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अयोध्या, बाबरी

...जब प्रधानमंत्री नेहरू के बार-बार कहने के बाद भी बाबरी मस्जिद में रखी मूर्तियां नहीं हटाई गईं

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6.12.2019

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पुस्तक अंश: अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद में वर्ष 1949 में मूर्ति रखने के बाद की घटनाएं यह प्रमाणित करती हैं कि कम-से-कम फ़ैज़ाबाद के तत्कालीन ज़िलाधीश केकेके नायर तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत यदि मूर्ति स्थापित करने के षड्यंत्र में शामिल न भी रहे हों, तब भी मूर्ति को हटाने में उनकी दिलचस्पी नहीं थी.

जनवरी, 1950 ई. में उस समय के फ़ैज़ाबाद के जिलाधिकारी को इस बात की सूचना मिली कि स्टार-होटल बदमाशों का अड्डा बन गया है और वहां एक व्यक्ति, जिसके पास बिना लाइसेंस का रिवाल्वर है, रह रहा है.

28 मई को एक आदमी मरा और लोगों ने उसे शीश पैगंबर की कब्रिस्तान में गाड़ दिया. गाड़ने वाले लाश को उस आदमी के घर से सीधे कब्रिस्तान ही ले गए थे. जो आदमी मरा था उसके संबंधी, बाबरी मस्जिद के निकट जो स्थान है, उसमें उस दिन सवेरे ही संभवत: कब्र खोदने के लिए गए थे.

इसके बाद उन्होंने मुगलपुरा के कब्रिस्तान में मुर्दों को गाड़ना पसंद किया ओर उसे वहीं गाड़ दिया.

इस घटना के बाद उस दिन घर में घुसने और मारपीट करने की तीन और घटनाएं हुईं. इन मामलों की पूरी जांच की गई और इस समय उनके मुकदमे चल रहे हैं.

1948 में जब समाजवादी नेता को हराने के लिए फ़ैज़ाबाद कांग्रेस ने राम जन्मभूमि का कार्ड खेला था

फ़ैज़ाबाद के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को, जिन पर उस ज़िले की जनता के सभी वर्गों का समान विश्वास है, पूरा संतोष है कि अयोध्या के मुसलमान निवासियों में असुरक्षा या भय का तनिक भी भाव नहीं है. राशनिंग के आंकड़ों से कम से कम यह तो पता चलता ही है कि मार्च, 1950 ई. में अयोध्या की जनसंख्या में लगभग 50 मुसलमान बढ़ गए हैं.

इसलिए कि शांति बनी रहे और प्रत्येक नागरिक अपने नागरिक अधिकारों का स्वतंत्रता से उपयोग कर सके और सभी नागरिकों और सभी संप्रदायों में पूरा मेल-मिलाप, एक-दूसरे पर विश्वास और सद्भावना स्थापित की जाए.

कांग्रेस के जिला महामंत्री अक्षय ब्रह्मचारी के अनुसार जब वे प्रात: जिलाधिकारी केकेके नायर के साथ बाबरी मस्जिद में रखी मूर्तियों को देखने के लिए गए थे उस समय मूर्ति आंगन में रखी हुई थी. बाद में यह मिम्बर तथा बीच गुंबद के नीचे रखी गई. श्री ब्रह्मचारी ने बताया कि केकेके नायर स्वयं उन्हें इस स्थिति को दिखाने के लिए अपने साथ ले गए थे .

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ की विशेष खंडपीठ ने अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार से 1948 तथा 1949 में जिलाधिकारी फ़ैज़ाबाद, कमिश्नर फ़ैज़ाबाद तथा शासन के बीच हुए पत्राचार की अयोध्या-मामले की फाइलों की मांग की थी. फाइलें तथा मूल प्रति न मिलने पर पीठ ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके लिए हिंदुओं को मंदिर बनाने की अनुमति उस स्थल पर दी जा सकती है, जहां रामचंद्र जी पैदा हुए थे. जहां मंदिर बनना है वह नजूल की ज़मीन है. (Akhter, Jameel, Babri Masjid: A Tale Untold, Genuine Publication & Media Pvt Ltd., News Delhi, Page 42-43)

अक्षय ब्रह्मचारी का कहना था कि अयोध्या का बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद हमारी राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गया है. यह हमारी राष्ट्रीय एकता, न्याय-व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता तथा लोकतंत्र की अग्नि-परीक्षा है.

मैंने प्रांतीय सरकार से जो पत्र-व्यवहार किए और जो जवाब भी सरकार की ओर से मुझे मिले हैं आप उन्हें पढ़कर स्वयं जान सकते हैं कि किस प्रकार गांधी और कांग्रेस के सिद्धांतों के प्रति गद्दारी करके देश को संप्रदायवादियों के हाथों क्रमश: सौंपा जा रहा है.

ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें लाश 20-22 घंटे तक पड़ी रही और मृतकों के संबंधी एक से दूसरे और तीसरे कब्रिस्तान को भगाये जाते रहे और वे बड़ी कठिनाई से लाश को दफना सके. ऐसा भी हुआ कि लाश दफनाने के बाद खोदकर फेंक दी गई या फिर अन्यत्र दफनायी गई. लेकिन सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की.

मैं इन घटनाओं को धर्म और मंदिर-मस्जिद के विवाद के रूप में न देखकर नागरिकता के अधिकार के रूप में देखता हूं. एक नागरिक यदि वह आस्तिक है तो उसे पूजा का स्थान भी चाहिए ही. यदि उसे देश में जीने का अधिकार है तो मरने पर उसे जलाने या दफनाए जाने के लिए भी दो बलिश्त जमीन चाहिए ही.

इससे अराजकतावाद, अव्यवस्था, हिटलरी आतंकवाद का दौर चलेगा जिसमें जनतंत्र का नाश हो जाएगा. (

(कौमी एकता की अग्नि-परीक्षा: अक्षय ब्रह्मचारी, वर्ष: 1989, प्रकाशक: भारतीय कौमी एकता मंडल, सत्य आश्रम, चिनहट, लखनऊ. कर्तव्य-पथ पर: अक्षय ब्रह्मचारी, गंगा फाइन आर्ट प्रेस, लखनऊ, पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट द्वारा 20 अगस्त, 1950)

यह सही है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व स्वतंत्रता-संग्राम की उपज था और काफी हद तक धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों में विश्वास करता था. महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेतृत्व की वजह से ही यह संभव हुआ कि विभाजन की विभीषिका में निर्मित यह देश अपने को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर सका.

जहां कब्रें खोदी गई थीं, वहां 9 दिन तक रामायण-पाठ और रोज़ भंडारे भी किए गए. इनमें महात्मा गांधी को भी गाली वाली नोटिसें बांटी जाती थीं. इस रामायण-पाठ और भोज में ज़िले के अधिकारियों की भी उपस्थिति रहती थी. खोदी गई कब्रों के स्थान पर शिव-मूर्ति और हिंदू देव-मूर्तियां भी स्थापित कर दी जाती थीं.

रणनीति यह थी कि विवादित ढांचा कहने से स्थल का महत्व घट जाता है, इसलिए बाबरी मस्जिद के नाम से इसे प्रचारित किया जाता था.

‘विरक्त’ के 10 जनवरी, 1950 के अंक में ये सूचनाएं प्रकाशित की गई थीं. इस सिलसिले में अक्षय ब्रह्मचारी जी की ओर से 28 मार्च, 1951 को लखनऊ में एक राष्ट्रीय एकता सम्मेलन भी आयोजित किया गया था.

ब्रह्मचारी जी के पास प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व मुख्यमंत्री आदि को लिखीं चिट्ठियां और उनके जवाब आते रहते थे. उनका प्रमुख दुख यही था कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उनके इस कार्य से इतने नाराज़ थे कि वे उनसे मिलने और बात करने की कौन कहे आलोचना ही करते थे.

प्रदेश सरकार के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को 17 जनवरी को उन्होंने कहा था कि प्रांतीय कांग्रेस कमेटी कार्यालय (लखनऊ) के सम्मुख आमरण अनशन आरंभ करने का उद्देश्य किसी प्रकार का दबाव डालना नहीं, बल्कि अपने बलिदान द्वारा पूज्य महात्मा जी के पवित्र आदेश को पहुंचाने का प्रयत्न होगा.

प्रयाग प्रांत के आरएसएस के प्रचारक नानाजी देशमुख का भी आगमन 14 जनवरी, 1950 को हुआ और इस घटना की एक खबर भी ‘ऑर्गनाइज़र’ में प्रकाशित हुई थी कि रामलला के प्राकट्य के साथ उस स्थल पर कैसे उजाला हो गया था जिससे लोग चकित हो गए थे और यह बात पुलिस के एक मुसलमान सिपाही ने बतायी थी जिसकी मौके पर ड्यूटी थी.

यह अभियान उनका था जो राम मंदिर के पक्षधर और मस्जिद के विरोधी थे. इसका नेतृत्व वही लोग कर रहे थे जिन्होंने आचार्य नरेंद्र देव के चुनाव में विरोधी की भूमिका निभायी थी. गोकुल-भवन के सामने रामआसरे यादव का मकान था. वे पहलवानी भी करते थे तथा कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता और नेता भी थे.

इसकी शिकायतें मुख्यमंत्री तथा लखनऊ के अधिकारियों से भी की गईं. वे सभी आवश्यक कार्यवाही लिखकर ज़िला प्रशासन को भेज दी जाती थीं. इस संबंध में न तो कभी कोई मुकदमा दर्ज हुआ और न कार्रवाई हुई.

एक आईसीएस अधिकारी से अमूमन अपेक्षा यही की जा सकती थी कि वह धार्मिक कठमुल्लेपन से दूर होकर कानून-व्यवस्था लागू करेगा. केकेके नायर के आचरण के बारे में कुछ भी लिखने से पहले यह उल्लेख करना उचित होगा कि त्याग-पत्र देने के बाद वे फ़ैज़ाबाद में ही बस गए.

अक्षय ब्रह्मचारी ने एक लंबे इंटरव्यू के दौरान मुझे बताया था कि उनके बार-बार यह आग्रह करने पर कि मूर्ति हटा दी जाए, केकेके नायर ने संयुक्त प्रांत के तत्कालीन चीफ सेक्रेट्री से टेलीफोन पर वार्ता की और ज़रूरी निर्देश मांगे. नायर ने अक्षय ब्रह्मचारी को बताया कि चीफ सेक्रेट्री ने प्रीमियर से दिशानिर्देश लेने की बात की है.

नायर मूर्ति रखने वालों और भविष्य में राम जन्मभूमि मंदिर बनाने के लिए आंदोलन करने वालों के लिए कितने महत्वपूर्ण थे, इसका पता इस तथ्य से भी चलता है कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के बीच की आंतरिक दीवार पर तथा कथित गर्भगृह में सिर्फ दो लोगों की तस्वीरें दीवार में चित्रित थीं. ये थीं, तत्कालीन जिलाधीश केकेके नायर और सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह की.

श्री विशम्भर दयाल त्रिपाठी तथा श्री राघव दास जैसे कांग्रेसी नेताओं ने भी इस अवसर पर अपने को असंयमित किया और अयोध्या की मस्जिद वाली सभा में प्रतिक्रियावादियों के इन कार्यों के समर्थन में भाषण दिया कि प्रजातंत्र का अर्थ ही यह है कि बहुमत जिसे पसंद करे वह हो.

जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री ज़रूर थे, पर प्रदेशों में मौजूद तत्कालीन नेतृत्व काफी मज़बूत था और कई प्रदेशों के प्रीमियर तो अपने कद-काठी में केंद्रीय नेतृत्व से किसी भी मायने में छोटे नहीं थे.

संभवत: यही मानसिकता थी कि प्रधानमंत्री नेहरू के बार-बार लिखने के बावजूद गोविंद बल्लभ पंत ने मूर्ति हटाने का फैसला नहीं लिया और स्थितियों को उस हद तक पहुंच जाने दिया जहां बाद में यदि कोई सरकार चाहती भी तो मूर्ति न हटा पाती.

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