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वो तीन 'बाबा', जिन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस समझा गया

क्या थी इन बाबाओं की असलियत और जांच के बाद इनके बारे में क्या पता लगा. #DigitalPrimeTime #Kadak #GyanKiBaat

22.1.2020

क्या थी इन बाबाओं की असलियत और जांच के बाद इनके बारे में क्या पता लगा. DigitalPrimeTime Kadak GyanKiBaat

three monks whom believe as netaji subhash chandra bose including gumnami baba । news18hindi। वो तीन बाबा, जिन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस समझा गया। 50 के दशक से लेकर 80 के दशक तक तीन बाबाओं के बारे में जोर शोर से कहा गया कि वो नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे. बहुत से लोग अब भी यही मानते हैं कि वो नेताजी ही थे. लेकिन क्या थी इन बाबाओं की असलियत और जांच के बाद इनके बारे में क्या पता लगा. | knowledge News in Hindi - हिंदी न्यूज़, समाचार, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ इन हिंदी

January 22, 2020, 8:55 PM IST Share this: Arun Tiwari एक दिन बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhash Chandra Bose) का जन्मदिन है. 18 अगस्त 1945 को तायहोकु में विमान हादसे में निधन की खबर के बाद उन्हें ना जाने कितनी ही जगहों पर देखे जाने के दावे किए गए. 50 से दशक से 80 के दशक के बीच तीन बाबाओं को लोग शर्त लगाकर सुभाष चंद्र बोस बताया करते थे. बड़े पैमाने पर ये चर्चाएं देशभर में फैली हुईं थीं कि ये बाबा दरअसल नेताजी है, जो अपनी पहचान छिपाए हुए हैं. सबसे पहले ये चर्चाएं 50 के दशक के आखिर में शुरू हुईं. ये कहा जाता था कि कूच बिहार के चीन से सटी सीमा के पास शॉलमारी आश्रम में रहने वाले स्वामी शारदानंद कोई और नहीं बल्कि सुभाष ही हैं. नेताजी के कई करीबियों ने भी इसकी पुष्टि की. इसके बाद 70 के दशक में ग्वालियर के पास नागदा गांव में एक आश्रम बनाकर चुपचाप रहने वाले स्वामी ज्योतिर्देव को भी उनके अनुयायी सुभाष ही मानते थे. इससे पहले 60 के दशक के आखिर में फैजाबाद के गुमनामी बाबा का नाम सबसे ज्यादा पुख्ता तरीके से सुभाष के तौर पर लिया गया. हालांकि जांच के बाद तीनों ही बाबाओं के बारे में ये कहा गया कि वो सुभाष नहीं थे. खासतौर पर 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा गठित किए गए जस्टिस मनोज मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तीनों बाबाओं का विस्तार से जिक्र किया और ये बताया कि वो क्यों सुभाष नहीं थे. वो बाबा फर्राटे से अंग्रेजी और बांग्ला बोलता था संजय श्रीवास्तव की नई किताब"सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा" में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट और तीनों बाबाओं के बारे में विस्तार से लिखा गया है. 1959 में अचानक बंगाल का शॉलमारी आश्रम सुर्खियों में आ गया. शुरू में तो लोगों का ध्यान उस पर नहीं गया लेकिन जब आश्रम का दायरा 100 एकड़ तक जा पहुंचा तो लोगों के कान खड़े हुए. पता चला कि ये आश्रम किसी साधू शारदानंद का है. फिर बंगाल की बड़ी बड़ी हस्तियों और अफसरों से उनसे मिलने की खबरें आने लगीं. साधू शारदानंद फर्राटे से बंगाली और अंग्रेजी बोलते थे. महंगी सिगरेट और शराब पीते थे. यहां तक कि सुभाष के कई करीबियों ने इस बाबा से मिलने के बाद ये दावा किया कि वो कोई और नहीं बल्कि सुभाष ही हैं. कौन था असल में शॉलमारी आश्रम का बाबा ये बाबा हमेशा अपना चेहरा ढंककर रहते थे. अपनी फोटो नहीं खींचने देते थे. अंगुलियों की छाप से बचने के लिए रुमाल का इस्तेमाल करते थे. न तो एक्स-रे कराते थे और न ही ब्लड टेस्ट. 1961 में राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने शॉलमारी आश्रम के बाबा की जांच करनी शुरू की. बाद में आश्रम ने खुद स्पष्टीकरण दे दिया कि न तो उसके साधू और संस्थापक स्वामी शारदानंद सुभाष हैं और ना ही उनका उनसे कोई लेना-देना है. बाद में इस साधू के बारे में पता लगा कि वह जतिन चक्रवर्ती थे. रिवोल्यूशन पार्टी के सदस्य थे. वो एक अंग्रेज जिलाधिकारी की हत्या करके फरार हो गए थे. बाद में स्वामी शारदानंद ने शॉलमारी आश्रम छोड़ दिया. वो कई स्थानों पर घूमते हुए देहरादून पहुंचे. वहां कई साल तक रहे. वहीं 1977 में उनका निधन हो गया. हालांकि अब भी कई लोग मानते थे कि वो ही सुभाष थे. नागदा के रहस्यमय स्वामी ज्योतिर्देव मध्य प्रदेश में ग्वालियर के करीब एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है श्योपुर कलां. इसके पास ही एक गांव है नागदा. 70 के दशक में एक साधू यहां आकर आश्रम बनाकर रहने लगा. वो भी हमेशा पहरे में रहता था. लोगों से मिलता-जुलता नहीं है. गांववालों का मानना था कि निकटवर्ती गांव में एक विमान दुर्घटना में वो साधू बच गए थे. फिर वो वहीं रहने लगे. ये हैं बाबा ज्योतिर्देव, जिनके बारे में कहा गया कि वो सुभाष चंद्र बोस हैं. वो ग्वालियर के करीब एक गांव नागदा में अचानक प्रगट हुए और आश्रम बनाकर रहने लगे दस्तावेजों से पता लगा वो नेताजी नहीं थे इन साधू को उनके अनुयायी स्वामी ज्योतिर्देव कहते थे. गांववाले कहते थे कि वो लगातार सीनियर अधिकारियों से पत्र-व्यवहार करते थे. वो गांव के बाहर भी जाते थे. उनका निधन भी मई, 1977 में हो गया. उनके निधन के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने उनके सारे रिकॉर्ड अपनी सुपुर्दगी में ले लिये. हालांकि पुलिस ने जब इन दस्तावेजों की जांच की तो उससे साबित नहीं हुआ कि वो सुभाष थे. सबसे ज्यादा चर्चा हुई गुमनामी बाबा की जिस बाबा की सबसे ज्यादा चर्चा सुभाष के रूप में हुई, वो फैजाबाद के गुमनामी बाबा थे. मुखर्जी आयोग के सामने कई लोगों ने दावा किया कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. जो स्तालिन के निधन के बाद सोवियत संघ से बच निकले. फिर भारत आ गए. यहां वो कई स्थानों पर रहे. फिर फैजाबाद में स्थायी वास किया. गुमनामी बाबा के 1985 में निधन के बाद जब सामान देखा गया तो उसमें जो सामान थे, उसमें सुभाष के पारिवारिक चित्र, किताबें, सुभाष द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले गोल ऐनक, महंगी सिगरेट, लाइटर, सिगार, रोलैक्स घड़ियां और ना जाने कितने ही सामान थे. किताब सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा, जिसमें सुभाष के रहस्य से जुड़े तमाम अनछुए तथ्यों पर रोशनी डाली गई है गुमनामी बाबा की सहायिका के बेटे की गवाही मुखर्जी आयोग के सामने कई लोगों ने गवाही दी, इसमें एक गवाह थे राजकुमार शुक्ला, जो गुमनामी बाबा की सहायिका सरस्वती देवी के पुत्र थे. वो आयोग के सामने इसलिए नहीं आ सकीं, क्योंकि उनकी मृत्यु हो चुकी थी. राजकुमार शुक्ला ने बताया कि उनकी मां 1955-56 में श्रृंगार नगर, लखनऊ में गुमनामी बाबा उर्फ भगवान जी के संपर्क में आईं. फिर 16 सितंबर 1985 तक उनके साथ काम करती रहीं. राजकुमार शुक्ला का कहना था कि उनकी मां उन्हें बताती थीं कि बाबा के पास कोलकाता से कई लोग लगातार मिलने आया करते थे, जिसमें आजाद हिंद फौज से ताल्लुक रखने वाले लोग भी थे. मुखर्जी आयोग ने गुमनामी बाबा के बारे में क्या कहा शुक्ला ने आगे कहा कि उनकी मां ने भी बाबा का चेहरा कभी नहीं देखा लेकिन वो कहती थीं कि गुमनामी बाबा ही सुभाष हैं. हालांकि शुक्ला ने आयोग के सामने जो सबूत दिए वो नाकाफी थे. आयोग के सामने पेश हुए कोई भी शख्स इस बारे में कोई सबूत नहीं दे सका. आयोग गुमनामी बाबा के पास से मिले बहुत से सामानों को अपने साथ कोलकाता लेकर गया. जहां उसकी जांच हुई. बाद में मुखर्जी आयोग ने ये निष्कर्ष निकाला कि गुमनामी बाबा किसी भी हालत में सुभाष नहीं हो सकते. आयोग का निष्कर्ष था कि ना तो गुमनामी बाबा की हैंड राइटिंग सुभाष से मेल खाती है और ना ही उनके दांतों का डीएनए सुभाष के परिवार से मिलान करने पर मिल पाया. हालांकि आयोग ने माना कि वो निश्चित रूप से सुभाष के करीबी रहे होंगे. बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने गुमनामी बाबा की जांच के लिए विष्णु सहाय आयोग की नियुक्ति की. इस आयोग ने भी वही बात कही, जो मुखर्जी आयोग ने कही थी. ये भी पढ़ें और पढो: News18 India

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सुभाष चंद्र बोस के पोते ने कहा- जिन्ना धर्मनिरपेक्ष नेता थे, कांग्रेस के सांप्रदायिक नेताओं के कारण बंटवारा हुआभाजपा उपाध्यक्ष चंद्र कुमार बोस ने कहा- मोहम्मद अली जिन्ना को लगा कि वे भारत में सत्ता साझा नहीं कर सकते थे उन्होंने कहा- जिन्ना का 1955 में निधन हो गया, उसके बाद पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र बन गया | CK Bose said Jinnah was secular leader; India got divided because of communal leaders of Congress regime Chandrabosebjp INCIndia DilipGhoshBJP AITCofficial MamataOfficial नेता जी की सोच को उनके संबंधियों में खोजना सही नहीं है।। Chandrabosebjp INCIndia DilipGhoshBJP AITCofficial MamataOfficial JPNadda AmitShah ऐसे मुर्ख बिना बेस वाले लोगो को पार्टी में कब तक बर्दास्त किया जाएगा? Chandrabosebjp INCIndia DilipGhoshBJP AITCofficial MamataOfficial he will be joining TMC shortly



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