्तावना में यह शब्द भले ही 1976 में इमर्जेंसी के दौरान 42वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया हो लेकिन भावना तो भारतीय संविधान के जन्म के साथ ही उसकी आत्मा में रची-बसी थी। राजीव गांधी की उस ऐतिहासिक गलती से पहले धार्मिक कट्टरता कभी भारतीय राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाई थी। हिंदू महासभा हो या इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग या फिर अकाली दल...जनता ने धर्म विशेष की राजनीति करने वाले दलों को कभी तवज्जो नहीं दी। लेकिन राजीव गांधी की उस एक गलती ने भारतीय राजनीति की सूरत बदल दी। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा महिला के पति को हर महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में आकर राजीव गांधी ने 1986 में संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। कठमुल्लों के आगे राजीव गांधी के उस शर्मनाक सरेंडर ने सेकुलरिज्म की पवित्रता ही खत्म कर दी। सेकुलरिज्म और मुस्लिम तुष्टीकरण की विभाजन रेखा मिटा दी।

डैमेज कंट्रोल के लिए एक और गलतीकट्टरपंथियों को खुश करने के लिए राजीव गांधी की उस ऐतिहासिक भूल ने तुष्टीकरण का गुब्बारा इतना फुला दिया कि उसको फटना ही था। सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगने लगे। डैमेज कंट्रोल के लिए राजीव गांधी ने एक और ऐतिहासिक भूल कर दी। इस बार हिंदू तुष्टीकरण की। 37 सालों से बंद अयोध्या के विवादित बाबरी ढांचे का 1986 में ताला खोल दिया गया। वैसे तो यह अदालती फैसला था लेकिन सरकार नहीं चाहती तो ऐसा फैसला नहीं आता। तब केंद्र के साथ यूपी में भी कांग्रेस की सरकार थी। जिला न्यायाधीश केएम पाण्डेय ने फैसले से पहले स्थानीय प्रशासन से पूछा था कि ताला खोलने से कानून-व्यवस्था से जुड़ी कोई दिक्कत तो नहीं होगी, तब उन्हें आश्वस्त किया गया था कि कोई गड़बड़ी नहीं होगी। इतने संवेदनशील मुद्दे पर बिना ऊपर से आदेश मिले स्थानीय प्रशासन अपने स्तर पर कोर्ट को भरोसा नहीं दे सकता था। ताला खुला। राजीव गांधी खुद अयोध्या पहुंच पूजा-अर्चना की। विवादित स्थल के पास ही राम मंदिर का शिलान्यास तक कर डाला। राजीव गांधी की इस दूसरी गलती से अयोध्या मामला गरमा गया। लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण के लिए बड़ा आंदोलन छेड़ दिया। उसी आंदोलन की बदौलत बीजेपी ने पहले राज्यों और फिर बाद में केंद्र में सत्ता का स्वाद चखा। आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार दूसरी बार बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में है। कई राज्यों में उसकी सरकार है। headtopics.com

आज भारतीय राजनीति में हिंदुत्व न्यू नॉर्मल आज राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा मंच से भाषण की शुरुआत दुर्गा सप्तशती के श्लोक से करती दिखती हैं, उन्हें मंच से बताना पड़ रहा है कि वह नवरात्रि का उपवास भी रखती हैं। कांग्रेस को बताना पड़ता है कि राहुल गांधी 'जनेऊधारी दत्तात्रेय गोत्री' ब्राह्मण और 'शिव भक्त' हैं। बंगाल चुनाव के दौरान ममता बनर्जी मंदिर-मंदिर घूमती दिखाई देती हैं, मंचों से दुर्गा सप्तशती का पाठ करती दिखती हैं। सेकुलर कही जाने वाली ज्यादातर पार्टियां आज सॉफ्ट हिंदुत्व की बातें करती दिखती हैं।

शाह बानो मामलाशुरुआत में शाह बानो केस का जिक्र भर था। आइए जानते हैं कि यह पूरा मामला क्या था। कहानी शुरू होती है 70 के दशक से। इंदौर में एक बड़े वकील साहब हुआ करते थे। नाम था मोहम्मद अहमद खान। शाह बानो उन्हीं की पत्नी थीं। 1975 में खान ने एक कम उम्र की लड़की से शादी कर ली और 43 साल तक साथ रही अपनी बीवी शाह बानो को उनके 5 बच्चों समेत घर से निकाल दिया। एक झटके में एक 59 साल की महिला बेघर हो गई। वकील साहब बच्चों की परवरिश के लिए कभी-कभी कुछ पैसे दे दिया करते थे लेकिन शाह बानो नियमित तौर पर हर महीने गुजारा-भत्ता की मांग कर रही थी। इसे लेकर दोनों में अक्सर विवाद होते रहते थे। 6 नवंबर 1978 को मोहम्मद अहमद खान ने शाह बानो को तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) दे दिया। मेहर की रकम का भुगतान कर खान ने दो टूक कह दिया कि आगे एक नया पैसा तक नहीं देंगे।

तीन तलाक के बाद शाह बानो ने खान से हर महीने गुजारा भत्ता की मांग को लेकर अदालत का रुख किया। मोहम्मद अहमद खान ने दलील दी कि तीन तलाक के बाद इद्दत की मुद्दत तक ही तलाकशुदा महिला की देखरेख की जिम्मेदारी शौहर की होती है, उसके बाद नहीं। मुस्लिम महिला को तलाक के बाद गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता है। दरअसल, भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक, तलाक के बाद आम तौर पर 3 महीने 'इद्दत की मुद्दत' कहलाती है। इस अवधि के दौरान महिला की देखरेख की जिम्मेदारी तलाक देने वाले पति की होती है। अगर महिला उस वक्त प्रेग्नेंट हो तो इद्दत की मुद्दत बच्चे के जन्म तक मानी जाती है। इद्दत की मुद्दत एक तरह की वेटिंग पीरियड है ताकि इस दौरान तलाकशुदा महिला दूसरी शादी कर सके। मैजिस्ट्रेट कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक उनके पक्ष में फैसला आया। खान ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। दलील दी गई कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जिस धारा 125 के तहत गुजारे-भत्ते की मांग की गई है वह मुस्लिमों पर लागू ही नहीं होता क्योंकि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा मामला है। मामला 5 जजों की संविधान पीठ में पहुंच गया। आखिरकार, 23 अप्रैल 1985 को तत्कालीन सीजेआई वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मोहम्मद अहमद खान को आदेश दिया कि वह शाह बानो को हर महीने भरण-पोषण के लिए 179.20 रुपये दिया करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में समान नागरिक संहिता का भी किया जिक्रसुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि तलाक के बाद बीवी को मेहर देने का मतलब यह नहीं कि उसे गुजारा-भत्ता देने की जरूरत नहीं है। गुजारा-भत्ता तलाकशुदा पत्नी का हक है। शीर्ष अदालत ने सरकार से भी 'समान नागरिक संहिता' की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की। इससे पहले भी कई मौकों पर कोर्ट समान नागरिक संहिता बनाने की सलाह दे चुका था। संविधान के अनुच्छेद 44 में भी कहा गया है कि राज्य भविष्य में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा। headtopics.com

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