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वाराणसी में कोरोना, वाराणसी न्यूज

AK Sharma Exclusive Interview: 'लखनऊ से काशी की यात्रा में बनाया था ब्लूप्रिंट, तुर्की से मंगाई थी कंसंट्रेटर की पहली खेप'

एक लंबे वक्त तक गुजरात सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने के बाद अरविंद शर्मा ने वीआरएस ले लिया। बीते दिनों उन्हें वाराणसी और पूर्वांचल के जिलों में कोरोना प्रबंधन के काम के लिए भेजा गया था।

12-06-2021 19:13:00

अप्रैल के दौरान कोरोना सेकंड वेव के सबसे मुश्किल वक्त में पीएम के दूत बनकर काशी पहुंचे aksharmaBharat ने कैसे किया कई बड़ी चुनौतियों का सामना...पढ़ें, NavbharatTimes के श्रेयांश त्रिपाठी को दिए खास इंटरव्यू के अंश: PMOIndia narendramodi

एक लंबे वक्त तक गुजरात सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने के बाद अरविंद शर्मा ने वीआरएस ले लिया। बीते दिनों उन्हें वाराणसी और पूर्वांचल के जिलों में कोरोना प्रबंधन के काम के लिए भेजा गया था।

हाइलाइट्स:वाराणसी में कोरोना प्रबंधन के लिए पीएमओ ने दी थी अरविंद शर्मा को विशेष जिम्मेदारीवाराणसी समेत पूर्वांचल के 7 जिलों में युद्ध स्तर पर कराई गई ऑक्सिजन की व्यवस्थाअरविंद शर्मा ने कहा- कोरोना की तीसरी लहर के लिए हम तैयार, छोटे जिलों पर विशेष ध्यान

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लखनऊअप्रैल महीने में कोरोना की दूसरी लहर के वक्त पूर्वांचल में हालात बेकाबू हो रहे थे। प्रदेश से सर्वाधिक प्रभावित 3 जिलों में वाराणसी जिला भी शामिल था। वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण मीडिया के सेंटर में था और स्थितियों के खराब होने की रिपोर्ट्स हर रोज सामने आ रही थीं। इन सब के बीच पीएम के दूत के रूप में पूर्व IAS अफसर

को वाराणसी पहुंचकर कोरोना नियंत्रण की जिम्मेदारी सौंपी गई। पीएम मोदी के सबसे खास अफसर कहे जाने वाले अरविंद शर्मा नेनवभारत टाइम्सकेश्रेयांश त्रिपाठीसे अपनी खास बातचीत में बताया कि किस तरह वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में कोरोना नियंत्रण की चुनौतियों का दिन रात की मेहनत के बाद अंत किया गया.. headtopics.com

सवाल:कोरोना के संक्रमण काल में आपको एक बड़ा काम दिया गया। जब आप दिल्ली से वाराणसी पहुंचे तो पहली चुनौतियां क्या थीं और उसको कैसे हैंडल किया?जवाब:मुझे 13 तारीख को दोपहर के वक्त प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश मिले। ये निर्देश संयुक्त रूप से पीएमओ और माननीय मुख्यमंत्री जी की ओर से थे। मैं दिल्ली से पहले लखनऊ पहुंचा और फिर वाराणसी के लिए निकला।मुझे दो कमिश्नरी की जिम्मेदारी दी गई थी। एक वाराणसी का मंडल था जिसमें चार जिले आते हैं और दूसरा, आजमगढ़ जिसमें 3 जिले आते हैं।

मैंने दोनों कमिश्नरी में बात करना शुरू किया कि क्या स्थिति है? उन लोगों ने मुझे इनपुट दिया कि यहां वेंटिलेटर, दवा आदि की कमी है। इसके बाद मैंने इस पर सोचना शुरू किया कि इन चीजों की कमी कैसे पूरी कर सकते हैं? ऐसे में बनारस से लखनऊ जाने के रास्ते में जो समय था, उसमें मैंने सोचने की कोशिश की कि ये चीजें कहां से मिल सकती हैं? बनारस पहुंचने से पहले मोटी-मोटी चीजें कि इनकी सप्लाई कहां से हो सकती है, इसका आइडिया दिमाग में आ गया था।

जब मैं वाराणसी पहुंचा तो कमिश्नर से चर्चा की। मुझे बताया गया कि एचएफएससी वेंटिलेटर, जिससे हाई फ्लो के साथ मरीज को ऑक्सिजन दी है, उसकी कमी है। उस रात कुल 54 मशीनें पूरे बनारस जिले में थीं। इसकी डिमांड काफी बढ़ गई थी। दूसरी बात कही गई कि ऑक्सिजन सिलेंडर न होने की वजह से ऑक्सिजन गैस का वितरण नहीं हो पा रहा है। तीसरी बात ऑक्सिजन प्लांट बनाने की।

'रात 1 बजे महाराष्ट्र के अफसरों से मांगी मदद'अगर ये हो जाए काफी मदद होगी। पता चला कि इसे लगाने वाली एजेंसियां कम हैं। एक औरंगाबाद में एजेंसी है। उसी की मोनोपॉली है। इसके बाद मैंने उसका डिटेल लेकर अपने कुछ महाराष्ट्र कैडर के अधिकारी मित्रों से रात 1 बजे बात की। मैंनें उन अफसरों से कि डीएम से बोलिए कि हमारी मदद करें। सुबह उन्होंने बताया कि उसके पास बहुत ऑर्डर है। वो किसी को हां नहीं बोल रहा है और नया ऑर्डर भी नहीं ले रहा है। हमने कहा कि कुछ भी करो कि वह हमारा ऑर्डर ले और उसको प्राथमिकता दे। इसमें हमने प्रधानमंत्री का भी नाम लिया कि ऐसे काम को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसके बाद अगले दिन एक वेंडर वहां से मशीन लेकर रवाना हुआ। headtopics.com

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'तुर्की और गुजरात से काशी पहुंची मदद'वेंटिलेटर के लिए मैंने भारत सरकार से बात की। कुछ प्राइवेट कंपनियों से भी बात की गई। दोनों तरफ से लोग काम पर लग गए। खुशी की बात है कि तीन-चार दिन के अंदर ही 40 वेंटिलेटर वाराणसी पहुंच गए। इनमें से 25 भारत सरकार की ओर से आए थे और 15 प्राइवेट कंपनियों से मंगाए गए। इसी तरह से ऑक्सिजन सिलेंडर की भी व्यवस्था की गई। इनमें से 2800 सिलेंडर स्थानीय उद्योगों से और 400 गुजरात से ट्रेन से मंगाए गए। एक हफ्ते के अंदर ही वो भी वाराणसी आ गए थे। इसके अलावा सीएसआर कंपनियों से ऑक्सिजन कंसंट्रेटर के लिए बात की। उन्होंने कहा कि हम मदद कर सकते हैं, लेकिन देश में कंसंट्रेटर उपलब्ध नहीं है। हम सभी ने इन कंपनियों से कहा कि देश-विदेश से कहीं से कंसंट्रेटर का इंतजाम कीजिए। इस अनुरोध को स्वीकार किया गया और इसके बाद ऑक्सिजन कंसंट्रेटर की पहली खेप तुर्की से आई। ऐसे ही रेमडेसिविर इंजेक्शन गुजरात में बनती है। हमने पुराने संबंधों का और प्रधानमंत्री जी के नाम का उपयोग करके उसकी सप्लाई सुनिश्चित की। मुझे खुशी है कि तीन-चार दिन के अंदर हमने व्यवस्था में सभी गैप भरना शुरू कर दिया और स्थिति नियंत्रण में आ गई।

वाराणसी से पूर्वांचल के कई जिलों को भेजे गए कंसंट्रेटर'स्थानीय स्तर पर बनाया गया स्पेशल कंट्रोल रूम'अरविंद शर्मा ने आगे कहा, ‘अस्पतालों में बेड्स की संख्या बढ़ाने के लिए तो स्थानीय स्तर पर ही काम करना था। सभी अस्पतालों में जा-जाकर पता लगाया। लोगों से बातचीत की। बात करने से रास्ता निकलता ही है। इस तरह से काम हुआ। दूसरे हफ्ते काफी अफरा-तफरी मची थी। हमने सोचा कि महामारी मानवीय कंट्रोल की बात नहीं है। ऐसे में मेरे विचार में आया कि क्यों न कंट्रोल रूम बनाया जाए। इसके बाद सिगरा में इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर का अध्ययन किया। हमें पता चला कि कंट्रोल रूम में लिमिटेड संख्या में फोन हैं और और उसका कोई डेडिकेटेड फोकस भी नहीं था।

'स्पेशल ट्रेनिंग देकर बताया, मरीजों से कैसे करें बात'इसके बाद मैंने वहां से बाकी विषयों पर काम करने वाले लोगों को कहा कि आप अपने-अपने ऑफिस में जाकर काम करें और फिर हमने उसका नाम काशी कोविड रिस्पॉन्स सेंटर कर दिया। यहां पर कोरोना के मरीजों से बात करने की व्यवस्था कराई गई। कुछ प्रोटोकॉल निर्धारित किए कि फोन करने वाले से क्या प्रश्न पूछने हैं। वहां काम करने वाले हर किसी को ट्रेनिंग दी गई। कंट्रोल रूम बनाने से लोगों को मार्गदर्शन मिला, जो उस समय काफी घबराए हुए थे।

सवाल:ऑक्सिजन सिलेंडर के वितरण का काम डीएम के हवाले करना पड़ा। इसकी जरूरत कैसे पड़ी।जवाब:सिलेंडर के लिए दो तरह की व्यवस्था की गई थी। डीएम उनमें इन्वॉल्व थे। डीएम जो कर रहे थे, वो अस्पतालों के लिए था। डीएम और कमिश्नर दोनों ने इसे अच्छे से हैंडल किया। इसके अलावा समानांतर रूप से एक एनजीओ की मदद से लोगों को प्राइवेट ऑक्सिजन सिलेंडर खरीदने के लिए भी व्यवस्था की गई। headtopics.com

सवाल: छोटे जिलों के अस्पतालों में वेंटिलेंटर चलाने के स्टाफ की कमी की बात सामने आई थी। इस समस्या को कैसे दूर किया गया और इसके लिए थर्ड वेव को देखते हुए क्या प्लान बनाया गया है?जवाब:ऐसा मामला बलिया में सामने आया था। वहां जब बात की गई थी तो पता चला कि वेंटिलेटर तो है लेकिन वह ऐक्टिवेट नहीं हो पा रहा है। इसके बाद वहां कंपनी वालों को बुलवाया गया और वेंटिलेटर को ऐक्टिवेट कराया गया। आने वाले वक्त के लिए भी हम ऐसी व्यवस्था कर रहे हैं कि जिन जिलों में वेंटिलेटर हैं, उन्हें चलाने की पर्याप्त व्यवस्था कर दी जाए।

वाराणसी में अफसरों से बैठक के दौरान अरविंद शर्मासवाल: वाराणसी के बीएचयू पर आसपास के जिलों का भी काफी लोड है। इसकी क्या व्यवस्था की जा रही है?जवाब:निश्चित रूप से ये बात सही है। वाराणसी के अस्पतालों में पूर्वांचल के मरीजों का लोड है। फिलहाल कोरोना के वक्त में हमने आजमगढ़ के मेडिकल कॉलेज को एक वैकल्पिक सेंटर बनाया है। इस अस्पताल को हमने ऑक्सिजन कंसंट्रेटर, वेंटिलेटर और दवाएं उपलब्ध कराया है, ताकि वाराणसी के लिए आने वाले मरीजों को एक व्यवस्था मिल सके और वाराणसी में लोड कम हो।आजमगढ़ के मेडिकल कॉलेज को सेकेंड्री प्लैटफॉर्म के रूप में खड़ा किया। इसके अलावा मऊ और बलिया में भी मदद भेजी गई। पिछले तीन दिन में 50 ऑक्सिजन सिलिंडर बलिया में, 40 मऊ में 40 आजमगढ़ में भेजे गए हैं।

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वाराणसी के सर सुंदर लाल अस्पताल में आए पूर्वांचल के सैकड़ों कोरोना मरीजसवाल: कोरोना की तीसरी लहर के मद्देनजर अब क्या तैयारियां हैं?जवाब:हाल ही में मैंने कुछ अफसरों और बाल रोग विशेषज्ञों की एक मीटिंग बुलाई थी कि थर्ड वेव में क्या करना चाहिए? इस मीटिंग में यह निष्कर्ष निकलकर आया कि स्थानीय स्तर पर पहले अस्पतालों को चिह्नित किया जाए और उनकी कमियों को दूर किया जाए। दवाओं का प्रोटोकॉल निर्धारित किया जाना चाहिए। स्टाफ को भी वेंटिलेटर-कंसंट्रेटर चलाने की ट्रेनिंग के लिए प्रोग्राम बनाया गया है। मैंने पिछले हफ्ते इस तरह की ट्रेनिंग के वर्कशॉप का उद्घाटन किया। इसमें पूर्वांचल के काफी जिलों के लोग जुड़े थे।

सवाल: वाराणसी में साढ़े 700 बेड का जो अस्पताल बनवाया गया है वह तीसरे वेव में जारी रहेगा?जवाब:इसमें कोई शक नहीं है। इस अस्पताल को अभी जारी रखा जाएगा। फिलहाल इसे हटाने का कोई भी प्रस्ताव नहीं है और सरकार इसे जारी रखने के पक्ष में है।वाराणसी में DRDO ने बनाया है 750 बेड का कोविड अस्पताल

सवाल: कोरोना की दूसरी लहर में आपसे व्यक्तिगत किसी ने मदद के लिए अप्रोच किया कि नहीं?जवाब:मुझे भी आप सभी की तरह ही दिन में सैकड़ों फोन आते थे। हर बार प्रयास किया जाता था। उद्देश्य होता था कि उन लोगों की खास मदद की जाए जो गंभीर हैं। इसके अलावा कई ऐसे मरीज होते थे, जिन्हें ये नहीं पता होता था कि कोरोना हो जाए तो करना क्या है। ऐसे लोगों की कॉल्स को कंट्रोल रूम में ट्रांसफर कर दिया जाता था ताकि वहां बैठी टीम उन्हें गाइड कर सके। कई बार छोटे-छोटे सवाल आते थे कि टीका और टेस्टिंग के लिए कहां जाएं? इसके लिए एक मैप बनवाकर टेक्नॉलजी की मदद से डॉक्टरों के नंबर और केंद्रों जैसे पब्लिक इन्फॉर्मेशन को कवच ऐप के जरिए लोगों तक पहुंचाया। कई लोगों को ऐंबुलेंस-बेड नहीं मिल रहा था, इनमें से कई मामले को कंट्रोल रूम की मदद से समाधान तक पहुंचाया गया। सारे प्रयासों से कोरोना पर रोक लगने लगी और धीरे-धीरे लोगों के फोन आने कम हो गए।

सवाल: गांवों में बुजुर्गों का टीकाकरण एक बड़ी समस्या है? वो नहीं मानते कि हमको टीका लगवाना है। इसके लिए क्या प्लान है?जवाब:बुजुर्गों के टीकाकरण को लेकर एक प्लान बनाया गया है और इसकी एक विस्तृत योजना पर काम करना होगा। जैसे-जैसे टीकाकरण के काम में आगे बढ़ेंगे, इसमें जो गैप्स हैं, उनको भरना ही पड़ेगा। इसके लिए मोबाइल यूनिट्स लेकर वाहनों पर गांव-गांव टीकाकरण के लिए जाना पड़ेगा। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।

सवाल: सरकार और व्यवस्था पर ये आरोप लगता है कि वैक्सीन की पर्याप्त सप्लाई नहीं है?जवाब:वैक्सीन का वॉल्युम बढ़ना ही है। पीएम ने कहा कि और भी लोग आ रहे हैं। स्वाभाविक रूप से सप्लाई बढ़ाने पर जोर है और ये काम जल्दी ही हो जाएगा। लॉजिस्टिक की जो समस्या है, वह भी जल्दी ही सुलझा ली जाएगी। इसमें कोई संशय की बात नहीं है। लोगों के मन में शंका है कि वैक्सीन को नहीं लगवाना चाहिए। आपके माध्यम से यही कहूंगा कि लोगों को किसी भी प्रकार का शक नहीं रखना चाहिए। वैक्सीन पूरी तरह से सुरक्षित है।

सवाल: कोरोना की पहली लहर के दौरान आप अफसर की भूमिका में थे, इस बार भूमिका MLC की है।ब्यूरोक्रेट और राजनेता, दोनों में कौन सी भूमिका आपको पसंद है?जवाब:मैं तो कहूंगा कि मुझे दोनों ही परिस्थितियां अच्छी लगती थीं। दोनों ही काम उतनी ही निष्ठा और तत्परता से किया। पहली बार जब कोरोना की लहर आई तो उस समय भी प्रधानमंत्री कार्यालय में ही था। पीएम की ओर से जो टीम बनाई गई थी, उसमें इक्विपमेंट जुटाने का जिम्मा हम पर था। मीटिंग में हम परेशान थे, कि हमारे देश में पीपीई किट, मास्क हमारे देश में बनते नहीं थे। फिर हमने कई प्राइवेट कंपनियों से बात की। मैंने स्वयं बहुत सी कंपनियों से बात की कि भाई तुम तौलिया बनाते हो तो मास्क क्यों नहीं बनाते हो। फिर उन लोगों ने बनाना शुरू किया। 15 दिन के अंदर वो गैप्स पूरे हो गए और जल्द ही भारत मास्क और पीपीई किट का एक्सपोर्टर हो गया। तो उसका (अफसरी) अपना अलग आनंद था। जनप्रतिनिधि बनने का अपना आनंद है।

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