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प्रफुल्ल चंद्र रे: वह महान वैज्ञानिक जिनके बूते देश बना हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सबसे बड़ा उत्पादक

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, बीते कुछ दिन में कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में इस नाम को बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है..

10-04-2020 14:24:00

प्रफुल्ल चंद्र रे: वह महान वैज्ञानिक जिनके बूते देश बना हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सबसे बड़ा उत्पादक Prafullchandraray Coronavirus Hydroxycloroquine

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन , बीते कुछ दिन में कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में इस नाम को बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है..

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, बीते कुछ दिन में कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में इस नाम को बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है। समूचे, विश्व समेत अमेरिका में भी इस दवाई की जबरदस्त मांग है। मलेरिया में काम आने वाली इन दवाइयों का भारत बड़ा उत्पादक है। भारत ने इसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब देश में इस ड्रग को लाइसेंस्ड कैटेगरी में डाल दिया गया है। मतलब साफ है कि भारत अपनी जरूरत पूरी होने के बाद इस ड्रग का निर्यात कर सकता है। बीते दिनों इस दवाई के चलते यह तक अफवाह उड़ा दी गई कि ट्रंप ने भारत को धमकी देते हुए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात पर से प्रतिबंध हटाने का दबाव डाला है। देश में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवाई बनाने की सबसे बड़ी कंपनी बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड है, जिसकी स्थापना आज से 119 साल पहले आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे ने की थी, जिन्हें भारतीय रसायन शास्त्र का जनक भी कहा जाता है। आचार्य का सपना था कि देश इस मुकाम पर खड़ा हो, जहां उसे जीवन रक्षक दवाओं के लिए पश्चिमी देशों का मुंह न ताकना पड़े और आज दुनिया की कई बड़ी महाशक्ति कोरोना से निपटने के लिए भारत से मदद की गुहार लगा रही है। ऐसे विषम हालातों में चलिए एक नजर डालते हैं महान वैज्ञानिक, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारकर रहे आचार्य प्रफुल्ल के जीवन पर, जिनकी एक सोच ने भारत को आज कोविड-19 के खिलाफ इतना अहम बना दिया।

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आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे को भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग का जनक माना जाता है। 2 अगस्त 1861 को बंगाल के खुलना जिले के (आज के बांग्लादेश) ररुली कतिपरा में पैदा हुए प्रफुल्ल के पिता हरीशचंद्र राय, फारसी के विद्वान थे। पिता ने अपने गांव में एक मॉडल स्कूल स्थापित किया था, इसमें प्रफुल्ल चंद्र ने प्राथमिक शिक्षा पाई। 12 साल की उम्र में जब बच्चे परियों की कहानी सुनते हैं, तब प्रफुल्ल गैलीलियो और सर आइजक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों की जीवनियां पढ़ने का शौक रखते थे। वैज्ञानिकों के जीवन चरित्र उन्हें बेहद प्रभावित करते। प्रफुल्ल ने जब एक अंग्रेज लेखक की पुस्तक में 1000 महान लोगों की सूची में सिर्फ एक भारतीय राजा राम मोहन राय का नाम देखा तो स्तब्ध रह गए। तभी ठान लिया कि इस लिस्ट में अपना भी नाम छपवाना है। रसायन विज्ञान उनके लिए पहले प्यार की तरह था। कलकत्ता विश्वविद्यालय से डिप्लोमा लेने के बाद वह 1882 में गिल्क्राइस्ट छात्रवृत्ति लेकर विदेश जाकर पढ़ने लगे। 1887-88 में एडिनबरा विश्व विद्यालय में रसायन शास्त्र की सोसाइटी ने उन्हे अपना उपाध्यक्ष चुना। स्वदेश प्रेमी प्रफुल्ल विदेश में भी भारतीय पोशाक ही पहनते थे। 1888 में भारत लौटे तो शुरू में अपनी प्रयोगशाला में मशहूर वैज्ञानिक और अजीज दोस्त जगदीश चंद्र बोस के साथ एक साल जमकर मेहनत की। 1889 में, प्रफुल्ल चंद्र कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में रसायन विज्ञान के सहायक प्रोफेसर बन गए। प्रफुल्ल चन्द्र रे सिर्फ अपने विज्ञान से ही नही बल्कि राष्ट्रवादी विचारों से भी लोगों को प्रभावित करते, उनके सभी लेख लंदन के अखबारों में प्रकाशित होते थे, वे अपने लेखों से ये बताते कि अंग्रेजों ने भारत को किस तरह लूटा और भारतवासी अब भी कैसी यातनाएं झेल रहे हैं। मातृभाषा से प्रेम करने वाले डॉ. रे छात्रों को उदाहरण देते कि रूसी वैज्ञानिक निमेत्री मेंडलीफ ने विश्व प्रसिद्ध तत्वों का पेरियोडिक टेबल रूसी में प्रकाशित करवाया अंग्रेजी में नही।

1894 में प्रफुल्ल ने सबसे पहली खोज मर्करी (पारा) पर की, उन्होंने अस्थाई पदार्थ मरक्यूरस नाइट्रेट को प्रयोगशाला में तैयार कर दिखाया, इसकी सहायता से 80 नए यौगिक तैयार किए और कई महत्वपूर्ण एवं जटिल समस्याओं को सुलझाया। अपने इस असाधारण कार्य के कारण विश्व स्तर पर श्रेष्ठ रसायन वैज्ञानिकों में गिने जाने लगे। इस शोध पर उनके प्रकाशनों ने उन्हें दुनिया भर में धूम मचाई। डॉक्टर प्रफुल्ल चन्द्र रे अपने ज्ञान और कार्य का उपयोग देशवासियों के लिए करना चाहते थे। वे जानते थे कि भारत, जीवन रक्षक दवाओं के लिए विदेशों पर निर्भर है। अपनी आय का अधिकांश हिस्सा वे इसी कार्य में लगाते थे। घर पर पशुओं की हड्डियां जलाकर शक्तिवर्धक फॉस्फेट और कैल्शियम तैयार करते। बतौर शिक्षक वह आज भी भारत के युवा रसायनज्ञों की एक पीढ़ी को प्रेरित कर रहे हैं। मेघनाद साहा और शांति स्वरूप भटनागर जैसे प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक उनके चेले रहे हैं। प्रफुल्ल चंद्र का मानना था कि भारत की प्रगति औद्योगिकीकरण से ही हो सकती है, उन्होंने अपने घर से काम करते हुए, बहुत कम संसाधनों के साथ, महज 800 रुपए की अल्प पूंजी से भारत का पहला रासायनिक कारखाना स्थापित किया। 1901 में, इस अग्रणी प्रयास के परिणामस्वरूप बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड की नींव पड़ी, आज बंगाल केमिकल्स 100 से ज्यादा साल से समृद्ध विरासत के साथ फार्मास्यूटिकल्स और केमिकल्स के क्षेत्र में एक विश्वसनीय नाम है।

क्लोरोक्वीन या एचसीओएस मलेरिया की बेहद पुरानी और कारगर दवाई है, इसका इस्तेमाल दशकों से मलेरिया के मरीजों के लिए किया जा रहा है। क्लोरोक्वीन और इससे जुड़ी दवाइयां विकासशील देशों में पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं, इन देशों में मलेरिया के इलाज में इन दवाओं का इस्तेमाल होता आया है। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इजाद किया गया था, इसके अलावा इसे जोड़ों के दर्द के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल, एक छोटे से अध्ययन के मुताबिक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के साथ एजिथ्रोमाइसीन का संयोजन covid-19 के असर को कम कर सकता है। जैसे-जैसे कोरोना के इलाज में इस दवा के प्रभावी होने की संभावना व्यक्त की जा रही है वैसे-वैसे कई देशों में इसकी मांग बढ़ी है और उसकी उपलब्धता में कमी हो रही है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का यह कहना है कि ये कोरोना वायरस के इलाज में कितनी प्रभावी है, इसे लेकर कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है। वैज्ञानिकों को उम्मीद इस वजह से जागी क्योंकि लंबे समय से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल मलेरिया के बुखार को कम करने में किया जा रहा है और उम्मीद है कि यह कोरोना वायरस को भी रोकने में सक्षम हो सकती है। दूसरी ओर इस दवा का गुर्दा और लीवर पर गंभीर साइड इफेक्ट पड़ता है। बहरीन का दावा है कि उसने सबसे पहले अपने यहां कोरोना के मरीज पर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल किया है। भारत में हर महीने करीब 20 लाख टेबलेट की जरूरत पड़ती है। यानी साल में करीब दो करोड़ चालीस लाख टेबलेट। वहीं भारत हर साल 20 करोड़ टेबलेट बना सकता है।

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, बीते कुछ दिन में कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में इस नाम को बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है। समूचे, विश्व समेत अमेरिका में भी इस दवाई की जबरदस्त मांग है। मलेरिया में काम आने वाली इन दवाइयों का भारत बड़ा उत्पादक है। भारत ने इसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब देश में इस ड्रग को लाइसेंस्ड कैटेगरी में डाल दिया गया है। मतलब साफ है कि भारत अपनी जरूरत पूरी होने के बाद इस ड्रग का निर्यात कर सकता है। बीते दिनों इस दवाई के चलते यह तक अफवाह उड़ा दी गई कि ट्रंप ने भारत को धमकी देते हुए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात पर से प्रतिबंध हटाने का दबाव डाला है। देश में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवाई बनाने की सबसे बड़ी कंपनी बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड है, जिसकी स्थापना आज से 119 साल पहले आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे ने की थी, जिन्हें भारतीय रसायन शास्त्र का जनक भी कहा जाता है। आचार्य का सपना था कि देश इस मुकाम पर खड़ा हो, जहां उसे जीवन रक्षक दवाओं के लिए पश्चिमी देशों का मुंह न ताकना पड़े और आज दुनिया की कई बड़ी महाशक्ति कोरोना से निपटने के लिए भारत से मदद की गुहार लगा रही है। ऐसे विषम हालातों में चलिए एक नजर डालते हैं महान वैज्ञानिक, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारकर रहे आचार्य प्रफुल्ल के जीवन पर, जिनकी एक सोच ने भारत को आज कोविड-19 के खिलाफ इतना अहम बना दिया।

विज्ञापनभारतीय रसायन शास्त्र के जनक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रेप्रफुल्ल चंद्र रे- फोटो : ट्विटरआचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे को भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग का जनक माना जाता है। 2 अगस्त 1861 को बंगाल के खुलना जिले के (आज के बांग्लादेश) ररुली कतिपरा में पैदा हुए प्रफुल्ल के पिता हरीशचंद्र राय, फारसी के विद्वान थे। पिता ने अपने गांव में एक मॉडल स्कूल स्थापित किया था, इसमें प्रफुल्ल चंद्र ने प्राथमिक शिक्षा पाई। 12 साल की उम्र में जब बच्चे परियों की कहानी सुनते हैं, तब प्रफुल्ल गैलीलियो और सर आइजक न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों की जीवनियां पढ़ने का शौक रखते थे। वैज्ञानिकों के जीवन चरित्र उन्हें बेहद प्रभावित करते। प्रफुल्ल ने जब एक अंग्रेज लेखक की पुस्तक में 1000 महान लोगों की सूची में सिर्फ एक भारतीय राजा राम मोहन राय का नाम देखा तो स्तब्ध रह गए। तभी ठान लिया कि इस लिस्ट में अपना भी नाम छपवाना है। रसायन विज्ञान उनके लिए पहले प्यार की तरह था। कलकत्ता विश्वविद्यालय से डिप्लोमा लेने के बाद वह 1882 में गिल्क्राइस्ट छात्रवृत्ति लेकर विदेश जाकर पढ़ने लगे। 1887-88 में एडिनबरा विश्व विद्यालय में रसायन शास्त्र की सोसाइटी ने उन्हे अपना उपाध्यक्ष चुना। स्वदेश प्रेमी प्रफुल्ल विदेश में भी भारतीय पोशाक ही पहनते थे। 1888 में भारत लौटे तो शुरू में अपनी प्रयोगशाला में मशहूर वैज्ञानिक और अजीज दोस्त जगदीश चंद्र बोस के साथ एक साल जमकर मेहनत की। 1889 में, प्रफुल्ल चंद्र कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में रसायन विज्ञान के सहायक प्रोफेसर बन गए। प्रफुल्ल चन्द्र रे सिर्फ अपने विज्ञान से ही नही बल्कि राष्ट्रवादी विचारों से भी लोगों को प्रभावित करते, उनके सभी लेख लंदन के अखबारों में प्रकाशित होते थे, वे अपने लेखों से ये बताते कि अंग्रेजों ने भारत को किस तरह लूटा और भारतवासी अब भी कैसी यातनाएं झेल रहे हैं। मातृभाषा से प्रेम करने वाले डॉ. रे छात्रों को उदाहरण देते कि रूसी वैज्ञानिक निमेत्री मेंडलीफ ने विश्व प्रसिद्ध तत्वों का पेरियोडिक टेबल रूसी में प्रकाशित करवाया अंग्रेजी में नही।

महज 800 रुपये में हुई थी देश की पहली फार्मास्यूटिकल्स कंपनी की शुरुआतप्रफुल्ल चंद्र रे- फोटो : ट्विटर1894 में प्रफुल्ल ने सबसे पहली खोज मर्करी (पारा) पर की, उन्होंने अस्थाई पदार्थ मरक्यूरस नाइट्रेट को प्रयोगशाला में तैयार कर दिखाया, इसकी सहायता से 80 नए यौगिक तैयार किए और कई महत्वपूर्ण एवं जटिल समस्याओं को सुलझाया। अपने इस असाधारण कार्य के कारण विश्व स्तर पर श्रेष्ठ रसायन वैज्ञानिकों में गिने जाने लगे। इस शोध पर उनके प्रकाशनों ने उन्हें दुनिया भर में धूम मचाई। डॉक्टर प्रफुल्ल चन्द्र रे अपने ज्ञान और कार्य का उपयोग देशवासियों के लिए करना चाहते थे। वे जानते थे कि भारत, जीवन रक्षक दवाओं के लिए विदेशों पर निर्भर है। अपनी आय का अधिकांश हिस्सा वे इसी कार्य में लगाते थे। घर पर पशुओं की हड्डियां जलाकर शक्तिवर्धक फॉस्फेट और कैल्शियम तैयार करते। बतौर शिक्षक वह आज भी भारत के युवा रसायनज्ञों की एक पीढ़ी को प्रेरित कर रहे हैं। मेघनाद साहा और शांति स्वरूप भटनागर जैसे प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक उनके चेले रहे हैं। प्रफुल्ल चंद्र का मानना था कि भारत की प्रगति औद्योगिकीकरण से ही हो सकती है, उन्होंने अपने घर से काम करते हुए, बहुत कम संसाधनों के साथ, महज 800 रुपए की अल्प पूंजी से भारत का पहला रासायनिक कारखाना स्थापित किया। 1901 में, इस अग्रणी प्रयास के परिणामस्वरूप बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड की नींव पड़ी, आज बंगाल केमिकल्स 100 से ज्यादा साल से समृद्ध विरासत के साथ फार्मास्यूटिकल्स और केमिकल्स के क्षेत्र में एक विश्वसनीय नाम है।

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क्या वाकई कोरोना के खिलाफ कारगर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन?हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन- फोटो : social mediaक्लोरोक्वीन या एचसीओएस मलेरिया की बेहद पुरानी और कारगर दवाई है, इसका इस्तेमाल दशकों से मलेरिया के मरीजों के लिए किया जा रहा है। क्लोरोक्वीन और इससे जुड़ी दवाइयां विकासशील देशों में पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं, इन देशों में मलेरिया के इलाज में इन दवाओं का इस्तेमाल होता आया है। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इजाद किया गया था, इसके अलावा इसे जोड़ों के दर्द के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल, एक छोटे से अध्ययन के मुताबिक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के साथ एजिथ्रोमाइसीन का संयोजन covid-19 के असर को कम कर सकता है। जैसे-जैसे कोरोना के इलाज में इस दवा के प्रभावी होने की संभावना व्यक्त की जा रही है वैसे-वैसे कई देशों में इसकी मांग बढ़ी है और उसकी उपलब्धता में कमी हो रही है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का यह कहना है कि ये कोरोना वायरस के इलाज में कितनी प्रभावी है, इसे लेकर कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है। वैज्ञानिकों को उम्मीद इस वजह से जागी क्योंकि लंबे समय से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल मलेरिया के बुखार को कम करने में किया जा रहा है और उम्मीद है कि यह कोरोना वायरस को भी रोकने में सक्षम हो सकती है। दूसरी ओर इस दवा का गुर्दा और लीवर पर गंभीर साइड इफेक्ट पड़ता है। बहरीन का दावा है कि उसने सबसे पहले अपने यहां कोरोना के मरीज पर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल किया है। भारत में हर महीने करीब 20 लाख टेबलेट की जरूरत पड़ती है। यानी साल में करीब दो करोड़ चालीस लाख टेबलेट। वहीं भारत हर साल 20 करोड़ टेबलेट बना सकता है।

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Thx to In1902,he published the first volume of A History of Hindu Chemistry from the Earliest Times to the Middle of Sixteenth Century.The second volume was published in 1909.The work was result of many years search through ancient Sanskrit manuscripts nd through works of orientalists नमन है इस महान वैज्ञानिक को। माँ भारती की सेवा मे अमुल्य योगदान।

Salutes !! pramila2710 ये दवा तो नेहरू जी ने बनाई थी ना, विशेष विलायती औखली में अपने विशेष मूसल से कूटकर कोई ज्ञानीजन हो तो दुविधा दूर करे। 🙏 👌👌 He was a BENGALI scientist proud to be a BENGALI...

काशी के मंदिरों में बन रहा खाना, प्रयागराज में फेसबुक पर भगवान के LIVE दर्शन🚩🙏सनातन हिन्दू धर्म की जय हो 🚩🙏 पश्चिम बंगाल में मुस्लिम धर्मगुरु ने कहा कि ,इस वायरस से ,50 करोड़ लोग मरने चाहिए ।

मुंबई के धारावी में कोरोना के 5 नए मरीज मिले, पूरे महाराष्ट्र में 1364 मरीज Coronavirus in India State-Wise LIVE Latest News Updates, COVID-19 India Tracker Live Update: पिछले 24 घंटे में ही महाराष्ट्र में कोरोना के 229 नए मामले सामने आए हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां पिछले 24 घंटे में कोरोना के 41 नए मरीज मिले हैं। जिसके बाद राज्य में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 410 हो गई है।

कोरोना के चक्कर में न खाएं हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, जानलेवा हैं साइड इफेक्ट्स - Coronavirus AajTakअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से जो दवाई मंगाई है, उसके साइड इफेक्ट्स भी हैं. यानी उस दवा का उपयोग खतरनाक भी हो सकता RahulGandhi Answer for this पाकिस्तान को भी hydroxychloroquine की जरूरत है पर स्पेलिंग नही आने की वजह से मांग नही रहा है। 😂🤣😂 ImranKhanPTI 'ग्रेट अमेरिका 5 ₹ वाली मलेरिया की गोली मांग रहा है भारत से...!!'😀 काहे का सुपर पॉवर है भइया ! 😂

दो गुजराती भाइयों की कंपनी ने US में डोनेट किए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के 34 लाख टेबलेटApne desh m gujrati labours ko maar maar ker nikal rahe hai भारत में डोनेट करने मे शर्म आ रही है क्या The real heroes of our battle! Doctors, paramedics, and nurses are working day and night in this difficult time to ensure the health and well-being of all the patients. Let's help them by not adding to their burden and stay at our homes till we get through this.

दिल्ली: डिफेंस कॉलोनी में 1 परिवार के 3 मेंबर कोरोना पॉजिटिव, घर के गार्ड पर शकदिल्ली की हाई प्रोफाइल मानी जाने वाले डिफेंस कॉलोनी इलाके में रहने वाले एक ही परिवार के 3 सदस्यों को कोरोना पॉजिटिव के मामले सामने आए हैं, जिसके बाद परिवार के सदस्य को अस्पताल में भर्ती कराया गया. इन्होंने अपने सुरक्षा गार्ड पर शंका जाहिर की है. arvindojha arvindojha कितने अफसोस बात है जो परिवार पूरे लोक डाउन का पालन कर रहा था घर में कैद होकर रह रहा था वह एक गार्ड के कारण संक्रमित हो गया क्योंकि वह गार्ड जमात में जाता था। अगर गार्ड जमात में नहीं जाता तो शायद यह परिवार भी संक्रमित नहीं होता

यूपी में 15 जिलों के 'हॉटस्पॉट' इन शर्तों के साथ सील, जानें- क्यों नहीं होगी परेशानीLucknow Administration News: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार (Yogi Adityanath Government) ने सूबे के 15 ऐसे जिलों के हॉटस्पॉस्ट को पूरी तरह से सील कर दिया है। सील किए गए इलाकों में किसी को भी जाने की इजाजत नहीं होगी। यहां पर जरूरी सामानों की होम डिलीवरी की व्यवस्था की गई है। सील की सूचना मिलते ही लखनऊ के सभी बाज़ारों में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी यहां गाजियाबाद में सब कुछ बंद है यहां खाने के लिए भी कुछ नहीं बन रहा है ना सब्जी है ना राशन मिल रहा है कैसे काम चलेगा मुख्यमंत्री जी पसंद आए थे गरिमा गार्डन में मार्केट बंद है दुकानें बंद है कुछ भी खाने के लिए नहीं खरीद सकते दूर तक के लिए नहीं है खुली है दुकाने मीडिया ने पूरे 2 घण्टे जमकर अफवाह फैलाई की UP के15 जिले पूरी तरह सील होंगे, नतीजा हज़ारो लोग सामान खरीदने बाहर निकले। इन मीडिया वालों को ब्रेकिंग न्यूज़ से धंधा करने से मतलब है बस। शर्मनाक मीडिया। UPGovt dgpup myogiadityanath

कोरोना वायरस: दुनिया भर में 65.6 लाख से ज़्यादा संक्रमित, 3.87 लाख लोगों की मौत - BBC Hindi जब सब कुछ रामभरोसे ही छोड़ना था, तो तालाबंदी कर अर्थव्यवस्था की रीढ़ क्यों तोड़ी...? कोरोना अपडेटः जॉर्ज फ़्लॉयड को कोरोना संक्रमण भी हुआ था - BBC Hindi पुरी के जगन्नाथ मंदिर में देवस्नान के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ी धज्जियां, पुजारियों ने मास्क भी नहीं पहना - देखें VIDEO NDTV से बोले नितिन गडकरी- देश संकट में है, अभी राजनीति करने का समय नहीं हथिनी की मौत: गिरफ़्तार अभियुक्त ने कहा- विस्फोटक नारियल में था ट्रंप ने विभाजन की आग भड़काई, अमरीका के पूर्व रक्षा मंत्री का आरोप राहुल ने फिर लॉकडाउन को बताया फेल, कहा- राज्यों को उनके हाल पर छोड़ रहा केंद्र ट्रंप की बेटी टिफ़नी विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में George Floyd की मौत पर डोनाल्ड ट्रम्प की बेटी टिफनी ने किया प्रदर्शनकारियों का समर्थन, शेयर की ये पोस्ट बासु चटर्जीः रजनीगंधा, चितचोर और 'छोटी सी बात' वाले बासु दा नहीं रहे