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विभिन्न मानवाधिकार उल्लंघनों के बीच आयोग के अध्यक्ष द्वारा सरकार की तारीफ़ के क्या मायने हैं

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18-10-2021 11:28:00

विभिन्न मानवाधिकार उल्लंघनों के बीच आयोग के अध्यक्ष द्वारा सरकार की तारीफ़ के क्या मायने हैं HumanRights NHRC ModiGovt JusticeArunMishra मानवाधिकार मानवाधिकार आयोग एनएचआरसी मोदीसरकार जस्टिसअरुणमिश्रा

जिस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को देशवासियों के मानवाधिकार ों की रक्षा करने, साथ ही उल्लंघन पर नज़र रखने के लिए गठित किया गया था, वह अपने स्थापना दिवस पर भी उनके उल्लंघन के विरुद्ध मुखर होने वालों पर बरसने से परहेज़ न कर पाए, तो इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है कि अब मवेशियों के बजाय उन्हें रोकने के लिए लगाई गई बाड़ ही खेत खाने लगी है?

अट्ठाइस साल पहले जिस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को देशवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा करने, साथ ही उल्लंघन पर नजर रखने के लिए गठित किया गया था, वह अपने स्थापना दिवस पर भी उनके उल्लंघन के विरुद्ध मुखर होने वालों पर बरसने से परहेज न कर पाए, तो इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है कि अब मवेशियों के बजाय उन्हें रोकने के लिए लगाई गई बाड़ ही खेत खाने लगी है?

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यही तो कि पिछले सात सालों से लगातार होता आ रहा संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण उस मुकाम पर जा पहुंचा है, जहां आम आदमी को उनसे कोई संरक्षण मिलने की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह जाती! लेकिन अब मामला इतना ही नहीं है.देश के जिस सबसे संवेदनशील राज्य कश्मीर में मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा उल्लंघन होता है और जिसे रोकने के लिए केंद्र सरकार के पेंच कसे रखना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दायित्व है, गृहमंत्री अमित शाह की मार्फत उसे वहां ही नहीं, पूर्वोत्तर के सारे राज्यों में

शांति के नये युग आगाजहोता दिखाई देने लगा है और उसके अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा इसके लिए गृहमंत्री की तारीफ में अपने पद की संवैधानिक गरिमा की रक्षा की भी परवाह नहीं कर रहे.तिस पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये आयोग के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी कतई यह चिंता नहीं होती कि उनके राज में देश भर में मानवाधिकारों का हाल बुरा हो गया है और उनके बढ़ते उल्लंघनों के कारण अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सूचकांकों में देश की रैंकिंग नीचे गिरती जा रही है. इसके बरक्स वे चिंता जताते हैं कि कुछ लोगों द्वारा, जाहिर है, उनका संकेत अपने विरोधियों की ओर ही था, मानवाधिकारों की रक्षा और उनके उल्लंघनों को लेकर ‘सलेक्टिव एप्रोच’ से काम लिया जाता है. headtopics.com

प्रधानमंत्री के ही शब्दों में कहें तो ‘मानवाधिकार का बहुत ज्यादा हनन तब होता है, जब उसे राजनीतिक रंग से देखा जाता है, राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, राजनीतिक नफा-नुकसान के तराजू से तौला जाता है.’ और ‘इस तरह का सलेक्टिव व्यवहार लोकतंत्र के लिए भी उतना ही नुकसानदायक होता है.’ आगे वे अपनी बात में यह जोड़े बिना भी नहीं रह पाते कि हाल के वर्षों में कुछ लोग मानवाधिकारों की व्याख्या अपने-अपने तरीके से, अपने-अपने हितों को देखकर करने लगे हैं. एक ही प्रकार की किसी घटना में कुछ लोगों को मानवाधिकार का हनन दिखता है और वैसी ही किसी दूसरी घटना में उन्हीं लोगों को मानवाधिकार का हनन नहीं दिखता.

समझना कठिन नहीं है कि यह सब कहने के पीछे प्रधानमंत्री की ‘पॉलिटिक्स’ क्या है? लेकिन अगर वे हर नागरिक के मानवाधिकारों की सुरक्षा की अपनी सरकार की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर कहना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति या संगठन का किसी एक मामले में मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठाना या उसे लेकर संघर्ष करना तब तक गर्हित माना जायेगा, जब तक वह मानवाधिकार उल्लंघन के वैसे सारे मामलों को लेकर आवाज नहीं उठाता तो निस्संदेह, यह मानवाधिकार उल्लंघन रोकने के बजाय उसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को ही रोक देने की कवायद है.

ऐसे में यह सवाल कहीं ज्यादा मौजूं हो जाता है कि क्या किसी एक मामले में, उसके पीड़ित अपने हां या पराये, मानवाधिकार उल्लंघन के खिलाफ मुखर होना चाहने वालों को इसके लिए तब तक इंतजार करना चाहिए, जब तक वे ऐसे सारे मामलों पर मुखरता का बोझ उठाने में समर्थ न हो जायें?

लेकिन कोई तो बताए कि वे इतने समर्थ क्योंकर हो सकते हैं? वे कोई सरकार नहीं हैं न.सच पूछिए तो यह देखना और सुनिश्चित करना तो सरकारों का काम है कि देश में कहीं भी किसी भी व्यक्ति के मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो. कोई नागरिक या स्वयंसेवी संगठन तो जिस भी मामले में जिस भी तरह से अपनी पसंद के हिसाब से चुनकर ही सही ऐसे जो भी मामले सरकार के संज्ञान में लाता है, तो उसकी मदद ही करता है. वह सरकारों को रोकता तो नहीं है, कायदे से कहना चाहिए कि रोक ही नहीं सकता, कि वह दूसरे ऐसे मामलों में मानवाधिकार हनन न रोके, जिन्हें वह नहीं उठा रहा. headtopics.com

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लेकिन हद है कि इस मदद के लिए उसके कृतज्ञ होने के बजाय प्रधानमंत्री अब उसकी सलेक्टिव होने की सहूलियत भी छीन लेना चाहते हैं. यह वैसे ही है जैसे किसी मामले में गवाही देने गए व्यक्ति से पूछ रहे हों कि तुम इसी एक मामले में गवाही क्यों दे रहे हो, बाकी मामलों में क्यों नहीं दे रहे?

दूसरी ओर बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानअल्ला की हालत है! राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा ने भी ‘फैसला’ सुना दिया है कि ‘मानवाधिकारों के संरक्षक’ व्यक्ति और स्वयंसेवी संस्थाएं मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले ही उठाते रह गए और उन्होंने राजनीतिक हिंसा व आतंकवाद की कड़ी निंदा नहीं की या करने को लेकर उदासीन रह गए, तो इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा.

इतना ही नहीं, वे कहते हैं कि भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बेहतर काम हो रहा है क्योंकि हमारा लोकतांत्रिक ढांचा विवादों के शांतिपूर्ण व कानूनी निवारण में यकीन रखता है. यानी कोई समस्या नहीं है और जब समस्या ही नहीं है तो कुछ करने या चिंतित होने की जरूरत ही क्या है? इस सवाल को आगे बढ़ाएं तो फिर मानवाधिकार आयोग की भी भला क्या जरूरत है?

इस सिलसिले में एक और बात काबिल-ए-गौर है. संयुक्त राष्ट्र ने 1948 में दस दिसंबर को मानवाधिकारों का जो चार्टर जारी किया था और जिस पर भारत समेत दुनिया के प्रायः सारे सभ्य व लोकतांत्रिक देशों ने हस्ताक्षर किए हुए हैं, उसमें मानवाधिकारों को यथोचित रूप से परिभाषित किया गया है. उन्हीं परिभाषाओं को स्वीकारते हुए भारत ने 1993 में मानवाधिकार संरक्षण कानून बनाया और उसी साल 12 अक्तूबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की. उद्देश्य था: मानवाधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देना. उनके उल्लंघन का संज्ञान लेना, उसकी जांच करना और सार्वजनिक प्राधिकारों द्वारा पीड़ितों के लिए मुआवजे आदि की सिफारिश करना. headtopics.com

लेकिन अब प्रधानमंत्री और इस आयोग के अध्यक्ष दोनों मिलकर संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत मनुष्यमात्र को हासिल मानवाधिकारों को अपनी संकीर्ण ‘राष्ट्रवादी’ परिभाषाओं और व्याख्याओं के हवाले करने के फेर में लगते हैं. इसीलिए प्रधानमंत्री उक्त चार्टर की बात नहीं करते. कहते हैं कि ‘हमने सदियों तक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया. एक राष्ट्र के रूप में, एक समाज के रूप में अन्याय-अत्याचार का प्रतिरोध किया. एक ऐसे समय में जब पूरी दुनिया विश्व युद्ध की हिंसा में झुलस रही थी, भारत ने पूरे विश्व को ‘अधिकार और अहिंसा’ का मार्ग सुझाया.’

उनकी बात मान लेते हैं, सुझाया होगा भाई, लेकिन अभी तो सवाल कुल मिलाकर इतना-सा है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत जिन मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय गारंटी है, उनकी भारत में क्या हालत है? अगर उनकी रक्षा को लेकर कोई समस्या ही नहीं है, जैसा कि आयोग के अध्यक्ष ने कहा है, तो सूचकांकों में देश की रेटिंग लगातार गिरती क्यों जा रही है? क्या सरकार और आयोग को उसे गिरने से बचाने की जिम्मेदारी याद दिलाने वालों के कारण?

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ऐसा है तो क्या इसका एक अर्थ यह भी नहीं कि आयोग के अध्यक्ष द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में जज के रूप में कार्यरत रहते ‘ग्लोबल थिंकिंग से संपन्न इंटरनेशनल जीनियस’ के रूप में प्रशंसित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अब, ‘जम्मू कश्मीर समेत पूरे पूर्वोत्तर में शांति का नया युग लाने वाले’ नायक के रूप में प्रशंसित गृहमंत्री अमित शाह पर ये सरकार को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाने वाले भारी पड़ रहे हैं? भला क्यों?

क्या इसीलिए नहीं कि मानवाधिकार रक्षकों को कोसने वाली सरकार ने खुद सलेक्टिव एप्रोच अपनाकर लोकतंत्र को खतरे में डाल रखा है?(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.) और पढो: द वायर हिंदी »

वारदात: तेज हो गई समीर-नवाब की तकरार, क्या है स्कूल सर्टिफिकेट की सच्चाई?

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के मुंबई के जोनल हेड समीर वानखेड़े के बर्थ सर्टिफिकेट और मैरिज सर्टिफिकेट के बाद महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नवाब मलिक कथित रूप से उनके ये दो नए सर्टिफिकेट लेकर आए हैं. नवाब मलिक के मुताबिक समीर दादर के सेंट पॉल हाईस्कूल से प्राथमिक शिक्षा ली थी. इस सर्टिफिकेट में समीर वानखेड़े का नाम वानखेड़े समीर दाऊद लिखा है. यहां ये भी लिखा है कि छात्र की जाति और उपजाति तभी बताई जाए जब वो पिछड़े वर्ग, या अनुसूचचित जाति-जनजाति से आए. जबकि धर्म के कॉलम में लिखा है मुस्लिम. इसके बाद समीर वडाला के सेंट जॉसेफ हाईस्कूल में पढने गए. यहां के स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट में समीर का नाम वानखेड़े समीर दाऊद लिखा है. और धर्म के कॉलम में लिखा है मुस्लिम. दरअसल नवाब मलिक समीर वानखेड़े को मुसलमान साबित करने के लिए इसलिए जुटे हैं क्योंकि अगर उनकी बात सही साबित हो गई तो समीर वानखेड़े के नौकरी खतरे में पड़ जाएगी. देखें वीडियो.

राज्यसभा जाना है। राज्य सभा की सीट किसी भी आयोग के अध्यक्ष को सरकार की तारीफ की जरुरत क्यौ पडी? बीच बीच मे सरकार की तारीफ या सरकार के कशिदे गढना उनके फर्ज मे शामील है? सरकार इस तरह तारीफें बटोर रही है। फिर बावन पत्तों मे 4 गुलाम भी तो होते है। योगी और मोदी का एकी नारा.....! 'ना घर बसा हमारा' 'ना बसने देगे तुम्हारा'।

Inko b rajyasabha ya loksabha jana hoga tabhi to desh ko barbaad krne walo k gungaan kr the.. ashoswai

मार्टिना नवरातिलोवा की चुटकी देश के ‘नायकों’ की अंतरराष्ट्रीय ‘प्रतिष्ठा’ की बानगी हैगृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 'तानाशाह' होने के आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि देश में उनसे ज़्यादा लोकतांत्रिक नेता हुआ ही नहीं है, जिस पर अमेरिका की प्रख्यात टेनिस खिलाड़ी मार्टिना नवरातिलोवा ने चुटकी ली थी.

सिंघु बॉर्डर पर युवक की हत्या में एससी आयोग एक्टिव: आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने की हरियाणा के DGP और हाईकोर्ट के सचिव से बात, आयोग की निगरानी में चलेगी पूरी कानूनी प्रक्रियासिंघु बार्डर पर तरनतारन के लखबीर सिंह की हत्या का राष्ट्रीय अनुसूचित जाति (एससी) आयोग ने संज्ञान लिया है। एससी आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा नेता विजय सांपला ने इस मुद्दे पर हरियाणा के DGP पीके अग्रवाल और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सचिव से बात की है। इस मामले से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया एससी आयोग की निगरानी में होगी। | सिंघु बार्डर पर तरनतारन के लखबीर की हत्या का मामला अब जातीय रंग लेता दिख रहा है। इस पूरे मामले पर पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने संज्ञान लिया है। आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा नेता विजय सांपला ने मामले के संबंध में DGP हरियाणा और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के सचिव से बात की है। CMOPb इस किसान आंदोलन से दलित समाज के लोग अपने अपने घर चले जाएं इनकी 2 दिन अक्ल ठिखाने आ जायेगी RakeshTikaitBKU GurnamsinghBku दोगलों CMOPb कुर्सी है कोई जनाज़ा थोड़ी है। कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते? SinghuBorder SinghuBorderHorror

आतंकियों ने दो गैर कश्मीरियों की हत्या की: श्रीनगर में बिहार के रेहड़ीवाले को गोली मारी, पुलवामा में यूपी के मिस्त्री की हत्या कीजम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने शनिवार को एक बार फिर बाहरी नागरिकों की हत्या कर दी। आतंकियों ने श्रीनगर के ईदगाह इलाके में बिहार के एक रेहड़ीवाले को गोली मार दी। गंभीर स्थिति में उसे श्रीनगर के SMHS अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मारे गए व्यक्ति का नाम अरविंद कुमार साह है। वह बिहार के बांका जिले का रहने वाला है। | Kashmir Terrorist Attack News and Updates; A Non Local Vendor From Bihar Killed By Terrorists In Srinagar NitishKumar ImRavinderRaina Aatngwadi ka jat aur dharm yehi hai. Puri duniy ko bata do. NitishKumar ImRavinderRaina बहुसंख्यक समाज मे नफरत फैलाने में ये अखबार का बहुत बड़ा हाथ है कश्मीर में अब तक 22 मुसलमानों को आतंकवादी ने मार डाला क्या वो भारतीय नही है या ये अखबार उन्हें मानता नही वरना इसकी फुटेज मुस्लिम की हत्या वाला भी हो सकता था

अनिश्चितकालीन ब्रेक के बाद स्टोक्स ने शुरू की ट्रेनिंग, एशेज से पहले वापसी की अटकलें तेजइंग्लैंड क्रिकेट टीम के ऑलराउंडर बेन स्टोक्स ने एक बार फिर से नेट्स में ट्रेनिंग शुरू कर दी है। यही कारण है कि एक बार फिर आगामी एशेज सीरीज में उनकी वापसी की अटकलें तेज हो गई हैं। वहीं इसी को लेकर उनकी टीम के साथी तेज गेंदबाज मार्क वुड ने बयान दिया है।

सिंघू सीमा हत्या: एक निहंग सिख गिरफ़्तार, मृतक के परिवार ने की उच्चस्तरीय जांच की मांगदिल्ली-हरियाणा की सिंघू सीमा पर किसानों के प्रदर्शनस्थल के पास एक व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या के मामले में पुलिस ने एक निहंग सिख को गिरफ़्तार किया है. 15 दलित संगठनों ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को एक ज्ञापन सौंपते हुए दोषियों को कड़ी सज़ा देने की मांग की. वहीं, राजनीतिक दलों ने भी इस घटना की निंदा करते हुए व्यापक जांच की मांग उठाई है. अगर धार्मिक आस्तिक में मानवता होता तो देश में दंगा जातिय हिंसा नरसंहार बलात्कार न होता, नास्तिक खुद भी जीता है दूसरों कोभी जीने देता है

Kashmir Terror Attack: सहारनपुर के वुड कार्विंग कारीगर की आतंक‍ियों ने की हत्‍या, पर‍िवार पुलवामा रवानायूपी के सहारनपुर ज‍िले के रहने वाले वुड कार्विंग कारीगर सगीर अहमद (Saharanpur Wood Carving Artisan Sagir Ahmed) की जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आंतकियों (Terrorists) ने गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना की जानकारी मिलते ही मृतक के परिजनों में कोहराम मच गया। मृतक का शव लेने के लिए उसके परिजन जम्मू कश्मीर रवाना हो गए हैं। Imranmasood_Inc kaha ho? कश्मीर के कुछ आतंकी समर्थकों व आतंकियों के लिए देश के शेष मुसलमानों में मुस्लिम उम्मा के तहत सॉफ्ट कॉर्नर था। देख लो अंजाम।