हिंदी फिल्मों में हीरो दलित क्यों नहीं

ब्‍लॉग: हिंदी फिल्‍मों में दलित हीरो क्‍यों नहीं? तमिल सिनेमा में बड़े अभिनेता निभाते हैं रोल

27-11-2021 05:40:00

ब्‍लॉग: हिंदी फिल्‍मों में दलित हीरो क्‍यों नहीं? तमिल सिनेमा में बड़े अभिनेता निभाते हैं रोल

हिंदी फिल्मों में दलित समाज से आए लेखक और निर्देशक ना के बराबर हैं। उच्च जाति के लेखकों-निर्देशकों में दलितों के प्रति करुणा और सहानुभूति का भाव होता है। तमिल सिनेमा में लेखक-निर्देशक साथी हैं। उनके चरित्रों में बेचारगी का भाव नहीं होता।

अजय ब्रह्मात्मजहिंदी फिल्मों में दलित चरित्रों की मौजूदगी, उनके प्रति निर्देशकों के रवैये और ट्रीटमेंट की पड़ताल करें तो निश्चित ही निराशा होती है। पिछले कुछ सालों से हिंदी फिल्मों ने दलित चरित्रों पर गौर करना शायद छोड़ दिया है। दो साल पहले आई अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15’ में दलित चरित्र हैं, लेकिन वे फिल्म के नायक और मुख्य किरदार नहीं हैं। उनके हित और अधिकारों की बात फिल्म में होती है, लेकिन यह सब कुछ उच्च जाति के नायक के नेतृत्व में होता है। ‘आर्टिकल 15’ (2019) की ही तरह ‘मुल्क’ (2018) में भी ताकतवर समूह में संरक्षक का भाव है। दलित चेतना की हिंदी फिल्मों का यह कमजोर पक्ष है। खासकर हाल में आई तमिल फिल्मों के संदर्भ में देखें तो यह कमजोरी उभरकर सामने आ जाती है। हिंदी फिल्मों में नीरज घेवन की ‘मसान’ में जरूर दलित चेतना मुखर है।

हिंदी फिल्मों में दलित ही नहीं शोषित, पीड़ित, गरीब और गंवई चरित्र भी इन दिनों गायब हो गए हैं। गांव दिखते भी हैं तो उनमें गंवईपन नहीं है। गांव का जीवन अपनी कशमकश और स्पंदन के साथ इन फिल्मों में नहीं आ पाता। यों लगता है कि चरित्रों ने किसी पुश्तैनी मकान में कैंपिंग कर ली है। गांव और परिवेश से उनके तार नहीं जुड़ते। नतीजा यह होता है कि हम ग्रामीण क्षेत्रों के परिवेश और ग्रामीण सामाजिक, जातीय बुनावट तक पहुंच ही नहीं पाते।

हिंदी फिल्मों का अधिकांश माहौल शहरी और पंजाबी पॉप संस्कृति से इस कदर प्रभावित हो चुका है कि उत्तर भारत के हिंदी समाज के चरित्र भी खुशी और गम के मौके पर पंजाबी गीत गाने लगते हैं। इसी शुक्रवार रिलीज हुई ‘सत्यमेव जयते 2’ में लखनऊ और बनारस के चरित्र करवा चौथ मनाते हुए पंजाबी धुन पर थिरकते देखे जा सकते हैं। हिंदी फिल्मों के लेखकों और निर्देशकों ने दशकों में एक टेंपलेट तैयार कर लिया है, जिसमें दलित का गरीब, शोषित और पीड़ित होना लाजिमी है। वह बेचारगी में रहता है। अपने अस्तित्व के लिए ही जूझ रहा होता है। headtopics.com

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हिंदी फिल्मों में आजादी के पहले से दलित और अछूत आते रहे हैं। न्यू थिएटर्स के निर्देशक नितिन बोस की फिल्म ‘चंडीदास’ (1934) में उच्च जाति के प्रेमी और निम्न जाति की प्रेमिका की प्रेम कथा है। इसे आगा हश्र कश्मीरी ने लिखा था। अशोक कुमार और देविका रानी की फिल्म ‘अछूत कन्या’ (1936) के बारे में सभी जानते हैं। फ्रांज ओस्टन की इस फिल्म पर गांधी जी के सुधारवादी आंदोलनों का असर है। आरंभिक दौर की हिंदी फिल्मों में दलित चरित्रों के रूप में महिलाएं ही ली गईं। इन फिल्मों में नायक पुरुष और उच्च जाति के होते थे और वे उद्धार की भावना से प्रेरित रहते थे। ‘सुजाता’ (1959) गहरे प्रभाव के बावजूद इसी सीमा में नजर आती है। 1959 में ही ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘चार दिल चार राहें’ फिल्म आई थी। उसमें मीना कुमारी ने दलित लड़की चावली का किरदार निभाया था। इस चरित्र को निभाने के लिए उन्होंने अपने चेहरे का रंग सांवला किया था। चंद्रशेखर की फिल्म ‘चा चा चा’ (1964) में भी नायक दलित है।

इसके बाद समांतर सिनेमा के दौर में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, केतन मेहता, प्रकाश झा आदि फिल्मकारों ने दलित चरित्रों को महत्व दिया। उनकी स्थिति-परिस्थिति का चित्रण करते हुए उनके प्रतिरोध और विद्रोह को भी फिल्म के नेतृत्व में रखा गया। मुख्यधारा के प्रचलित प्रतिमान और चरित्रों से अलग जाकर इन प्रगतिशील फिल्मकारों ने दलित चरित्रों को सही संदर्भ देने की कोशिश की। किंतु दलित चिंतकों का एक समूह इन फिल्मों में आए दलित चरित्रों को कमजोर, निर्भर और निम्न दर्जे का मानता है। उनकी राय में उच्च जाति के निर्देशकों की वेदना और संवेदना में दलित चरित्रों की आंतरिकता नहीं आ पाती।

हिंदी फिल्मों की परंपरा से बिल्कुल अलग प्रभाव के साथ इधर की तमिल फिल्में आई हैं। सूर्या अभिनीत टी जे ज्ञानवेल की ‘जय भीम’ (2021) की विशेष चर्चा है। इस फिल्म में सिंग्गनी और राजकन्नू दलित चरित्रों के प्रतिनिधि के रूप में आए किरदार हैं। उनके मुद्दे और मसले को वकील चंद्रू कोर्ट में शिद्दत से पेश करता है। सूर्या तमिल सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता हैं। यह उचित ही कहा जा रहा है कि हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता दलित चरित्रों को निभाने का साहस नहीं कर पाते। लोकप्रिय कलाकारों की सहभागिता महत्व रखती है। इन फिल्मों के लेखकों-निर्देशकों का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। डीजे ज्ञानवेल, मारी सल्वाराज, पा रंजीत, वेत्रीरमन आदि तमिल निर्देशकों के प्रमुख चरित्र दलित समाज से आते हैं और अपने अधिकारों के साथ समाज में अपना वाजिब स्थान और महत्व हासिल करना चाहते हैं। इन चरित्रों में बेचारगी का भाव नहीं होता। निर्देशकों ने दलितों को प्रस्तुत करते हुए यह ख्याल रखा है कि वह केवल शोषित और पीड़ित ही नहीं दिखे। वह अपनी योग्यता के अनुरूप समाज में जगह पाए। खास कर पा रंजीत की फिल्मों में यह भाव स्पष्ट और प्रखर रूप में आता है।

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तमिलनाडु के दलित आंदोलनों की सफलता से लेखकों-निर्देशकों को वैचारिक आधार मिला है। तमिलनाडु की राजनीति में दलित नियामक घटक हैं। दूसरा प्रमुख तथ्य है कि ये लेखक और निर्देशक दलित समाज से आए हैं। हिंदी फिल्मों में दलित समाज से आए लेखक और निर्देशक ना के बराबर हैं। उच्च जाति के लेखकों-निर्देशकों में दलितों के प्रति करुणा और सहानुभूति का भाव है। तमिल सिनेमा में लेखक-निर्देशक साथी हैं। उनकी फिल्मों में आए दलित चरित्र आगे बढ़कर अपना हक छीनते और उसके लिए संगठित होकर लड़ते भी नजर आते हैं। पा रंजीत, मारी सल्वाराज जैसे निर्देशकों ने इन चरित्रों को दलित वैचारिकता के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी फिल्मों में दलित बिंब, प्रतीक और रूपकों में आंबेडकर के सिद्धांत और दर्शन का साफ प्रभाव दिखता है। स्पष्ट पक्षधरता रहती है। हिंदी फिल्में इससे परहेज करती हैं। headtopics.com

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