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बेबाक बोल- अमर बेल

बेबाक बोल- अमर बेल

13.7.2019

बेबाक बोल- अमर बेल

राहुल गांधी को विरासत सौंपनी हो या फिर अखिलेश यादव को, खास राजनीतिक दलों में अचानक से युवाओं को नेतृत्व देने की हलचल मच जाती है। पिता की गद्दी पर संतान के काबिज होते ही भारतीय राजनीतिक दलों की ‘युवा नेतृत्व’ की जरूरत पूरी हो जाती है। इसके साथ ही इन संतानों को पहली महिला प्रधानमंत्री, सबसे कम उम्र का प्रधानमंत्री या सबसे कम उम्र के सांसद का खिताब भी मिल जाता है। आजाद लोकतांत्रिक भारत में भी राजा का बेटा राजा वाली सामंती प्रवृत्ति को पूरे समाज का मौन समर्थन मिला हुआ है। आज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक राजनीतिक दलों में वंश की अमरबेल फल-फूल रही है। हंगामा तभी उठता है जब वारिस नाम कमाने में नाकाम होता है। आज अगर राहुल गांधी वंशवाद के खलनायक हैं तो उसी समय जगनमोहन रेड्डी नायक क्यों माने जा रहे, यह समझने की कोशिश करता बेबाक बोल।

जाति भेद और जेंडर भेद की तरह ही वंशवाद को भारतीय परंपरा का हिस्सा माना जाता रहा है। औपनिवेशिक गुलामी से आजादी के साथ आधुनिक भारत का इतिहास आगे बढ़ता है। 15 अगस्त 1947 को आजाद हो जाने के बाद या 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हो जाने के बाद बदली तारीखों से क्या सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव भी आया? लोकतंत्र में अलग-अलग पार्टियों का एजंडा क्या रहा। क्या ये दल सिर्फ विचारधारा और नीतियों के बल पर आगे बढ़े?

नब्बे के दशक से कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ एक वैचारिकी का निर्माण होना शुरू हुआ था। इसमें वाम के साथ समाजवादी आंदोलन की धारा से निकले नेता भी थे। कांग्रेस की वैचारिकी के खिलाफ बनी जमीन पर ही चौधरी चरण सिंह, देवीलाल से लेकर मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और एचडी देवगौड़ा जैसे नेता निकले। लेकिन जल्द ही ये क्षेत्रीय क्षत्रप कहलाए जाने लगे। उत्तर भारत में आज कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो वैचारिक आधार पर क्षेत्रीय एजंडे के साथ चल रही है। ये सारे दल मूलत: जातिवादी हो गए हैं। जातीय अस्मिता में भी मुखिया की संतान ही मुखिया होती है। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम एक खास वैचारिकी से उपजे नेता थे और उनकी राजनीतिक विरासत मायावती को मिली। लेकिन सुश्री मायावती ने अपनी राजनीतिक विरासत के लिए विचारधारा नहीं अपना वंश देखा। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही बसपा अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है। इस घोर संकट के समय में भी पार्टी और विचारधारा की जगह बसपा प्रमुख ने अपने परिवार को जगह दी। एक समय बिहार में अपनी विचारधारा के कारण राष्टÑीय जनता दल की तूती बोेलती थी। लेकिन आज यह चाचा-भतीजी और भाई-भाई की लड़ाई के कारण जाना जाता है। लालू प्रसाद के राजनीतिक परिदृश्य से दूर होते ही चुनावों में राजद को जनता ने नकार दिया क्योंकि पार्टी को विरासत में नेतृत्व नहीं संतान मिली थी, जिन्हें नेता बनाने की मेहनत भी करनी थी। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की विरासत भी वारिसों के दंगल में धूल चाट चुकी है।

वंश और जाति के बाद राष्ट्रवाद। इस राष्ट्रवाद का विकल्प क्या होगा? जाहिर सी बात है कि विकल्प दिखेगा वैकल्पिक नीतियों से। अगर नीति बदलेगी तो स्वाभाविक रूप से नेतृत्व भी बदलेगा। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर दल में वंश की अमरबेल फैली हुई है। इसका तोड़ भी नीति के स्तर पर ही लाया जाता रहा है। दुखद यह है कि नई नीतियों के साथ पार्टी खड़ा करने वाला जननायक भी अपनी सत्ता सिर्फ अपने वंश को सौंपना चाहता है। इसके लिए वह उन नीतियों से समझौता कर बैठता है जिसके कारण जनता उसे सत्ता के शीर्ष पर भेजती है। विकल्प के रूप में लाया नेता भी अपने वारिस को ही आगे बढ़ाने का संकल्प ले बैठता है। फिलहाल तो भारतीय राजनीति में वंश के इस दंश से छुटकारे के आसार नहीं दिख रहे।

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