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पेगासस मामला: क्या हैं वे सात बिंदु, सुप्रीम कोर्ट ने जिनकी जांच करने का आदेश दिया है

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27-10-2021 15:55:00

पेगासस मामला: क्या हैं वे सात बिंदु, सुप्रीम कोर्ट ने जिनकी जांच करने का आदेश दिया है SupremeCourt PegasusProbe सुप्रीमकोर्ट पेगासस

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति को पेगासस जासूसी मामले में सात बिंदुओं पर जांच करने और सात बिंदुओं पर महत्वपूर्ण सिफ़ारिश करने का निर्देश दिया गया है. अदालत ने कहा कि सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देने मात्र से न्यायालय मूक दर्शक बना नहीं रह सकता है.

द वायरने ऐसे 161 नामों (जिसमें पत्रकार, मंत्री, नेता, कार्यकर्ता, वकील इत्यादि शामिल हैं) का खुलासा था जिनकी पेगासस के जरिये हैकिंग किए जाने की संभावना है.इसमें सेद वायरके दो संस्थापक संपादकों- सिद्धार्थ वरदाजन और एमके वेणु, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, अन्य पत्रकार जैसे सुशांत सिंह, परंजॉय गुहा ठाकुरता और एसएनएम अब्दी, मरहूम डीयू प्रोफेसर एसएआर गिलानी, कश्मीरी अलगाववादी नेता बिलाल लोन और वकील अल्जो पी. जोसेफ के फोन में पेगासस स्पायवेयर उपलब्ध होने की पुष्टि हुई थी.

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एनएसओ ग्रुप यह मिलिट्री ग्रेड स्पायवेयर सिर्फ सरकारों को ही बेचता है. भारत सरकार ने पेगासस की खरीद को लेकर न तो इनकार किया है और न ही स्वीकार किया है.भारत के रक्षा और आईटी मंत्रालय ने पेगासस स्पायवेयर के इस्तेमाल से इनकार कर दिया था. चूंकि मोदी सरकार ने इस निगरानी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल और उसे खरीदने पर चुप्पी साध रखी है, इसलिए कोर्ट को स्वतंत्र कमेटी का गठन कर जांच करने का आदेश देना पड़ा है.

सुप्रीम कोर्ट ने समिति को उपर्युक्त बिंदुओं पर जांच के साथ-साथ निम्नलिखित बिंदुओं पर सिफारिश देने का निर्देश दिया है;निगरानी को लेकर मौजूदा कानून और प्रक्रियाओं के अधिनियमन या संशोधन के संबंध में और निजता के बेहतर अधिकार को सुरक्षित करने के लिए.देश और उसकी संपत्तियों की साइबर सुरक्षा को बढ़ाने और सुधारने के संबंध में. headtopics.com

इस तरह के स्पायवेयर के माध्यम से सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा नागरिकों के निजता के अधिकार पर हमले से रोकथाम को सुनिश्चित करने के संबंध में.नागरिकों को उनके उपकरणों की अवैध निगरानी के संदेह पर शिकायत करने के लिए एक तंत्र की स्थापना के संबंध में.

साइबर हमले से संबंधित खतरे का आकलन करने, देश में साइबर हमले की घटनाओं की जांच करने और साइबर सुरक्षा कमजोरियों की जांच के लिए एक स्वतंत्र प्रीमियर एजेंसी की स्थापना के संबंध में.किसी भी एडहॉक व्यवस्था के संबंध में, जो इस न्यायालय द्वारा नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अंतरिम उपाय के रूप में उपयोग किया जा सके, जो संसद द्वारा इस संबंध में कानून बनाने तक कारगर हो सके.

किसी अन्य सहायक मामले पर जो समिति को उचित लगे.इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस समिति को कई सारे अधिकार दिए हैं, ताकि वे अपने काम को अच्छी तरह से पूरा कर सकें.समिति को अपनी स्वयं की प्रक्रिया तैयार करने, अपनी जरूरत अनुसार कोई भी जांच करने और जांच के संबंध में किसी भी व्यक्ति का बयान लेने के लिए अधिकृत किया गया है. समिति अपनी जांच के दायरे में किसी भी प्राधिकारी या व्यक्ति के रिकॉर्ड की भी मांग कर सकती है.

जस्टिस रवींद्रन को अपने कार्यों के निर्वहन में किसी भी सेवारत या सेवानिवृत्त अधिकारियों, कानूनी विशेषज्ञों या तकनीकी विशेषज्ञों की सहायता लेने की स्वतंत्रता दी गई है.कोर्ट ने जस्टिस रवींद्रन से समिति के सदस्यों का मानदेय तय करने का भी अनुरोध किया है. न्यायालय ने केंद्र सरकार को इस मानदेय का तत्काल भुगतान करने का निर्देश दिया है. headtopics.com

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इसके अलावा अदालत ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को, उनके अधीन सभी एजेंसियों और अधिकारियों द्वारा समिति का पूर्ण सहयोग करने का निर्देश दिया है.राष्ट्रीय सुरक्षामालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट पीठ ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देने की केंद्र की पुरजोर दलीलों पर गौर किया और उन्हें यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया, ‘इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार हर बार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मुद्दा देकर इसका लाभ पा सकती है.’

पीठ ने कहा कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा वह हौवा नहीं हो सकती, जिसका जिक्र होने मात्र से कोर्ट खुद को मामले से दूर कर ले. हालांकि, इस न्यायालय को राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में हस्तक्षेप करते समय सतर्क रहना चाहिए, लेकिन न्यायिक समीक्षा के लिए इसे निषेध नहीं कहा जा सकता है.’

प्रधान न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा कि केंद्र को ‘अदालत के समक्ष पेश अपने दृष्टिकोण को न्यायोचित ठहराना चाहिए. सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देने मात्र से न्यायालय मूक दर्शक बना नहीं रह सकता.’शीर्ष अदालत ने कहा कि टकरावों से भरी इस दुनिया में किसी भी सरकारी एजेंसी या किसी निजी संस्था पर भरोसा करने के बजाय, पूर्वाग्रहों से मुक्त, स्वतंत्र एवं सक्षम विशेषज्ञों को ढूंढना और उनका चयन करना एक अत्यंत कठिन कार्य था.

पीठ ने कहा, ‘हम यह स्पष्ट करते हैं कि हमारा प्रयास राजनीतिक बयानबाजी में खुद को शामिल किए बगैर ही संवैधानिक आकांक्षाओं और कानून का शासन बनाए रखने का है.’ पीठ ने कहा कि यह न्यायलाय सदैव ही राजनीति के मकड़जाल में प्रवेश नहीं करने के प्रति सजग रहता है.पीठ ने कहा, ‘सभ्य लोकतांत्रिक समाज के सदस्य उचित निजता की अपेक्षा करते हैं. निजता सिर्फ पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं की चिंता का विषय नहीं है.’ headtopics.com

शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून के शासन से शासित एक लोकतांत्रिक देश में, संविधान के तहत कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करते हुए पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा उपायों के अलावा किसी भी तरह से मनमानी तरीके से लोगों की जासूसी की अनुमति नहीं है.पीठ ने बीते 13 सितंबर को इस मामले में सुनवाई पूरी करते हुए कहा था कि वह सिर्फ यह जानना चाहती है कि क्या केंद्र ने नागरिकों की कथित जासूसी के लिए अवैध तरीके से पेगासस सॉफ्टवेयर का उपयोग किया या नहीं?

उल्लेखनीय है कि ये याचिकाएं इजरायल की फर्म एनएसओ के ‘पेगासस स्पायवेयर’ का इस्तेमाल कर सरकारी संस्थानों द्वारा कथित तौर पर नागरिकों, राजनेताओं और पत्रकारों की जासूसी कराए जाने की रिपोर्ट की स्वतंत्र जांच के अनुरोध से जुड़ी हैं.मालूम हो कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंसोर्टियम, जिसमें

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