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हमारे घरों के बच्चे जेएनयू आ कर 'देशद्रोही' क्यों हो जाते हैं?

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21.11.2019

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ऐसा क्यों है कि अलग-अलग जगहों से आने वाले बच्चे यहां आकर लड़ने वाले बच्चे बन जाते हैं? बढ़ी हुई फीस का मसला सिर्फ जेएनयू का नहीं है. घटी हुई आज़ादी का मसला भी सिर्फ जेएनयू का नहीं है.

पहले वह सिर्फ जेएनयू के भीतर तक ही था अब वह पूरे मुल्क में है. वह एक आदत सा हो गया है. अब देश में कहीं भी असहमत होना ही वहां का विद्यार्थी होना सा हो गया है. जो जहां भी असहमत है वह जेएनयू वाला है. वह उस तरफ है जो असहमतियों वाला जेएनयू है.

जिस लोकतंत्र में वे शासक बनकर आए हैं, उसके लिए अतीत में जाने कितने पुरखों ने अपने खून बहाए हैं. जिनके ख़ून बहे वे सब असहमत लोग थे. जो जैसा चल रहा था उससे असहमत लोग. वे सहमत होते तो आज एक राजा होता. दुनिया में कई राजा होते. वोट देने और चुनने के हक़ को पा कर बहल जाने की मोहलत न होती. राजा के राजा होने से कुछ लोग सहमत नहीं थे. वे सब अपने समय के जेएनयू थे. जो बहा था वह इन्हीं असहमत लोगों का ख़ून था.

वे, जो आज सरकार की तरफ़दारी में बोल रहे हैं. वे, जो ताकतवरों की तरफदारी में बोल रहे हैं. वे उनकी तरफ़दारी में बोल रहे हैं जो हम पर शासन करते हैं. अपने पर शासन करने वालों की तरफ़दारी में बोलना, अपने खिलाफ़ ही बोलना है. अपने हक़ के लिए बोलना, उनके खिलाफ बोलना है. उनसे असहमत होना है. यही असहमति ही जेएनयू है.

एक यूनिवर्सिटी का डर जब इतना बढ़ जाए कि पुलिस के साथ सैन्य बल उतारने पड़ें. एक यूनिवर्सिटी का डर जब इतना बढ़ जाए कि सरकार को उसके खिलाफ़ प्रचार के लिए खर्च करना पड़े. देश के नागरिकों के भीतर अपने ही देश के बच्चों के खिलाफ़ उनका ज़ेहन भरना पड़े. घर-घर में अपने होने का दावा करने वाला प्रधानमंत्री जब डर-डर के बदला लेने की योजनाएं बनाए और बनवाए. ऐसा क्या है एक विश्वविद्यालय में. ऐसा क्यों है उस विश्वविद्यालय में?

लोगों ने लड़कर जो हासिल किया था वह लोकतंत्र के और लोकतांत्रिक होते जाने की बात थी. वह राज्य के और कल्याणकारी होते जाने की बात थी. राज्य के तरफ से जनता को वादे की बात थी. उनके दावे की बात है. उनके दावे की बात जो आज विकास और वृद्धि के नारे को दोहरा रहे हैं. जिनका समर्थन करते हुए आप साइनिंग इंडिया गा रहे हैं. जो कह रहे हैं कि सत्तर सालों में भारत पहली बार बेहतर हुआ है. फिर वह बेहतरी उन्हीं की जुबान तक क्यों रहे. आपके मकान तक क्यों न पहुंचे.

आवाम पढ़ाई का खर्च क्यों दे. जबकि सरकार छात्रों को पढ़ा कर अपने लिए मानव संसाधन तैयार कर रही. यह खर्च मां-बाप क्यों दें. वे सरकार को उसके मानव संसाधन के तौर पर अपनी औलादें तो दें. औलादों को राज्य का संसाधन बनाने के लिए लागत क्यों दें? राज्य अपने संसाधन तैयार करने के लिए दोहरी वसूली क्यों करे? जबकि संसाधन बनने के बाद अपनी मेहनत का टैक्स भी हम अदा ही कर रहे हैं.

फीस की बढ़ाई और टैक्स के पैसे की पढ़ाई का जो लोग समर्थन कर रहे हैं. वे देश से और आवाम से प्यार करने वाले लोग नहीं हैं. वे आवाम के खिलाफ खड़े लोग हैं. वे लोग इस राज्य को गिरोह में तब्दील कर देना चाहते हैं. वे उसे एक लोकतांत्रिक राज्य नहीं, उसे वसूली गिरोह बनाना चाहते हैं.

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