बिहार चुनाव: बीजेपी-जदयू को कितनी चुनौती दे पाएंगे कांग्रेस,आरजेडी और वामदल - BBC News हिंदी

महागठबंधन: सवालों से हुई शुरुआत और अब संभावना पर हो रही बात- विश्लेषण

23-10-2020 08:00:00

महागठबंधन: सवालों से हुई शुरुआत और अब संभावना पर हो रही बात- विश्लेषण

यह पहला मौक़ा है, जब बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस के साथ तीन प्रमुख वामपंथी दलों का एक मुकम्मल शक्ल में चुनावी गठबंधन हुआ है.

बिहार में वाम राजनीति की 'तब और अब'बिहार में वाम राजनीति की 'तब और अब' वाली स्थिति पर ग़ौर करें, तो बहुत हद तक स्पष्ट हो जाएगा कि इस बाबत मुख्यतः दो बातों की भूमिका कितनी अहम रही.पहली ये कि जातीय गोलबंदी वाली सियासत ज्यों-ज्यों बलवती होती गयी, त्यों-त्यों वामपंथ का सामाजिक आधार दरकता चला गया.

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दूसरी बात कि खांचाबद्ध वाम एजेंडा से चिपका अदूरदर्शी नेतृत्व धीरे-धीरे जब अपनी समसामयिकता और प्रासंगिकता खोने लगा, तब कैडर भी या तो बिखर गए या भटक गए.तीन दशक पहले तक बिहार विधानसभा में सीपीआई और सीपीएम की दमदार मौजूदगी रही. 1972 में 35 विधायकों वाली सीपीआई को राज्य विधानसभा में मुख्य विपक्ष का दर्जा मिला था.

1967 से 1990 तक सदन में 22 से लेकर 26 सीटों तक क़ब्ज़ा बनाये रखने वाली सीपीआई साल 2000 आते-आते लुप्तप्राय होने लगी. सीपीएम का तो और भी बुरा हाल हुआ.फिर 1990 में तत्कालीन इंडियन पीपुल्स फ़्रंट (आईपीएफ़) ने सात विधायकों के साथ विधानसभा में प्रवेश लिया. उसके बाद ही आईपीएफ़ का नाम सीपीआई-एमएल हो गया.

और फिर सीपीआई-एमएल ने 1990 से अब तक कभी 7, कभी 6, तो कभी 5 सीटें ले कर सदन में अपनी उपस्थिति बरक़रार रखी है.लेकिन, लालू प्रसाद यादव ने आईपीएफ़ के इस उदय पर ऐसी सियासी चाल चली कि आईपीएएफ़ के हार्डकोर समझे जाने वाले सात विधायकों में से चार पाला बदल कर लालू की पार्टी में चले गए.

इस बार 'महागठबंधन' में शामिल वामपंथी दलों में सबसे अधिक, यानी 19 सीटों पर सीपीआई-एमएल चुनाव लड़ रही है. छह सीटों पर सीपीआई और चार सीटों पर सीपीएम ने उम्मीदवार उतारे हैं.पहले चरण के मतदान वाले जिन आठ विधानसभा क्षेत्रों में सीपीआई-एमएल के प्रत्याशी हैं, वहाँ आरजेडी नेता तेजस्वी यादव की चुनावी रैलियों में भारी भीड़ जुटी.

इसलिए प्रेक्षक मानने लगे हैं कि 'महागठबंधन' के घटक दलों से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को, ख़ासकर जेडीयू को कड़ी चुनौती मिल रही है.इमेज स्रोत,Santosh Kumar/Hindustan Times via Getty Imagesसही तालमेल और सीटों पर सही बंटवारासियासती ज़रूरत देखिए कि लालू-राबड़ी राज में हाशिये से जा लगे वामदलों को लालू पुत्र तेजस्वी यादव ने अपने दल के साथ जोड़ा है.

यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि लालू यादव जब वामदलों को जातीय हथियारों से धकिया कर किनारे लगा रहे थे, तब उन पर यह आरोप भी लगा था कि एक रणनीति के तहत वह माओवादियों (सीपीआई-माओइस्ट) के प्रति नरमी बरतते हैं.कभी-कभी मज़ाक़ में लालू जी ख़ुद को 'अहिंसक नक्सली' कह कर ऊँची जातियों की हिंसक जमातों (निजी सेनाओं) को इशारों में चेताते भी थे.

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उस समय बिहार में जातीय हिंसा का सिलसिला-सा चल पड़ा था. ख़ासकर जहानाबाद, भोजपुर, औरंगाबाद और गया ज़िलों में नरसंहार की कई वारदातें हुई थीं.मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज भी चुनावी सभाओं में उस भयावह दौर का ज़िक्र करना नहीं भूलते हैं. उनकी कोशिश रहती है कि लालू राज वाले पंद्रह साल की विफलताओं से नई पीढ़ी वाक़िफ़ हो जाए, लेकिन मौजूदा समस्याओं का ही असर नई पीढ़ी पर अधिक दिखता है.

ऐसे में तेजस्वी की चुनावी सभाओं में रोषपूर्ण युवाओं और श्रमिकों की तादाद बहुत दिखना यहाँ सत्ताधारी गठबंधन के लिए चिंता वाली बात तो है ही.आरजेडी के जो आधार वोट हैं, उनका पूरा फ़ायदा वामपंथी पार्टियों को मिलना इस बार ज़्यादा आसान हो गया है. ऐसा इसलिए, क्योंकि सही तालमेल के साथ सीटों का साफ़-साफ़ बँटवारा समर्थक मतदाताओं को भ्रमित नहीं करता है.

इन संभावनाओं के बावजूद 'महागठबंधन' की कुछ ऐसी मुश्किलें भी हैं, जो एनडीए को आश्वस्त कर रही होंगी. जैसे कि कुछ छोटे-छोटे गठबंधन या दल हैं, जिनके निशाने पर मुख्य रूप से 'महागठबंधन' को ही माना जाता है.चाहे पप्पू यादव का गठबंधन हो, या उपेंद्र कुशवाहा का. समझा यही जाता है कि इन दोनों के जो भी सामाजिक आधार हैं, वो मुख्यत: महागठबंधन के ही आधार वोट में सेंध लगा सकते हैं.

जहाँ तक 'महागठबंधन' के एक घटक कांग्रेस की बात है, वहाँ मामला अभी तक ढीला-ढाला ही लगता है. राहुल गाँधी की चुनावी रैलियों के बाद भी अगर पार्टी में गति नहीं आयी, तो नुक़सान का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. और पढो: BBC News Hindi »

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