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Labor Laws, Strict Law

श्रम कानूनों में सुधार: क्या सभी बुराइयों के लिए सिर्फ कड़े कानून जिम्मेदार हैं?

पढ़िए श्रम कानूनों पर ये ख़ास विश्लेषण

22.7.2019

पढ़िए श्रम कानूनों पर ये ख़ास विश्लेषण

भारत में कड़े, जटिल और अलग-अलग उद्यमों पर लागू अलग-अलग श्रम कानूनों को तमाम समस्याओं का जिम्मेदार ठहराया जाता है. किसी यूनिट में कितने कर्मचारी हैं, इस आधार पर विभिन्न कानून लागू होते हैं. नए अध्ययन में सामने आया है कि कड़े और जटिल कानूनों की मौजूदगी में भी संगठित क्षेत्र और लघु उद्यमों में कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम में बढ़ोत्तरी हुई है.

तीसरा, पिछले दशक में कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरियां देने के मामले काफी उछाल आया है, क्योंकि इस दौरान स्थायी नौकरियों में वेतन कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों की तुलना में डेढ़ गुना ज्यादा रहा. वे कहती हैं कि मालिक ठेके पर नौकरियां इसलिए देता है, क्योंकि ठेका सिस्टम के जरिए स्थायी कामगारों पर दबाव बनाया जा सकता है. वे मोलभाव करने की हालत में नहीं रहते और उनकी तनख्वाहें कम रखी जाती हैं.

प्रो. नागराज कहते हैं कि यह गलत पैमाइश का मामला है. वे कंपनियां जिनमें 10 या इससे ज्यादा कर्मी होते हैं या बिजली का इस्तेमाल करती हैं, वे फैक्ट्रीज एक्ट 1948 के तहत रजिस्टर होती हैं. आर्थिक सर्वे और एएसआई के आंकड़ों की तुलना करें तो 1981 में 10 या इससे ज्यादा कर्मचारियों वाली 52% फैक्ट्रियां रजिस्टर नहीं थीं. 1991 में यह आंकड़ा 57% और 2013-14 में 66% हो गया. लेकिन ये कंपनियां कुल उत्पादन में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान देती हैं. ऐसा लेबर रेग्युलेशन और उनके लागू करने में भ्रष्टाचार के कारण है.

उनके मुताबिक, औपचारिक नियम कानून और श्रमिकों की वास्तविक समस्याओं का आपस में कोई संबंध नहीं है, क्योंकि कानूनों में तमाम खामियां रखी गई हैं जिससे फैक्ट्री मालिकों की राह आसान हो सके. इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि अलग-अलग कानूनों में वर्कर की परिभाषा ही अलग-अलग है.

जमशेदपुर स्थित XLRI के जेवियर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के प्रो. केआर श्याम सुंदर कहते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट 1970 में बदलाव के चलते भारी संख्या में कामगार कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएंगे. कामगारों का वेतन, सुरक्षा, स्थायित्व आदि खतरे में पड़ेगा, ठेका प्रथा को और बढ़ावा मिलेगा.

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