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पेटेंट के मामले में पिछड़ा क्यों है भारत | DW | 09.12.2019

भारत में पेटेंट के आवेदनों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन उसकी स्वीकृति की दर बहुत कम है. पेटेंट के मामले में अभी भी देश में वैसा माहौल नहीं बन पाया है जो उसे दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल करा सके.

9.12.2019

भारत में पेटेंट के आवेदनों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन उसकी स्वीकृति की दर बहुत कम है. पेटेंट के मामले में अभी भी देश में वैसा माहौल नहीं बन पाया है जो उसे दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल करा सके.

भारत में पेटेंट के आवेदनों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन उसकी स्वीकृति की दर बहुत कम है. पेटेंट के मामले में अभी भी देश में वैसा माहौल नहीं बन पाया है जो उसे दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल करा सके.

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के एक आकलन के मुताबिक 2016-17 के दौरान भारत ने अपनी जीडीपी का महज दशमलव सात प्रतिशत ही आर एंड डी यानि शोध और विकास कार्यकर्मों पर खर्च किया. जापान में ये प्रतिशत 3.2 था, अमेरिका में 2.8 और चीन में 2.1.

भारत में पेटेंट की प्रक्रिया भारतीय पेटेंट कानून, 1970 से निर्धारित होती है. ट्रिप्स के तहत कुछ संशोधन हुए हैं. 2005 में भारत ने अपने पेटेंट कानून में संशोधन किया था और विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के मुताबिक उसे ढालने की कोशिश की थी. उस समय 56 हजार आवेदन लंबित थे. पेटेंट देने के मामले में भी भारत में ज्यादा समय खर्च होता है. ओईसीडी के मुताबिक 2017 में जहां जापान ने 15 महीने, चीन ने 22 और अमेरिका ने 24 महीने पेटेंट स्वीकृत करने में लगाए वहीं भारत ने 64 महीनों में ये काम किया.

और भारत में बात सिर्फ पेटेंट की संख्या की ही नहीं उनकी गुणवत्ता और उनकी वाणिज्यिक और नीतिगत सामर्थ्य की भी है. गहन क्वालिटी रिसर्च और पर्याप्त फंडिंग की बदौलत किसी नई खोज को पेटेंट तक पहुंचाया जा सकता है. देश में बौद्धिक संपदा अधिकारों की अहमियत को लेकर जागरूकता का अभाव माना जाता है. जब भी कोई नवाचार संबंधी सर्वे जारी होता है तो भारत की रैंक इसमें नीचे ही नजर आती है. नवोन्मेष की ओर पीठ इसलिए भी है कि सामने और भी कई सारी चुनौतियां और कमजोरियां और विवशताएं हैं. कमजोर बुनियादी ढांचा और सीमित संसाधनों की वजह से एक विशाल बैकलॉग बना है. आवेदनों की संख्या ज्यादा है और उनकी जांच करने वाले पर्यवेक्षकों की संख्या कम. जाहिर है इसका असर स्वीकृत पेटेंट की गुणवत्ता पर भी पड़ता है. बौद्धिक संपदा प्रशासन को पारदर्शी और चुस्त बनाए जाने की जरूरत भी है. पेटेंट विभाग अभी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन आता है, जिसकी भारी-भरकम और जटिल सरकारी मशीनरी में पेटेंट का मुद्दा शायद उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता.

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