पश्चिम यूपी में किसकी चल रही है हवा

ब्‍लॉग: जाटलैंड में आसान नहीं रालोद-सपा का रास्‍ता, समझें पश्चिम यूपी में किसकी चल रही है हवा #UPElections2022

Upelections 2022

02-12-2021 04:00:00

ब्‍लॉग: जाटलैंड में आसान नहीं रालोद-सपा का रास्‍ता, समझें पश्चिम यूपी में किसकी चल रही है हवा UPElections2022

जाट मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग बीजेपी सरकार से नाराज है और वह आरएलडी की तरफ देख रहा है। लेकिन गहराई से देखने पर साफ हो जाता है कि इस नाराजगी के पीछे केवल किसान आंदोलन नहीं है।

बृजेश शुक्ललगभग दो दशक बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान आंदोलन की सफलता से उत्साहित राष्ट्रीय लोक दल अपनी शर्तों पर चुनावी समझौता कर रहा है। आरएलडी का समाजवादी पार्टी से चुनावी समझौता लगभग तय हो चुका है। क्या पश्चिम उत्तर प्रदेश की हवाएं कुछ बदल गई हैं, जो आरएलडी इस कदर उत्साहित है और उससे चुनावी समझौता करने वाली एसपी भी। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए जाटलैंड की जमीनी हकीकत क्या है? वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दौरा करते हुए यह साफ दिखा था कि बीजेपी को शिकस्त दे पाना बहुत कठिन है। हालांकि जातीय समीकरणों की दृष्टि से विपक्षी दलों का वह सबसे मजबूत गठजोड़ था। फिर भी महागठबंधन से खड़े अजित सिंह (मुजफ्फरनगर) और उनके पुत्र जयंत (बागपत) दोनों चुनाव हार गए थे।

कई किंतु-परंतु हैंक्या इस बार गन्ना बेल्ट में किसान आंदोलन के असर और महंगाई जैसे मुद्दों के कारण आरएलडी और समाजवादी पार्टी के गठजोड़ से बीजेपी मात खा जाएगी? यह लाख टके का सवाल है और इसका उत्तर सभी तलाश रहे हैं। प्रश्न यह भी है कि वे कौन से कारण थे कि विपक्षी दलों का मजबूत महागठजोड़ 2019 में बीजेपी को शिकस्त नहीं दे सका था और वे कौन से कारक हैं जिनके आधार पर माना जाए कि बीजेपी इस बार अपनी मजबूत जमीन खो सकती है। कहा जा सकता है कि किसान नाराज हैं, महंगाई बहुत है, मुस्लिम और जाट एकजुट हो गए हैं, इसलिए बीजेपी के लिए यह मैदान कठिन हो गया है। लेकिन जमीनी हकीकत तक पहुंचने पर इस आकलन में तमाम किंतु-परंतु लग जाते हैं।

दलितों की संख्या की दृष्टि से उर्वरा इस भूमि में इस बार बीएसपी अकेले चुनाव मैदान में है और इसमें कोई दो राय नहीं कि दलितों का एक बड़ा वर्ग फिलहाल मायावती के साथ खड़ा दिखता है। 2019 में मायावती समर्थक मतदाताओं को लगता था कि इस बार उनकी नेता प्रधानमंत्री बन सकती हैं। इसलिए वे एकजुट होकर महागठबंधन के साथ थे। इसके बावजूद परिणाम विपरीत आए। ऐसे में इस बार जब दलित एसपी-आरएलडी गठजोड़ के साथ जाते नहीं दिख रहे हैं तो क्या यह गठजोड़ चमत्कार कर पाएगा? headtopics.com

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किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही हुआ है। 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद सामाजिक समीकरण बदल गए थे। लेकिन गैर-बीजेपी दलों को लगता है कि अब जाटों और मुसलमानों के बीच दूरी कम हुई है। जमीन पर यह दिखता भी है कि आपसी कटुता कम हुई है। किसान आंदोलन के नाम पर सभी एक साथ आए हैं। कुल मिलाकर, यह निश्चित है कि जाट मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग बीजेपी सरकार से नाराज है और वह आरएलडी की तरफ देख रहा है। राष्ट्रीय लोक दल उसकी स्वभाविक पार्टी रही है। लेकिन गहराई से देखने पर यह बात साफ हो जाती है कि इस नाराजगी के पीछे केवल किसान आंदोलन नहीं है। वास्तव में चौधरी चरण सिंह किसानों के मसीहा थे और जाटों के एकमात्र सबसे बड़े नेता भी। 2014 में चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह और पौत्र जयंत दोनों चुनाव हार गए। बीजेपी समर्थक होने के बावजूद जाटों के बड़े वर्ग को इन दोनों की हार का मलाल हुआ। 2019 में महा-गठबंधन होने के बाद चौधरी साहब के समर्थकों को लगता था कि इस बार अजित सिंह और जयंत दोनों आसानी से जीत जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अजित सिंह की मृत्यु ने इस दर्द को और बढ़ा दिया। इस बीच कृषि कानून को लेकर सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी और वे सब आरएलडी के झंडे तले खड़े हो गए हैं। यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानूनों को रद्द कर दिया, तब भी किसानों, विशेष रूप से जाट मतदाताओं के एक वर्ग में सरकार से नाराजगी कम नहीं हुई।

जब कल्याण को हुई एक दिन की जेल और खुद जेलर ने कोर्ट से ही पूछ लिया सवालमुस्लिम मतदाता भी आरएलडी और एसपी गठजोड़ की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है। उसे लगता है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। बीजेपी को हराने के लिए इससे बेहतर माहौल नहीं हो सकता। किसान आंदोलन की मजबूती के नाम पर कांग्रेस ने भी किसान पंचायतें कीं, लेकिन उनका असर कम ही दिखता है। आम तौर पर कहा जाए तो आंदोलन से जुड़े हुए लोग न कांग्रेस के साथ हैं और न समाजवादी पार्टी के। उनमें अधिकांश आरएलडी के साथ खड़े हैं। यही समीकरण आरएलडी को उत्साहित कर रहा है। मुस्लिम मतदाता भी सब भूल कर आरएलडी गठबंधन के साथ है।

लेकिन मजबूती के बावजूद इस गठजोड़ को बीजेपी और बीएसपी से कड़ी चुनौती मिल रही है। वर्ष 2019 में जो दलित मतदाता महागठबंधन के साथ खड़े थे, वे फिर अपनी नेता मायावती की पार्टी के साथ आ खड़े हुए हैं। दूसरी ओर किसान आंदोलन के तमाम दावों प्रति दावों के बावजूद बीजेपी के सवर्ण और अति पिछड़े मतदाताओं में कोई पार्टी बड़ी सेंध लग पाएगी इसमें संदेह है। यह वही मतदाता है जो बीजेपी के लिए संजीवनी का काम करता है। सवाल यह है कि क्या किसान आंदोलन के चलते अति पिछड़े मतदाता आरएलडी और एसपी के साथ जाएंगे?

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रोचक मुकाबलागठबंधन तभी बड़ी कामयाबी हासिल कर पाएगा, जब उसे सभी वर्गों का समर्थन मिले। किसान आंदोलन, महंगाई ,गन्ना किसानों का भुगतान न होने जैसे तमाम मुद्दों के बल पर एसपी-आरएलडी गठबंधन बीजेपी के इस किले को भेदना चाहता है लेकिन यह आसान नहीं है। उधर, बीएसपी को जो बहुत कमजोर समझ रहे हैं वे भी जमीनी हकीकत से अनजान हैं। 2002 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल ने 15 सीटें पाई थीं। इसके बाद से वह दहाई का आंकड़ा पार नहीं कर सकी। 2017 विधानसभा चुनावों में उसे सिर्फ एक सीट मिली थी। जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव को छोड़ कर हर बार आरएलडी ने चुनाव गठबंधन के आधार पर ही लड़ा। इस बार का लड़ाई और भी रोचक हो गई है क्योंकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में चुनाव किसान आंदोलन के नाम पर लड़ा जा रहा है। परिणाम किसान आंदोलन की जमीनी पकड़ को भी उजागर करेंगे। headtopics.com

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