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Act 2006, Supreme Court

राजनीतिः आशियाना बचाने की लड़ाई

राजनीतिः आशियाना बचाने की लड़ाई

17.7.2019

राजनीतिः आशियाना बचाने की लड़ाई

देश में जनजातियों के आर्थिक विकास\n पर केंद्रित राष्ट्रीय जनजाति वित्त विकास निगम की भी स्थापना की गई है। इसके तहत भारी धनराशि का प्रावधान किया जाता है लेकिन हकीकत यह है कि इससे जनजातीय लोगों को वांछित लाभ नहीं मिल पाता। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों की घोर उपेक्षा के शिकार आदिवासी और वनवासी मुख्यधारा से पूरी तरह कटे हुए हैं। इन्हें देश की मुख्यधारा में शामिल करने की कभी भी सही कोशिशें नहीं की गईं।

आदिवासियों के दावों की ज्यादातर अस्वीकृतियां ग्रामसभा स्तर पर ही की गई हैं।

संसद में 18 दिसंबर, 2006 को अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 सर्वसम्मति से पारित किया गया था। एक साल बाद 31 दिसंबर, 2007 को इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की गई। इससे पहले भारत में वनों के संबंध में साल 1876 से साल 1927 के बीच पारित किए गए भारतीय वन कानूनों के प्रावधानों को ही लागू किया जाता था। एक लंबे वक्त तक साल 1927 का वन कानून ही भारत का वन कानून रहा। हालांकि ऐसे किसी भी कानून का पर्यावरण और वन संरक्षण से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन फिर भी पर्यावरण और वन संरक्षण के नाम पर जहां-तहां इसका बेजा इस्तेमाल किया जाता रहा। भारत सरकार की टाइगर टास्क फोर्स ने भी यह माना है कि वन संरक्षण के नाम पर अवैध और असंवैधानिक रूप से भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है। ऐसे में निश्चित रूप से वर्ष 2006 में पारित वनाधिकार कानून की जरूरत और उपयोगिता समझी जा सकती है।

हकीकत तो यह है कि केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों के पास न तो वनों से संबंधित कोई पुख्ता रिकार्ड है और न ही आदिवासियों और वनवासियों को लेकर कोई सही आंकड़े हैं। वनों, आदिवासियों और वनवासियों को लेकर कभी भी सही सर्वेक्षण नहीं कराया गया। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा आदि राज्यों का बहुत बड़ा क्षेत्र वनाच्छादित है जहां के वन, आदिवासी और वनवासी पूरी तरह से उपेक्षित हैं। मध्यप्रदेश के 82.9 फीसद वन क्षेत्र का कभी सर्वेक्षण नहीं कराया गया और ओड़िशा का चालीस फीसद से ज्यादा रिजर्व वन-क्षेत्र सरकार की घोर उपेक्षा का शिकार है। यही हाल दूसरे राज्यों का भी है। इस तरह से अभी तक देश के साठ फीसद राष्ट्रीय उद्यानों की जांच और अधिकारों के निपटान की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है। यों तो देश में अनुसूचित जनजाति श्रेणी के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए योजनाओं और धन की समुचित व्यवस्था है, लेकिन न तो इन योजनाओं का व्यावहारिक रूप ही कहीं देखने में आता है और न ही धन का सही उपयोग।

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