प्रशांत भूषण केसः क्या आलोचना से सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा कम होती है?

प्रशांत भूषण केसः क्या आलोचना से सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा कम होती है?

14-08-2020 07:26:00

प्रशांत भूषण केसः क्या आलोचना से सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा कम होती है?

प्रशांत भूषण ने साल 2009 में 'तहलका' मैगज़ीन को दिए एक इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि भारत के पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में आधे भ्रष्ट थे.

इसी महीने की 10 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने कहा,"जजों को भ्रष्ट कहना अवमानना है या नहीं, इस पर सुनवाई की आवश्यकता है."गौर करने वाली बात ये भी है कि पिछले दस सालों में इस मामले पर केवल 17 बार सुनवाई हुई है.प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को एक लिखित बयान में खेद जताने की बात कही थी. लेकिन अदालत ने इसे ठुकरा दिया.

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जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यों वाली बेंच ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख़ 17 अगस्त तय की है.सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अवमानना के बीच एक पतली रेखा है. जजों ने कहा है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और एक संस्था के रूप में जजों की गरिमा की रक्षा की ज़रूरत को संतुलित करना चाहते हैं.

दूसरी ओर, वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि भ्रष्टाचार के उनके आरोप में किसी वित्तीय भ्रष्टाचार की बात नहीं थी बल्कि उचित व्यवहार के अभाव की बात थी. उन्होंने कहा कि अगर उनके बयान से जजों और उनके परिजनों को चोट पहुँची है, तो वे अपने बयान पर खेद व्यक्त करते हैं.

इमेज कॉपीरइटGetty Imagesकंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट का मतलब क्या है?हिमाचल प्रदेश नेश्नल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं,"भारत के संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को 'कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड' का दर्जा दिया गया है और उन्हें अपनी अवमानना के लिए किसी को दंडित करने का हक़ भी हासिल है."

"कोर्ट ऑफ़ रिकॉर्ड से मतलब हुआ कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के आदेश तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक कि उन्हें किसी क़ानून या दूसरे फ़ैसले से ख़ारिज न कर दिया जाए."साल 1971 के कंटेम्ट ऑफ़ कोर्ट्स ऐक्ट में पहली बार वर्ष 2006 में संशोधन किया गया.इस संशोधन में दो बिंदु जोड़े गए ताकि जिसके ख़िलाफ़ अवमाना का मामला चलाया जा रहा हो तो 'सच्चाई' और 'नियत' भी ध्यान में रखा जाए.

इसक़ानूनमें दो तरह के मामले आते हैं - फौजदारी और ग़ैर फौजदारी यानी 'सिविल' और 'क्रिमिनल कंटेम्प्ट.''सिविल कंटेम्प्ट' के तहत वो मामले आते हैं जिसमे अदालत के किसी व्यवस्था, फैसले या निर्देश का उल्लंघन साफ़ दिखता हो जबकि 'क्रिमिनल कंटेम्प्ट' के दायरे वो मामले आते हैं जिसमें 'स्कैंडलाइज़िंग द कोर्ट' वाली बात आती हो. प्रशांत भूषण पर 'आपराधिक मानहानि' का मामला ही चलाया जा रहा है.

प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं,"कोर्ट की आम लोगों के बीच जो छवि है, जो अदब और लिहाज है, उसे कमज़ोर करना क़ानून की नज़र में अदालत पर लांछन लगाने जैसा है."इमेज कॉपीरइटGetty Images'कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट' बनाम 'अभिव्यक्ति की आज़ादी'

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अभिव्यक्ति की आज़ादी को लोकतंत्र की बुनियाद के तौर पर देखा जाता है.भारत का संविधान अपने नागरिकों के इस अधिकार की गारंटी देता है.लेकिन इस अधिकार के लिए कुछ शर्तें लागू हैं और उन्हीं शर्तों में से एक है अदालत की अवमानना का प्रावधान.यानी ऐसी बात जिससे अदालत की अवमानना होती हो, अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में नहीं आएगी.

प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह की राय में संविधान में ही इस तरह की व्यवस्था बनी हुई है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास 'कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट' की असीमित शक्तियां हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार इसके आगे गौण हो जाता है.दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया और सीके दफ़्तरी बनाम ओपी गुप्ता जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट बार-बार ये साफ़ कर चुकी है कि संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 के तहत मिले उसके अधिकारों में न तो संसद और न ही राज्य विधानसभाएं कोई कटौती कर सकती है.

दूसरे लोकतंत्रों में क्या स्थिति है?साल 2012 तक ब्रिटेन में 'स्कैंडलाइज़िंग द कोर्ट' यानी 'अदालत पर लांछन' लगाने के जुर्म में आपराधिक कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता था.लेकिन ब्रिटेन के विधि आयोग की सिफारिश के बाद 'अदालत पर लांछन' लगाने के जुर्म को अपराध की सूची से हटा दिया गया.

बीसवीं सदी में ब्रिटेन और वेल्स में अदालत पर लांछन लगाने के अपराध में केवल दो अभियोग चलाए गए थे.इससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अवमानना से जुड़े ये प्रावधान अपने आप ही अप्रासंगिक हो गए थे.हालांकि अमरीका में सरकार के ज्यूडिशियल ब्रांच की अवज्ञा या अनादर की स्थिति में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के प्रावधन है लेकिन देश के संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट के तहत अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के अधिकार को इस पर तरजीह हासिल है.

इमेज कॉपीरइटPTIविरोध और समर्थन में चिट्ठीप्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना के मामलों ने समाज में बहस छेड़ दी है.जहां कुछ पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व नौकरशाहों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि"सर्वोच्च न्यायलय की गरिमा को देखते हुए प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमाना के मामले वापस लिए जाएं."

तो एक दूसरे समूह ने भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर संस्थानों की गरिमा को बचाने का अनुरोध किया है.भूषण के पक्ष में जारी किए गए बयान में जिन 131 लोगों के हस्ताक्षर हैं उनमें सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व चीफ़ जस्टिस जस्ती चेलामेस्वर, जस्टिस मदन बी लोकुर के अलावा दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस (रिटायर्ड) एपी शाह, पटना उच्च न्यायालय की जस्टिस (रिटायर्ड) अंजना प्रकाश शमिल हैं.

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इनके अलावा हस्ताक्षर करने वालों में इतिहासकार रामचन्द्र गुहा, लेखक अरुंधति रॉय और वकील इंदिरा जयसिंह भी हैं.वहीं, राष्ट्रपति को पत्र भेजने वाले पूर्व न्यायाधीशों, वकीलों, पूर्व नौकरशाहों और सामजिक कार्यकर्ताओं के एक दूसरे समूह का कहना था कि कुछ प्रतिष्ठित लोग संसद और चुनाव आयोग जैसी भारत की पवित्र संस्थाओं को दुनिया के सामने बदनाम करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ना चाहते हैं. अब सुप्रीम कोर्ट भी उनके निशाने पर है.

राष्ट्रपति को भेजी गई इस चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वालों में राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अनिल देव सिंह, सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस प्रमोद कोहली के अलावा 15 रिटायर्ड जज शामिल हैं.कुल मिलाकर 174 लोगों के हस्ताक्षर वाले इस पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में अवमाना का मामला पूरी तरह से प्रशांत भूषण और अदालत के बीच का मामला है. इसपर सार्वजनिक रूप से टिप्पणियाँ कर सुप्रीम कोर्ट के गौरव को हल्का दिखाना है.

समर्थक और विरोधी क्या कह रहे हैं?सेंट्रल एडमिन्सट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के अध्यक्ष और सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रह चुके प्रमोद कोहली कहते हैं,"अवमाना का क़ानून अगर ना हो तो कोई भी सुप्रीम कोर्ट या दूसरी अदालतों के फ़ैसलों को नहीं मानेगा."

उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पूरे देश पर लागू होते हैं और सभी अदालतें और कार्यपालिका उन फैसलों को मानने के लिए बाध्य हैं. सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता, अखंडता और साख बनी रहे, ये सुनिश्चित करना सबके लिए ज़रूरी है.लेकिन क़ानून के जानकारों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है.

दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस एपी शाह कहते हैं,"ये अफ़सोसनाक है कि जज ऐसा सोचें कि आलोचना को दबाने से न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बढ़ेगी."शाह के अनुसार, अवमानना के क़ानून पर फिर से गौर किए जाने ज़रूरत तो है ही, साथ ही ये भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसका इस्तेमाल किसी तरह की आलोचना को रोकने के लिए नहीं किया जाए.

इमेज कॉपीरइटGetty Imagesआलोचना बनाम अवमाननाकानून के जानकारों को लगता है कि टकराव वहाँ होता है जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 129 आमने-सामने आ जाते हैं.संविधान के अनुसार हर नागरिक अपने विचार रखने या कहने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन जब वो अदालत को लेकर टिप्पणी करे तो फिर अनुच्छेद 129 को भी ध्यान में रखे.

अदालत की अवमाना को लेकर भारत के न्यायिक हलकों में हमेशा से ही बहस होती रही.दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस (रिटायर्ड) एपी शाह के अनुसार अवमानना का क़ानून विश्व के कई देशों में और ख़ास तौर पर मज़बूत लोकतांत्रिक देशों में अप्रचलित होता जा रहा है. मिसाल के तौर पर अमरीका में अदालतों के फैसलों पर टिप्पणियाँ करना आम बात है और वो अवमानना के दायरे में नहीं आते हैं.

लेकिन पूर्व चीफ़ जस्टिस प्रमोद कोहली कहते हैं कि अगर अवमाना का कड़ा कानून नहीं हो तो फिर अदालतों का डर किसी को नहीं रहेगा. कार्यपालिका और विधायिका को मनमानी करने से रोकने का एक ही ज़रिया है और वो है न्यायपालिका.वो कहते हैं,"अगर कानून और अदालतों का डर ही ख़त्म हो जाए तो फिर अदालतें बेमानी हो जाएंगी और सब मनमानी करने लगेंगे. इस लिए अदालत और कानून का सम्मान सबके अंदर होना ज़रूरी है."

कैसे वजूद में आया अवमानना क़ानूनसाल 1949 की 27 मई को पहले इसे अनुच्छेद 108 के रूप में संविधान सभा में पेश किया गया. सहमति बनने के बाद इसे अनुच्छेद 129 के रूप में स्वीकार कर लिया गया.इस अनुच्छेद के दो प्रमुख बिंदु थे- पहला कि सुप्रीम कोर्ट कहाँ स्थित होगा और दूसरा प्रमुख बिंदु था अवमानना. भीम राव आंबेडकर नए संविधान के लिए बनायी गई कमिटी के अध्यक्ष थे.

चर्चा के दौरान कुछ सदस्यों ने अवमानना के मुद्दे पर सवाल उठाया था. उनका तर्क था कि अवमाना का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए रुकावट का काम करेगा.आंबेडकर ने विस्तार से सुप्रीम कोर्ट को इस अनुच्छेद के ज़रिये अवमानना का स्वतः संज्ञान लेने के अधिकार की चर्चा करते हुए इसे ज़रूरी बताया था.

मगर संविधान सभा के सदस्य आरके सिधवा का कहना था कि ये मान लेना कि जज इस क़ानून का इस्तेमाल विवेक से करेंगे, उचित नहीं होगा.उनका कहना था कि संविधान सभा में जो सदस्य पेशे से वकील हैं वो इस क़ानून का समर्थन कर रहे हैं जबकि वो भूल रहे हैं कि जज भी इंसान हैं और ग़लती कर सकते हैं.

लेकिन आम सहमति बनी और अनुच्छेद 129 अस्तित्व में आ गया. और पढो: BBC News Hindi »

राहुल का मार्च हाथरस पर इंसाफ के लिए है? रोहित सरदाना के साथ देखें दंगल

हाथरस की बेटी के नाम पर आज राजनीति का शक्ति प्रदर्शन हुआ. कांग्रेस सांसद और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा दिल्ली से हाथरस की ओर निकले थे लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें वहां जाने नहीं दिया. पुलिस के साथ कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं की जमकर झड़प हुई है, तो इस बीच हाथरस के जवाब में बीजेपी की ओर से राजस्थान के बारां में नाबालिग बहनों के साथ हुए गैंगरेप का मामला उछाला जा रहा है. तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की दलील है कि दोनों मामलों की तुलना नहीं कर सकते. देखें दंगल.

सर्वोच्च न्यायालय अगर गलत फैसला सुनाया है, जो संविधान के अनुरूप नही होगा और सर्वमान्य नही होगा तो उसका विरोध, और फैसला सड़क पर होगा। जिस तरह करोना के आड़ मे सरकार के बिरोध की आवाज़ को कुचल दिया गया आजन्म जेल दो इस गद्दार लिब्रांडू वकील को। Kya saja dene se prasant bhusan jaise log sudhar jayenge? Kyu na inhe fansi de di jaye?

नहीं लेकिन जज को motorcycle पर स्टाइल मारने का प्रोटोकॉल था तो उंगली नहीं उठानी थी वो जज है उनका फैसला सर्वमान्य है भले ही राज्यसभा का टिकट मिले या यूएस कॉग्रेस का....सुनो सुप्रीम संविधान है सिर्फ और कुछ नहीं गलतफहमी निकाल दे एससी और उसके जज। Gan.... ashwaniattrish आज़ादी मिले 73 साल हो गये पर क्या आज़ादी के लिए मर मिटने वालों के सपने पूरे हुए? आज अपने आप से यही सवाल पूछने का दिन है. क्या वास्तव मे आजादी सुराज सुशासन पारदर्शिता मिली या गोरेसाहब गये काले🎩साहब आये व अब हम📚📉😷☘️🎩📜इनके गुलाम हो गये❓आप सभी को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएँ🙏

किसी भी उच्य संस्था के आदर का कारण भय नहीं होना चाहिए। Guys, if u want facts, Truths, realities, mind boosting post & videos so please follow me now 👉 eot_original अपने बाप कि आलोचना कर के देखो समझ आ जाएगा saudagar_sufiya Mujhe lagta h aap faislo se naraz ho sakte ho haq h sabka lekin seedhe ye kahne ki bajay aap review petition bhi daal sakte hai

जब नियम विरूद्ध निर्णय होता है तब न्यायालय की प्रतिष्ठा गिरता है बिल्कुल नहीं कोई संस्था यदि इतनी बातों से डर रही हो कि उसकी आलोचना ना हो तो लोकतंत्र जिंदा नहीं बचेगा फिर चाहे वह सुप्रीम कोर्ट की आलोचना हो या प्रधानमंत्री की या देश की नीतियों की स्वस्थ आलोचना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है प्रशांत भूषण को सजा मिलने से कानून की गरिमा गिर जायेगी ।

BBC twisted it आलोचना से नहीं तुम्हारें घमंड करने से होती हैं। स्वधोषित अभिव्यक्ति कि आजादी के ठेकेदार मानते है कि जो भी कहते है वो अभिव्यक्ति कि आजादी है चाहे सेना के या सविधान के या न्याय व्यवस्था के या फिर देश कि एकता अखंडता के खिलाफ ही क्यों ना हों टुकड़े टुकड़े गैंग कों अच्छा सबक मिला अब इस कुप्रथा पर रोक लगेगा

Jai Shree Ram आलोचना से सुप्रीम न्यायधिश की प्रतिष्ठा कम होती है! आलोचना अलग बात है और आरोप लगाना अलग बात है। और आजकल जो अपने मन की बात न करे उसे बिक हुआ कह देना फैशन से हो गया है। प्रशांत भूषण जी भी वही करते हैं। वे चाहते हैं कि वे अगर समझते हैं कोई बात सही है तो सब उसे सच मान ले वरना न मानने वाले बिके हुए हैं।

Senior is actually senior when they understand the impact and meaning of their saying and stand with dignity...No one have the right to putted the finger on the apex temple of justice. Agar aapko corrupt kaha jayega (may be you are) then ? Pehle yahi admi yeh bolta tha प्रतिष्ठा तो रंजन गोगोई मिट्टी में मिला गये अब बचा क्या है ? सांप निकल गया लकीर पीटने से क्या फ़ायदा बाबरी मस्जिद पर दिये फ़ैसले को दुनिया के हर निष्पक्ष बुध्दीजीवि ने ग़लत और पक्षपाती बताया है।

प्रतिष्ठा ha ha ha तुम्हारी मां का भोषडा।। कुछ कम नहीं होगा तुम विदेशी माधरचोदो का Never it's a good to know about the fact because Supreme Court is supreme but not infallible cji Judge अब ब्रिटिश Broadcasting समझाएगा की कब अवमानना होती है। ब्रिटिश टाईम मे तो ये पावर एक ordinary ब्रिटिश के पास थी उसको तो जज भी होने की जरूरत नही थी। 1857 मार्शल लॉ और Rowlett ऐक्ट भूल गए क्या भाई

जिहादी बीबीसी सुप्रीम कोर्ट की आलोचना से लोगों का विश्वास कम होता है और इस जिहादी ने तो जज पर ही सवाल उठा कर उसे भ्रष्टाचारी कह दिया । प्रशांत भूषण आतंकवादी के फेवर में दलील रखते हैं तो हम भी प्रशांत भूषण को आतंकवादी कह सकते हैं क्या ? इससे उसकी प्रतिष्ठा में कमी नहीं होगा । प्रशांत भूषण अपराधी कपिल मिश्रा निरपराध क़ानून अंधा होता है मै क्या करूँ..मोदी

Yes, all is not dog's like you BBC.... There is difference between criticism and ligation. This Judgement/ order shall always be read as Something against the collective conscience of Most ordinary ,Toiling ,Justice loving Citizens of India BBC ka koi izat nahi hai to ki iska matlab kisi ka bhi izat nahi hai

Jo ye post likha hai ....jara apne family ke kisi sabse nyaya Priya guardian ko gaali de....fir kya kroge. . आजकल न्यायालय मन मुताबिक फैसले थोप रही है जो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है चाहे एसटी एससी आरक्षण हो, चाहे राम मंदिर का फैसला हो, चाहे आर्थिक आधार पर आरक्षण को 50 परसेंट से ऊपर करना हो।

No Kya ye supreme court se bade hai? If I abuse BBC and Royal family of Britain, Britishers then what is your point-of-view towards me? Judges are not God neither Any Court. So don't try to be a God. is desh me sarkar ki alochana karna deshdrohi ho jatha hai our judiciary me baithe logo ko alochana karna bhi abhi gunha ho gaya iska matlab saf hai jo bhi ho raha vo andha bahira ban ke sirf tamasya dekh the raho nahi tho apko deshdrohi sabit kiya jayega

अगर नहीं होती तो ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करके दिखाओ। Alochna hamara adhikaar hi 100% decreased हर प्रकार की आज़ादी फैशन में है चाहे : बोलने कि आज़ादी, कीचड़ उछालने की आज़ादी, चीर हरण की आज़ादी .... लेकिन मन सम्मान की रक्षा की आज़ादी वजूद में नहीं है? Nothing Very Serious B4 MODI _ERA ? SUDDENLY BATTERY CHARGED ! ; JAI (BJP) 'SWA_RAJ' 😊 BANAM 'SWARAJYA'🎭👍

प्रतिष्ठा कम नही होती । अविश्वास पैदा होता है अगर शीर्ष अदालत पर विश्वास नही रहेगा तो हम क्या अमेरिका की कोर्ट मे न्याय लेने जाएँगे ? Haan hoti hai, is Bhoshad Pappu ko muh joote maaro taki kal ko koi aur kuchh aisa na bole. Personal grudges personally nikalo, kisi k designation se Bakchodi kyu ? आलोचना और आरोप में अंतर होता है।

हा अब ये कौन सी (अव)मानना है जनेऊपालिका ? 🤗🤗 pbhushan1 👇 पहली बार मीडिया के सामने आए SC जज, बोले- अगर सुप्रीम कोर्ट को बचाया नहीं गया, तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा - NDTV बड़ा कमज़ोरSC है सिर्फ आलोचना से ही प्रतिष्ठा कम हो जाती है भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को अच्छे से पता है कि क्या करना है। अब बीबीसी के कहने पर संविधान नहीं लिखा जाएगा। मीडिया का काम न्यूज देना है डिसीजन मेकिंग नहीं है। बस अपना काम करे न्यायालय के कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप ना करे।

इसने तो कईयों को अपशब्द कहे.... लेकिन संज्ञान सुप्रीम कोर्ट ने लिया है..... बचने ना पाए. बीबीसी सुप्रीम कोर्ट सिर्फ न्यायालय नहीं है 130 करोड़ जनता का विश्वास है तो उसकी अवमानना करना बहुत बड़ा गुनाह है खैर आपको यह बात कहां समझने वाली 🤣🤣 B b c aur aap party ke sanjay par kab ? जी बिल्कुल, ऐसे तो फिर कोई भी मुँह उठा कर कुछ भी बोल देगा और उससे अभिव्यक्ति की आजादी का नाम दे देगा। लोगो को जिम्मेदारी भी समझनी होगी सिर्फ अधिकार की बात करने से कुछ नहीं होगा।

pbhushan1 Yes, Prashant Bhushan ne Supreme Court pe galat bola hai inhe saja milni chahiye. Abhivyakti ki aazadi ka ye matlab nahi ki kuch bhi bola jaye. Or fir apni Vakalat jhaadi jaye. Han इसे आलोचना नहीं अपमान कहते हैं. ऐसा कहे तो फिर मा और बाप को गाली देनेसे उनकी कौनसी प्रतिष्ठा कम होगी केवल बेइज्जती होगी और क्या चाहते हो

Hahahahaha प्रतिष्ठा उसकी कम या ज्यादा होती है, जिसकी होती है All culprits say like Prashant Bhushan is saying.He deserves severe punishment. नहीं, पर 2014 के बाद इनके द्वारा दिए गए फैसले और कार्य देख प्रतिष्ठा में जरूर कमी आई है Ise gadar vakil desh ke liye khatra hai श्रीमान आप एक वरिष्ठ वकील है Yes certainly.Tomorrow every Tom,Dick & Harry will start criticising the apex court of the country.

Present time Aalochan karna galat bat nhi hai. 2014 se supreme Court badal gayi hai, Aapna kartavy karne Mai chuk rahi hai. देश आजाद हो चुका है आलोचना से अब सिर्फ डर का लोकतंत्र है चूतिया हो क्या एकदम माननीय सर्वोच्च न्यायालय है वो उसकी अपनी गरिमा है पर ये एनडीटीवी का बगल बच्चा चैनल बीबीसी नहीं समझेगा आलोचना और गाली में अंतर होता है, क्यूंकि प्रशांत भूषण एक अमीर घराने से ताल्लुक रखता है, अंग्रेजी बोलता है और विदेशी दोस्त रखता केवल इसलिए प्रशांत भूषण को एक पागल सांड की तरह व्यवहार करने का अधिकार नहीं मिल जाता । इस बार भूषण जी को सबक मिलना ही चाहिए 🙂

Haaa वाह सुप्रीम कोर्ट वाह इस बार तो प्रशांत भूषण के ही गुर्दे छील दिए आलोचना की सीमाओं का निर्धारण आप नहीं कर सकेंगे। बिल्कुल सही किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सब सम्मान करते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नंगा नहीं घूमा जा सकता है। आलोचना से नहीं.. galat फैसले से जरूर कम होती है क्यो दुख हो रहा है तुम्हे अब

सुप्रीम कोर्ट आलोचना के परे हो गया तो तानाशाही a जाएगी।जज ही शासन करने लगेंगे।कानून बनाने का काम भी कोर्ट ले लेंगे। 2014 के बाद हर संस्थान की प्रतिस्ठा कम हुई है 🤔 Yes when jihadis like him ...accuses sc ..people lost faith on judiciary and that's very big and dangerous think कानूनी दायरे में कि गई आलोचना कभी भी गल नहीं हैं।

Naya ka alochana nhi samanny hona chahiye संविधान में अभिव्यक्ती स्वतंत्रता को मुलभूत अधिकारों में रखा है न कि सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा..।जिसका सम्मान करना सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य है..। शायद इस विषय पर सामान्य नागरिक भी बहुत कुछ कहना चाहता है लेकिन कोर्ट केस के झमेलों में फंसने के डर से चुप रहता है। हर व्यक्ति जानता है कि कहां कौन सा खेल चल रहा है मगर बोलता कम है। इसे कहते हैं डर!!🤔

आलोचना और अपराधी कहने में क्या अंतर है ये अशांत प्रदूषण को पूरी तरह से मालूम है। और अब सुप्रीम कोरट इनकी गण्डिया पर लट्ठ पेलेगा। आलोचना तर्कशील नही होगी तो प्रतिष्ठा कम जरूर होगी जैसी प्रशांत भूषण बार बार अपने मनमुताबिक फैसला नही आने पर अपने आपको सुप्रीम कोर्ट से सुप्रीम समझकर जजों पर उलजुलूल टिप्पणियां करते है तो ये प्रतिष्ठा कम होने की श्रेणी में ही आता है।

प्रशांत भूषण के अवमानना वाले मामले में फैसला आज, सुप्रीम कोर्ट 11 बजे सुनाएगा फैसलाप्रशांत भूषण के अवमानना वाले मामले में फैसला आज, सुप्रीम कोर्ट 11 बजे सुनाएगा फैसला PrashantBhushan SupremeCourt 12460_शिक्षकभर्ती 24_शून्य_जनपद_सुप्रीमकोर्ट_काउंटर 7000 अभियर्थियों के नियुक्ति पत्र पर 23 मार्च 2017 से रोक लगी है। myogiadityanath मुख्यमंत्री जी इनकी पीड़ा भी सुनिए इनकी नियुक्ति का रास्ता साफ कीजिये brajeshpathakup drdwivedisatish basicshiksha_up shivprakashbjp ये हर बार माफी मांग के बच जाता है। SupremeCourtOfIndia को सख्ती दिखानी चाहिए। सुबह से लेकर शाम तक सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर,न्याधिशो पर जो चैनेलो पर बैठकर ख़िलाफ़ कमेंट करते है नेता और मीडिया कर्मी उनके ख़िलाफ़ क्यों नही क़दम हुठाता सुप्रीम कोर्ट ? पूछ था है भारत ?

बिहार में कोरोना टेस्ट पर बोले तेजस्वी- जांच में झोल है, आंकड़ों में भी हेराफेरीsambitswaraj has no idea what he is speaking ..jst throwing out nonsense,posionus ,abusive , hurting words . Who the hell give him right to criticize and hurting someone for thier religious beliefs? चलता फिरता कचरे का पात्र है , जब देखो गंदगी उगलता है ArrestSambitPatra Sahi bat he hera feri to ho hi raha he Asli gaddar ye h aur iske vansaj aatankwadi h aaj jo satta me h

सचिन की मैनचेस्टर में पहली सेंचुरी और मुंबई में शुरू हुई 'लव स्टोरी'30 साल पहले करियर का नौवां टेस्ट खेल रहा 17 साल 107 दिन का वो क्रिकेटर टेस्ट बचाने वाला शतक जमाकर विश्व क्रिकेट में छा गया था. Cancel neet Et ensap h

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