लेह में चुनावों का बहिष्कार बीजेपी के लिए नया संकट - BBC News हिंदी

लेह में चुनावों का बहिष्कार बीजेपी के लिए नया संकट

25-09-2020 14:33:00

लेह में चुनावों का बहिष्कार बीजेपी के लिए नया संकट

लेह में सभी राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक समूहों ने सर्वसम्मित से चुनावों का बहिष्कार कर दिया है.

समाप्तसंविधान की छठवीं अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के आदिवासी इलाक़ों के प्रशासन से जुड़े प्रावधान किए गए हैं. स्वायत्त ज़िला परिषदों (एडीसी) के ज़रिए आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी देने के प्रावधान हैं.एडीसी ज़िलों का प्रतिनिधित्व करती हैं और उन्हें संविधान के तहत विशेषाधिकार दिए गए हैं. वे ज़मीन और उसके मालिकाना हक़ से जुड़े क़ानून बना सकती हैं.

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लद्दाख में चुनावों का बहिष्कार करने के लिए जो साझा बयान जारी किया गया है उस पर 12 लोगों के हस्ताक्षर हैं जिनमें बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष, आम आदमी पार्टी के संयोजक, कांग्रेस के नवान रिगज़िन जोरा और दूसरे धार्मिक समूहों के नेताओं के नाम भी शामिल हैं.इस साझा बयान ने लेह के लोगों की एकजुटता तो दिखाई है लेकिन इसमें करगिल का कोई ज़िक्र नहीं है.

चुनावों का बहिष्कारइमेज स्रोत,Nisar Hussainबीते साल अगस्त में केंद्र शासित प्रदेश के बनने के बाद लद्दाख के लेह में जश्न मनाया गया था लेकिन रोज़गार छिनने और क्षेत्र की आबादी में बदलाव को लेकर आशंकाएं भी ज़ाहिर की गई थीं.चेरिंग डोरजे कहते हैं, "हमारे यहां आबादी सिर्फ़ तीन लाख है और मीलों दूर तक ख़ाली ज़मीनें हैं, ऐसे में बाहरी लोग यहां आकर बस सकते हैं. इसीलिए हम चिंतित हैं. समय के साथ लोग लद्दाख की ओर पलायन शुरू कर देंगे और हम यहां अल्पसंख्यक बनकर रह जाएंगे."

डोरजे लद्दाख में बीजेपी के पूर्व प्रमुख हैं और यहां के लिए संविधान की छठवीं अनुसूची की माँग करने वाले संगठन के संस्थापक सदस्य हैं.बीते महीने लेह के सभी प्रमुख नेता एक साथ आए थे और तब से ही लद्दाख के लिए संविधान में विशेष दर्जे की माँग ज़ोर पकड़ रही है. इस समूह में लद्दाख बौद्ध एसोसिएशन, शिया और सुन्नी एसोसिएशन और कुछ पूर्व नेता भी शामिल हैं.

जब लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा की माँग ज़ोर पकड़ने लगी तो मैजूदा पर्वत परिषद, जिसमें अभी बीजेपी बहुमत में है, ने भी इसी माँग के समर्थन में प्रस्ताव पारित कर दिया.भारतीय जनता पार्टी के नेता और एलएएचडीसी के डिप्टी चेयरमैन सेरिंग सामदूप कहते हैं, "लद्दाख के लोगों की जनइच्छाओं को देखते हुए मैं ये प्रस्ताव पेश करता हूं कि लद्दाख के लोगों को अपनी ज़मीन, जंगल, रोज़गार, व्यापार, सांस्कृतिक संसाधनों और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए संविधान में विशेषाधिकार दिए जाएं. लद्दाख के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए ये संविधान की छठी अनुसूची या अनुच्छेद 371 या फिर संविधान के डोमिसाइल एक्ट के ज़रिए दिया जा सकता है."

इस प्रस्ताव की लद्दाख के कई राजनीतिक हल्क़ों में आलोचना हुई है.इमेज स्रोत,Nisar Hussainचेरिंग डोरजे कहते हैं, "हमने पर्वत परिषद में लाए गए प्रस्ताव के बारे में लेह के चीफ़ एक्ज़ीयक्यूटिव काउंसलर को एक पत्र लिखा है. आप एक साथ तीन चीज़ें नहीं माँग सकते. आपको ठोस तरीक़े से एक ही माँग रखनी होगी. आपको ये स्पष्ट करना होगा कि बीजेपी क्या चाहती है."

अब बीजेपी भी छठवीं अनुसूची की माँग में बाक़ी सभी पार्टियों के साथ आ गई है. लेकिन ऐसा लगता है कि लेह में बीजेपी की स्थानीय इकाई और दिल्ली मुख्यालय में इसे लेकर कुछ मतभेद है.जम्मू-कश्मीर के बीजेपी प्रमुख अशोक कौल ने बीबीसी हिंदी से कहा है कि सभी को चुनावों में हिस्सा लेना चाहिए और बहिष्कार इसका हल नहीं है. उन्होंने कहा, "हम सभी से वार्ता करेंगे, चुनावों का बहिष्कार करना समाधान नहीं है."

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05 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर का विशेषाधिकार समाप्त किया गया था तब लद्दाख को उससे अलग कर दिया गया था. उस समय बीजेपी ने कहा था कि अब लद्दाख भी बाक़ी भारत से मिल जाएगा.लेकिन अब चुनावों का बहिष्कार और विशेष दर्जे की माँग बीजेपी के उसी नज़रिए को चुनौती देती प्रतीत होती है.

बीजेपी के कार्यकर्ता भी बहिष्कार का पक्ष ले रहे हैं. बीजेपी हाईकमांड और कार्यकर्ताओं के बीच दरार अब सामने आ रही है. बुधवार को बीजेपी के राम माधव और अशोक कौल लेह पहुंचे और कार्यकर्ताओं के साथ कई मीटिंग की. हालांकि समस्या का फ़िलहाल समाधान होता नहीं दिख रहा.

गुरुवार को लेह में बीजेपी के काउंसलर सेरिंग वांगडस ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. अपनी चिट्ठी में उन्होंने लिखा, "ये बहुत पीड़ा के साथ कर रहा हूं क्योंकि लेह की बीजेपी इकाई में बाहरी ताक़तों का हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया है""पार्टी में एक पल के लिए किसी भी पद पर बने रहना लद्दाख और लोगों की आवाज़ के ख़िलाफ़ होगा." उच्चस्तरीय कमेटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर इस ओर ध्यान देने की बात कही है.

इमेज स्रोत,Nisar Hussainअनुच्छेद 370 और 35 ए जम्मू-कश्मीर में संपत्ति और नौकरियों को स्थानीय लोगों के लिए सुरक्षित करते थे. नौकरियों में सुरक्षा को और बढ़ाने के लिए जम्मू-कश्मीर की सरकार डोमीसाइल नीति भी लेकर आई थी.चेरिंग डोरजे कहते हैं कि बीजेपी को अपने कार्यकर्ताओं को लेह के लए छठवीं अनुसूची का समर्थन करने से नहीं रोकना चाहिए. वो कहते हैं, "अगर आपको इतना बड़ा देश चलाना है तो लोगों की स्थानीय भावनाओं का ध्यान रखना होगा और बीजेपी वो नहीं कर पा रही है और इसकी क़ीमत उसे चुकानी पड़ेगी."

वो कहते हैं, "अगर हमें संवैधानिक सुरक्षा नहीं दी गई तो हम हर तरीक़े से प्रदर्शन करेंगे. इसमें सड़कों पर उतरना भी शामिल है."बुधवार को लेह में माधव और कौल ने स्थानीय नेताओं से जिस होटल में मुलाक़ात की उसके बाहर छात्रों ने प्रदर्शन भी किया है.गुरुवार को लेह शहर में भी प्रदर्शन हुए और शटडाउन किया गया.

स्थानीय लोग इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं?इमेज स्रोत,Getty Imagesलेह शहर के केंद्र में स्थित कॉफ़ी शॉप 'कॉफ़ी कल्चर' में आमतौर पर भीड़ रहती है. अधिकतर लोग स्थानीय होते हैं.नामग्याल वांगचुक दिल्ली में एक ट्रैवल कंपनी में काम करते थे लेकिन कोविड महामारी की वजह से इन दिनों लेह में ही रह रहे हैं.

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वो कहते हैं, "केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद मैंने सबसे बड़ा बदलाव ये देखा है कि अब लद्दाख के विकास के लिए अधिक फ़ंड मिल रहा है और यहां ढांचागत सुविधाओं में सुधार हो रहा है."वो कहते हैं, "लेकिन हमारे लिए नौकरियां ख़त्म हो रही हैं. अब हमारे लिए कोई आरक्षण नहीं है, जो हमें अनुच्छेद 370 के समय मिलता था. लद्दाखी लोगों के मन में अब केंद्र शासित प्रदेश को लेकर आशंकाएं पैदा हो रही हैं. क्योंकि ना ही हमें छठवीं अनुसूची मिली है और ना ही विधानसभा मिली है. लद्दाख के लोगों की यही मुख्य माँग है. ये मिलेगा तो स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार सुरक्षित होगा, पर्यावरण और संपत्तियां सुरक्षित होंगी."

पेशे से लेखक और फ़िल्मकार उमैर लासू लेह में ही रहते हैं. वो कहते हैं कि जब लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना तो यहां के बुज़ुर्ग बहुत ख़ुश हुए, भले ही ये भारत सरकार के कश्मीर में उठाए गए क़दम का प्रतिफल ही क्यों न था.वो कहते हैं, "सिर्फ़ लेह ही नहीं बल्कि कारगिल के युवाओं के मन में भी सवाल थे. वो अपने क्षेत्र, धर्म और मान्यताओं की सुरक्षा को लेकर आशंकित थे. मुझे लगता है कि बिना संवैधानिक सुरक्षा के ये खोखला साबित होगा."

वीडियो कैप्शन,कश्मीर और आर्टिकल 370 से लेह-लद्दाख को क्या थी परेशानी?जब संवैधानिक सुरक्षा की माँग कर रहे नए फ्रंट के बारे में सवाल किया गया तो नामग्याल ने कहा, "इससे यही पता चलता है कि समाज के हर तबक़े की यही मुख्य माँग है. हमारे रोज़गार, संपत्ति और पर्यावरण की सुरक्षा की गारंटी के बिना केंद्र शासित प्रदेश किसी काम का नहीं है."

लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से पैदा हुआ संकटएलएएचडीसी एक निर्वाचित संस्था है जिसमें तीस सदस्य होते हैं. इनमें से 26 चुने जाते हैं जबकि चार को नामित किया जाता है. मौजूदा एलएएचडीसी में बीजेपी के बीस और कांग्रेस के छह सदस्य हैं.ये काउंसिल साल 1995 में बनी थी. तब से ही लेह और कारगिल में विकास कार्य यही करा रही है. दोनों ही ज़िलों की अपनी अलग-अलग काउंसिल हैं.

जब से लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना है, प्रशासन और एलएएचडीसी के बीच कई मौक़ों पर विवाद हुआ है.बीजेपी के पूर्व नेता चेरिंग डोरजे का कहना है कि उन्होंने बीजेपी से इसलिए इस्तीफ़ा दिया क्योंकि लद्दाख में लेफ़्टिनेंट गवर्नर के आने के बाद से ही एएएचडीसी भंग है.

वो कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर राज्य में जब हम हिल काउंसिल में थे तब श्रीनगर और जम्मू के मंत्रियों या अधिकारियों का हमारे काम में कोई दख़ल नहीं था. ये इलाक़े लेह से बहुत दूर भी हैं. लेकिन जब से केंद्र शासित प्रदेश बना है, पूरा प्रशासन लेह आ गया है, एलजी से लेकर कमिश्नर सेक्रेट्री और डिविज़नल कमिश्नर तक. अब वो उन चीज़ों का भी ध्यान रख रहे हैं जो एलएएचडीसी के अंतरगत आती थीं. ऐसे में काउंसिल की भूमिका दूसरे दर्जे की हो गई है."

बीबीसी ने इन आरोपों पर लद्दाख के लेफ़्टिनेंट गवर्नर की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनके दफ़्तर में संपर्क किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका.एलएएचडीसी के मौजूदा चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव काउंसलर ग्याल पी वांग्याल, जो बीजेपी से जुड़े हैं, कहते हैं, "हमारे पास वित्तीय अधिकार थे, प्रशासनिक अधिकार थे, ट्रांसफ़र और तैनाती के अधिकार थे. नियुक्ती समेत और कई अधिकार एलएएचडीसी के पास थे. लेकिन जब से केंद्र शासित प्रदेश बना है, इन्हें लेकर केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन और काउंसिल के बीच असमंजस की स्थिति है कि किसके पास क्या शक्तियां और अधिकार हैं और किसकी क्या भूमिका है."

वो कहते हैं, "हम इसे सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं."स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि यदि बीजेपी ने मूलनिवासियों की भावनाओं को नहीं समझा तो हालात और ख़राब हो सकते हैं. लेह के पत्रकार रिंचेन आंग्मो चुमिकचान कहते हैं, "लेह में ये ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम हुआ है. सभी धार्मिक और राजनीतिक संगठन एक साथ आ गए हैं. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. अगर माँगे नहीं मानी गईं तो इसके नतीजे नुक़सानदेह हो सकते हैं. मुझे नहीं लगता कि अब ये अभियान रुकेगा."

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पाटलिपुत्र: 'लालू राज' में बिहार कैसा था, जानिए पूरा इतिहास

1980 में जब केंद्र में कांग्रेस पार्टी की वापसी हुई तो उसने 9 गैर कांग्रेस शसित राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया. इन राज्यों में बिहार भी शामिल था. 11 जून 1948 को लालू प्रसाद यादव का जन्म हुआ था. 42 साल की उम्र में लालू पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. 1990 से 1997 तक लालू मुख्यमंत्री रहे. 2005 तक उनकी पत्नी राबड़ी देवी सीएम रहीं. देखें वीडियो.

हर तरफ़ जूते ही पड़ रहे हैं बेचारों को BharatBandh ख़राब वक्त किसी का भी आ सकता है। Chunav hone cahiye agar har ek state or UT yahi kehne lga to ho gya kaam. बोया पेड़ बबूल ! - मोदी जी को बेहद पसंद चीन भी 18बार गऐ अबकी आम आया होगा पेड़ पर, सोच! लेह लद्दाख में 20 वर्षों तक राष्ट्रपति शासन रहना जरूरी है, तभी विकास की नए सिरे से नींव रखी जा सकती है।

मोदी शाह है तो मुमकिन है !!! योगी है तो यकीन है Why r u spreading fake news ..my relatives live in Leh ..they told nothing on this मोदी नीतियों का हश्र कमोबेश हर क्षेत्र एक जैसा है असफल और आत्मघाती..! सामाजिक समरसता गयी आर्थिक तंगहाली भूगोल पर खतरा पडोसीयों से मतभेद सरकारी संपति की नीलामी भ्रष्टाचार,कदाचार,व्यभिचार,बेरोजगारी.. गिनती खत्म होता नजर नहीं आता.. और ये सत्ताधारी को शर्म नहीं आता

अगर लेह मे चुनावों का बहिष्कार हो रहा है। तो यह देश के लिए और सरकार के लिए बहुत चिंता का विषय है। आखिर क्या कारण है? लोगों को चुनाव में भाग लेने से परहेज हो गया? मोहभंग हो गया? सरकार को इसे गंभीरता से लेना होगा! लेह के लोगों को विश्वास में लेना होगा कारण क्या है? Bhayankar Bhosdiwala Channel (BBC) BBC ka bahishkar BBC k liye naya sankat... Kaisa raha🤣🤣

मैं चैनल के मालिक को चार जूते मारना चाहता हूं कोई है जो मेरे को इस से मिलवा दे सबसे पहले तो इस न्यूज़ चैनल को बंद कर देना चाहिए गद्दार हराम ज्यादा न्यूज़ चैनल है यह देश के खिलाफ हमेशा बोलता है।।

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