मुंबई हमले के 13 साल: शहीद हेमंत करकरे की बेटी जुई का सवाल- पापा बुलेट प्रूफ जैकेट पहनकर निकले थे, कहां गई वो जैकेट?

मुंबई हमले के 13 साल: शहीद हेमंत करकरे की बेटी जुई का सवाल- पापा बुलेट प्रूफ जैकेट पहनकर निकले थे, कहां गई वो जैकेट? #MumbaiTerrorAttack #HemantKarkare #JuiKarkare

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26-11-2021 09:31:00

मुंबई हमले के 13 साल: शहीद हेमंत करकरे की बेटी जुई का सवाल- पापा बुलेट प्रूफ जैकेट पहनकर निकले थे, कहां गई वो जैकेट? MumbaiTerrorAttack HemantKarkare JuiKarkare

26/11 आतंकी हमले में महाराष्ट्र के तत्कालीन ATS चीफ हेमंत करकरे शहीद हुए थे। वे पाकिस्तानी आतंकियों की गोलियों का शिकार हुए थे। अब 13 साल बाद उनकी बेटी जुई करकरे ने हेमंत की बुलेट प्रूफ जैकेट को लेकर सवाल खड़े किए हैं। जुई ने अपने पिता की बहादुरी, उनका मॉटिवेशन, देश प्रेम और मुंबई हमले के बाद की मुश्किलों को भास्कर के जरिए साझा की है। जिसे हम जस का तस आपके सामने पेश कर रहे हैं... | 13 Years of Mumbai Terror Attack। Interview of Hemant Karkare's Daughter Jui Karkare

26/11 आतंकी हमले में महाराष्ट्र के तत्कालीन ATS चीफ हेमंत करकरे शहीद हुए थे। वे पाकिस्तानी आतंकियों की गोलियों का शिकार हुए थे। अब 13 साल बाद उनकी बेटी जुई करकरे ने हेमंत की बुलेट प्रूफ जैकेट को लेकर सवाल खड़े किए हैं। जुई ने अपने पिता की बहादुरी, उनका मॉटिवेशन, देश प्रेम और मुंबई हमले के बाद की मुश्किलों को भास्कर के जरिए साझा की है। जिसे हम जस का तस आपके सामने पेश कर रहे हैं...

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"तारीख 20 नवंबर 2008, सुबह का वक्त था। हालचाल जानने के लिए मां का नॉर्मल फोन आया? US में तब थैंक्स गिविंग वीक चल रहा था, जो वहां बड़े लेवल पर सेलिब्रेट किया जाता है। मैंने मां को बताया कि शिकागो से मेरी ननद आई हैं। मैं उन्हें बॉस्टन घुमाने ले जा रही हूं। इसके बाद हम घूमने निकल गए। इसी बीच जर्मनी से मेरी बहन का फोन आया कि पापा हेलमेट और बुलेट प्रूफ जैकेट पहनकर एक टेरेरिस्ट एक्टिविटी में जा रहे हैं। मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। मुझे हमेशा लगता था कि पापा सुपर हीरो हैं, उन्हें कभी कुछ नहीं हो सकता। वे सभी को बचा लेंगें।

घर आते ही मैंने टीवी ऑन किया। टीवी पर न्यूज़ फ्लैश हो रही थी कि हेमंत करकरे घायल हो गए हैं। मुझे लगा ज्यादा सीरियस बात नहीं है। इतने में न्यूज़ फ्लैश होने लगी कि हेमंत करकरे नहीं रहे। मुझे इस खबर पर यकीन नहीं हुआ। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि पापा के साथ ऐसा हादसा हो जाएगा। तभी मेरे पति का फोन आया कि मैं घर आ रहा हूं। उनकी आवाज सुनकर मुझे पहली दफा लगा कि यह हो गया है। headtopics.com

तभी मेरी बहन का मैसेज आया कि 'पापा गेले' (पापा नहीं रहे।) मैं एकदम शॉक्ड थी। मां को फोन लगाया तो पता चला कि मामा उन्हें अस्पताल में पापा की डेड बॉडी दिखाने लेकर गए हैं। उसी दिन हम भारत आना चाहते थे, लेकिन नहीं आ सके, एयरपोर्ट पर रेड अलर्ट था। दो दिन बाद हम भारत पहुंचे। सामने पापा की चिता जल रही थी। मीडिया हम बच्चों से सवाल पर सवाल कर रही था। हम पहली दफा मीडिया और इतनी सारी भीड़ को फेस कर रहे थे।

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पोस्टमार्टम के वक्त की लिस्ट में काफी सामान था, लेकिन बुलेटप्रूफ जैकेट गायब थी। मै शॉक्ड थी कि यह कैसे हुआ। मां इस सवाल के जवाब में बीमार हो गई। बहुत लोग घर में आते रहते थे, बोलते थे कि हम करकरे परिवार के साथ हैं। हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था। मीडिया और कुछ NGO ने इन सवालों को फॉलो किया था। मां जानना चाहती थी कि आखिर बुलेट प्रूफ जैकेट कहां गई?

पापा की गोद में मेरा छोटा भाई आकाश है। जब पापा शहीद हुए तब उसकी उम्र महज 17 साल थी।तब चिदंबरम ने माफी भी मांगी थी। हमें चिंता रहने लगी कि मां की हेल्थ न गिर जाए। उन्हें नींद नहीं आती थी, लेकिन हमें विनीता कामटे जी ने बहुत सपोर्ट किया। पापा की वॉयस रिकॉर्ड भी भेजी। पापा ने जब बोला था कि कॉल द आर्मी एंड सर्कल द कामा हॉस्पिटल । लोग बोल रहे थे कि पापा को समझ नहीं आ रहा था, लेकिन ऐसा नहीं है। पापा की वॉयस रिकॉर्ड इसका सुबूत है।

मीडिया ने मेरे 17 साल के भाई से तरह-तरह के सवाल किए। उसने पापा की चिता को अग्नि दी थी। वह अवाक था कि कोई ऐसे सवाल कैसे कर सकता है? कई दिन तक घर में लगातार ऑफिसर्स और कई लोग आते रहे। मेरी मां ने घर के नौकरों को बुलाकर कहा कि एक भी आदमी बिना चाय-पानी के नहीं जाना चाहिए। मैं अपनी मां को देखकर हैरान थी कि जिसने अपने लाइफ पार्टनर को खो दिया है, वह ऐसे वक्त में ऐसा कैसे सोच सकती है? headtopics.com

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मां ने हमें संभाला, वह कहती थी कि जो जन्मा है वह जाएगा, लेकिन देश को बचाने के लिए जो जान देता है, वह शान नसीब वालों को मिलती है। इससे मुझे बहुत ताकत मिली। पापा बहुत गंभीर थे। उनका मानना था कि जिसने गुनाह किया है उसे सजा मिलनी ही चाहिए, चाहे वह कोई भी हो। वह पीछे नहीं हटे। हालांकि, मां को चिंता होती थी। किसी भी पत्नी को चिंता होगी ही। पापा जब वियाना में डिप्लोमेट थे तो वहां उनके लिए कई मौके थे, लेकिन पापा को तब अपने देश आना था। पुलिस में आकर देश की सेवा करनी थी।

मां के दिमाग में कभी-कभी आता था कि अगर हम वियाना में ही रह जाते तो शायद आज ऐसा नहीं होता। मां को लगता था बतौर ATS चीफ पापा की जॉब काफी रिस्की है, लेकिन पापा को कभी ऐसा नहीं लगा। उनका तो जीवन में एक ही फोकस था कि खाकी पहनी ही है ताकि देश की सेवा कर सकूं। कुछ लोग पापा के बारे में अच्छा नहीं बोलते हैं। मुझे इससे तकलीफ होती है।

पापा को किताबें पढ़ना पसंद था। वे किताब पढ़ते वक्त भूल जाते थे कि उनके आसपास क्या हो रहा है। एक दफा रामकृष्ण मठ नागपुर की लाइब्रेरी में वे पढ़ रहे थे। वहां के स्वामी जी ने वक्त पर लाइब्रेरी बंद कर दी। पापा तब दुबले पतले थे, उन्हें दिखाई नहीं दिए। रात हो गई, अंधेरे में दादी घबरा गईं कि पापा कहां चले गए। वह उन्हें ढूंढने निकली। दादी ने स्वामी जी से कहा कि आप अपनी लाइब्रेरी खोलें मेरा बेटा अंदर ही होगा। ताला खोलकर देखने पर पता चला कि पापा वहीं बैठे किताब पढ़ रहे थे।

पापा को किताबों से खूब लगाव था। वे कोई किताब पढ़ते थे तो उसी में घंटों खोए रहते थे।तब मैं डिप्रेशन के दौर से भी गुजर रही थी। मुझे लगा कि डिप्रेशन से उबरने और पापा को श्रद्धांजलि देने का सबसे अच्छा तरीका है किताब लिखना। मैंने उसी साल 2008 में एक किताब लिखना शुरू किया, जो एक तरह से मेरे लिए थैरेपी थी। जैसे-जैसे मैं लिखती रही वैसे-वैसे पापा को खोने का मेरा दर्द कम होता गया। लिखने से मुझे ताकत मिलती रही। मैं खुद उनसे प्रेरित होती गई। headtopics.com

मेरे पास दो बच्चियां हैं। ईशा और रुतजा। ईशा 10 साल की है और रुतुजा 7 साल की। शुरू में मुझे बहुत दिक्कत हुई। मेरे पेरेंट्स एक के बाद एक इस दुनिया से चले गए। मैं बहुत तकलीफ में रहती थी, लेकिन किताब लिखते समय हमेशा सोचती थी कि मेरे पापा ने मुझे क्या सिखाया है, इसीलिए मैं चाहूंगी कि बाकी लोग भी यह किताब पढ़ें।

इस किताब के कई चैप्टर हैं। जैसे एक चैप्टर उनके कलीग्स का है। पापा जब वियाना में डिप्लोमेट थे तो राजू नाम का कुक था। उसे वह वियाना लेकर गए थे। किताब में उसका भी इंटरव्यू है। लोग कलीग और बराबरी के लोगों से अच्छे से ही पेश आते हैं, लेकिन वह कुक पापा को आज भी याद करता है। पापा हर दर्जे के लोगों से समान रूप से पेश आते थे।

पापा बचपन से हमेशा कहते आए हैं कि आदमी की मेहनत ही काम आती है। कोई लक (किस्मत) नहीं होती है। आदमी को मेहनत करना जरूरी है। मैं चाहती हूं कि मेरे पापा की सीख दूसरे लोगों तक भी पहुंचे। मैंने अपनी किताब में लिखा है कि पुलिस ऑफिसर कितनी मेहनत करते हैं। खतरों से खेलते हैं। लोगों को पता ही नहीं होता है।

जो पब्लिक फिगर होते हैं उनकी पर्सनल लाइफ भी होती है। जब मैं दस साल की थी तो पापा की पोस्टिंग नक्सल एरिया चंद्रपुर में थी। वे वहां सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस थे। मेरे साथ हमेशा सिक्योरिटी गार्ड स्कूल जाते थे। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था कि मेरी दूसरी सहेलियां खेलती थीं। आराम से टिफिन खाती थीं, लेकिन मेरे साथ हमेशा सिक्योरिटी गार्ड रहते थे। मैं छोटी थी, मुझे समझ नहीं आता था कि मेरे साथ यह लोग हमेशा क्यों रहते हैं, लेकिन अब समझ आता है।

पापा की ड्यूटी काफी टफ थी, लेकिन इसका एहसास वे हमें नहीं होने देते थे। मेरा हर बर्थडे वे धूम-धाम से मनाते थे।बड़े होकर पता लगा कि मेरे पापा की जान खतरे में है, लेकिन वह घर का माहौल खुश रखते थे। बच्चों पर इसका असर नहीं पड़ने दिया कि उनकी जॉब कितने खतरे वाली है। पापा मेरे हर जन्मदिन पर हमेशा खुद पार्टी ऑर्गनाइज करते थे। कौन सा म्यूजिक बजाना है, जादूगर को लाना है, ताकि बच्चों को अच्छा लगे, मेरे लिए कौन सा तोहफा लाना है। वह यह सब बहुत ध्यान से चूज करते थे।

अब मैं भी बड़ी हूं, जॉब करती हूं, अभी मुझे अचंभा होता है कि वह इतने शौकीन कैसे थे, जबकि उनका जॉब इतना डिमांडिंग था, फिर भी टाइम निकाल कर यह सब करते थे। मुझे याद है कि मेरे 16वें जन्मदिन पर पापा ने मुझे स्र्वोस्वकी का एक लॉकेट गिफ्ट किया था। जो लॉक एंड की (ताला-चाबी) था। पापा ने मेरे लिए कार्ड पर मैसेज लिखा, 'उम्मीद है कि आपको अपने दिल की तमन्नाओं को अनलॉक करने की चाबी मिल जाएगी। हो सकता है आपको पता न चले, लेकिन ताला भी आपके भीतर है और चाबी भी आपके भीतर है।'

वह बहुत आर्टिस्टिक थे। मुझे याद है कि शुरू में मैं एक दफा एक बच्ची के जन्मदिन पर गई तो मैंने देखा कि उसके पापा उसका हाथ पकड़कर केक कट कर रहे हैं। एकदम से मेरी आंखों में आंसूं आ गए। मुझे मेरे पापा की याद आई। अब मैं अपनी बेटियों को देखकर खुश होती हूं, उनका जन्मदिन मनाती हूं। टाइम इज ग्रेट हीलर। पापा का शेड्यूल काफी बिजी रहता था। उनकी पोस्टिंग हमेशा चैलेंजिंग रही। वह अपने आपको डयूटी में झोंक देते थे।

मां को कई बार अकेले रहना पड़ा। जब मेरा भाई पैदा हुई तो पापा को तुरंत चंद्रपुर जाकर ज्वॉइन करना था। पापा ने इसकी परवाह नहीं की कि उनका बच्चा पैदा हुआ है। उस वक्त मैंने, मेरी बहन ने ही मां और भाई को संभाला। पापा घर हमेशा लेट आते थे, मां टीचर थी। उन्हें भी सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना पड़ता था। लाइफ बहुत टफ थी, लेकिन वे लोग मैनेज करते थे। पापा फिजूल खर्च से बहुत गुस्सा होते थे। जैसे अगर मां महंगे कपड़े खरीद लिया करती थीं, तो पापा गुस्सा होते थे कि यह तो किसी फिल्म स्टार के बच्चे को ही शोभा देगा।

जब वह DCP नारकॉटिक्स थे तो उन्होंने सिर्फ ड्रग्स पेडलर को पकड़ना जरूरी नहीं समझा बल्कि वे यूथ को प्रेरित करते थे, आप इस धंधे में नहीं आओ। वे यूनिफॉर्म में NGO के साथ स्कूलों में जाया करते थे। यूथ से निजी तौर पर बात करते थे कि बच्चों स्कूल में आना जरूरी है। ड्रग्स एडिक्ट्स को पापा रिहेब्लिटेशन सेंटर भी भेजते थे ताकि वह बाहर आकर एक अच्छी ज़िंदगी जी सकें।

यह तस्वीर पापा और मां की शादी की है। दोनों एक दूसरे को समझते थे और कोऑपरेट करते थे। पापा कहीं जाते तो मां ही हमें संभालती थीं।पापा को इंटीरियर डेकोरेशन का बहुत शौक था। जैसे वियाना में पापा की डिप्लोमेटिक पोस्टिंग थी तो घर में लोगों को एंटरटेन करना बहुत जरूरी था। उन्होंने कुछ राजस्थानी गुड्डे-गुडियां, राजारानी, शतरंज खरीद लिए, वह बहुत मंहगे थे तो मां ने कहा कि यह बजट में नहीं है, इस पर पापा ने वह सब वापिस लौटा दिए। मां-पापा का एक दूसरे पर कंट्रोल था।

पापा मुझे हमेशा टोकते थे कि तुम्हारे पास इतनी अच्छी किताबें हैं। इतने अच्छे स्कूल में पढ़ती हो। मेरा फलां कलीग एक किसान का बेटा है, जब वह गाय चराने ले जाता था तो वहीं बैठकर UPSC की तैयारी करता था। छह-सात दफा सिविल सर्विसेज का एग्जाम देकर पास हुआ है। जो तुम्हारे पास है असली दुनिया उससे बहुत अलग है। असली दुनिया में लोगों के पास कुछ नहीं है। पापा हमेशा हमें याद दिलाते थे कि इसे कभी लाइटली मत लेना कि तुम्हारे पास सब कुछ है। वह हमेशा थैंकफुल रहते थे।

पापा की इच्छा थी कि मैं सिविल सर्विसेज की एग्जाम दूं, लेकिन किसी वजह से मैं उस लाइन में नहीं जा सकी। मुझे लगता है कि मैं किस्मतवाली हूं कि ऐसे मां-बाप के साथ रही। बेशक मेरे जीवन में एक सूनापन तो है। जैसे मेरी बेटियों के दादा जब आते हैं, उनके साथ दिनभर खेलते हैं, क्राफ्ट करते हैं। मेरे हसबैंड का कहना है कि उनके पापा-दादाजी के रूप में पिघल गए हैं। जबकि वह खुद बचपन में उनके साथ बात करने में घबराते थे। बहुत डरते थे। मैं मिस करती हूं कि बतौर नाना मेरे पापा होते तो मेरी बेटियों के साथ खेलते, वह कैसे पिघलते।

पापा के बारे में मेरे सवाल ऐसे हैं कि अगर सवाल नहीं किए जाएंगे तो उनके जवाब नहीं मिलेंगे। मुंबई अटैक के वक्त आतंकियों के पास मॉडर्न हथियार थे। जबकि पुलिस वालों के पास पुराने हथियार थे, लेकिन उसे लेकर भी वे लड़े। मुझे याद है कि CST स्टेशन पर एक ऑफिसर ने कुर्सी सरकाई ताकि आतंकी डिस्ट्रेक्ट हो सके, लेकिन उसकी राइफल से गोली भी नहीं चल रही थी। यह सब बदलना चाहिए। शायद चीजें बदली भी हों।

पापा कहते थे कि स्कोप लाइज इन द पर्सन, नॉट इन दि फील्ड...कोई भी फील्ड चुनो। जो पढ़ो मन से पढ़ो, जो करो मन से करो। न्यू इंग्लैंड में फॉल सीजन बहुत खूबसूरत होता है, मैं जब उसे देखती हूं। हर साल पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं। परिवर्तन साइकिल नियम है। जो आता है उसे जाना है।"

जुई करकरे महाराष्ट्र के तत्कालीन ATS प्रमुख शहीद हेमंत करकरे की बेटी हैं। वे अपने पिता पर 'अ डॉटर्स मेम्वायर' नाम से किताब लिख चुकी हैं। उन्होंने ये सारी बातें दैनिक भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं...

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वो भी परमवीर भी छुपा लिया होगा, जिस तरह आतंकवादी कसाब की phone की तरह। क्या सोच रही कांग्रेस की कसाब को कलावा बंधवाकर कर भेजा दिग्गी ने आर एस एस की साज़िश बता दी भारत का पूरा गृह मंत्रालय पाकिस्तान में था तब और पाकिस्तान मंत्री भारत मे आनन फानन में उसे वापस पाकिस्तान भेजा गज़ब का देश भक्त काँग्रेस है और उसने 70 साल राज़ किया भारत का बटवारा करके।

Who killed hemant. It will be a mystery Wah !! Papa ki pari ko 13 saal baad bullet proof jacket ki yaad aa rahi hai !! Sala corruption bloodstream se behkar next generation tak pahunch raha hai... Gazab ka nasha hai bhai. Died of small arm fire. From close range not gun fire of Kasab

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