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चीन और यूरोपियन यूनियन के निवेश समझौते में अमेरिका ने फंसाया पेच

चीन और ईयू के बीच प्रस्तावित निवेश समझौते पर सहमति बनने के बावजूद इस पर दस्तखत का कार्यक्रम फिलहाल टल गया है। बताया

25-12-2020 13:00:00

चीन और यूरोपियन यूनियन के निवेश समझौते में अमेरिका ने फंसाया पेच China EuropeanUnion China News European InvestmentAgreement

चीन और ईयू के बीच प्रस्तावित निवेश समझौते पर सहमति बनने के बावजूद इस पर दस्तखत का कार्यक्रम फिलहाल टल गया है। बताया

ख़बर सुनेंचीन और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बीच प्रस्तावित निवेश समझौते पर सहमति बनने के बावजूद इस पर दस्तखत का कार्यक्रम फिलहाल टल गया है। बताया जाता है कि अमेरिका ने इसमें शुरुआती पेच फंसाया है। उसके बाद फ्रांस और पोलैंड ने इसे वीटो करने का एलान कर दिया। जबकि पहले इस करार पर इसी हफ्ते दस्तखत होने की संभावना जताई गई थी।

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करार की शर्तों को अंतिम रूप देने के लिए ईयू के व्यापार वार्ताकार वाल्दिस दोमब्रोवस्किस और चीन के व्यापार वार्ताकार लिउ ही की बैठक भी तय हो गई थी, लेकिन ये बैठक टाल देनी पड़ी। पहले खबर आई कि ब्रेक अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन की टीम ने लगाया है।

बाइडन के मनोनीत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवान ने संदेश भेजा कि अगला अमेरिकी प्रशासन अपने यूरोपीय पार्टनर्स के साथ आर्थिक मसलों पर चीन को लेकर मौजूद साझा चिंताओं पर जल्द से जल्द विचार-विमर्श करना चाहता है। ये आशंका पहले से जताई जा रही थी कि अगर ईयू ने अलग से समझौता कर लिया तो यह कदम चीन के मामले में यूरोप के साथ मिलकर साझा रणनीति बनाने की निर्वाचित राष्ट्रपति बाइडन की इच्छा के खिलाफ होगा। headtopics.com

इन खबरों के बाद फ्रांस ने साफ एलान कर दिया कि वह चीन के साथ होने वाले निवेश समझौते का समर्थन नहीं करेगा। फ्रांस के व्यापार उप मंत्री फ्रैंक रीस्टर ने पेरिस के अखबार ला मोंड से कहा- अगर जबरिया मजदूरी खत्म करने की दिशा में हम नहीं बढ़ सकते तो फ्रांस को चीन में निवेश सुविधा प्राप्त करने में कोई रुचि नहीं है।

रीस्टर ने कहा कि व्यापार समझौतों का उपयोग सामाजिक मुद्दों पर प्रगति के लिए करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस समझौते पर सहमति बनी है, उससे चीन के बाजार तक ज्यादा पहुंच तो बनेगी, लेकिन उससे यूरोपीय निवेश को सुरक्षा नहीं मिलेगी। रीस्टर ने कहा कि चीन में अचानक राष्ट्रीयकरण की संभावना से यूरोपीय कंपनियों को सुरक्षा देना बहुत अहम है। रीस्टर ने दावा किया कि बेल्जियम, लग्जमबर्ग और नीदरलैंड्स भी इस मामले में फ्रांस के रुख के साथ हैं।

उधर पोलैंड ने गुरुवार को ईयू से अनुरोध किया कि वह चीन के साथ समझौता करने में जल्दबाजी ना करे। उसने कहा कि उसे अमेरिका से सहयोग करते हुए इस दिशा में बढ़ाना चाहिए। वेबसाइट पोलिटिको.ईयू के मुताबिक उससे बातचीत में ईयू एक राजनयिक ने यह स्वीकार किया कि ईयू-चीन समझौते के मुद्दे पर ईयू को कई सदस्य देशों के विरोध का सामना करना पड़ा है। विरोध की वजह मुख्य रूप से चीन में निवेश संरक्षण के प्रावधान का कथित रूप से कमजोर होना और इसमें जबरिया श्रम रोकने की शर्त शामिल ना होना है।

अब तक चीन या ईयू दोनों में से किसी ने ये जानकारी नहीं दी है कि दोनों पक्षों के बीच अगली वार्ता कब होगी। इस बारे में मीडिया के सवालों पर दोनों जगहों से सिर्फ यह कहा गया कि चीन और ईयू लगतार संपर्क में हैं और बचे-खुचे मुद्दों को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। headtopics.com

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चीन और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बीच प्रस्तावित निवेश समझौते पर सहमति बनने के बावजूद इस पर दस्तखत का कार्यक्रम फिलहाल टल गया है। बताया जाता है कि अमेरिका ने इसमें शुरुआती पेच फंसाया है। उसके बाद फ्रांस और पोलैंड ने इसे वीटो करने का एलान कर दिया। जबकि पहले इस करार पर इसी हफ्ते दस्तखत होने की संभावना जताई गई थी।

विज्ञापनकरार की शर्तों को अंतिम रूप देने के लिए ईयू के व्यापार वार्ताकार वाल्दिस दोमब्रोवस्किस और चीन के व्यापार वार्ताकार लिउ ही की बैठक भी तय हो गई थी, लेकिन ये बैठक टाल देनी पड़ी। पहले खबर आई कि ब्रेक अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन की टीम ने लगाया है।

बाइडन के मनोनीत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवान ने संदेश भेजा कि अगला अमेरिकी प्रशासन अपने यूरोपीय पार्टनर्स के साथ आर्थिक मसलों पर चीन को लेकर मौजूद साझा चिंताओं पर जल्द से जल्द विचार-विमर्श करना चाहता है। ये आशंका पहले से जताई जा रही थी कि अगर ईयू ने अलग से समझौता कर लिया तो यह कदम चीन के मामले में यूरोप के साथ मिलकर साझा रणनीति बनाने की निर्वाचित राष्ट्रपति बाइडन की इच्छा के खिलाफ होगा।

इन खबरों के बाद फ्रांस ने साफ एलान कर दिया कि वह चीन के साथ होने वाले निवेश समझौते का समर्थन नहीं करेगा। फ्रांस के व्यापार उप मंत्री फ्रैंक रीस्टर ने पेरिस के अखबार ला मोंड से कहा- अगर जबरिया मजदूरी खत्म करने की दिशा में हम नहीं बढ़ सकते तो फ्रांस को चीन में निवेश सुविधा प्राप्त करने में कोई रुचि नहीं है। headtopics.com

रीस्टर ने कहा कि व्यापार समझौतों का उपयोग सामाजिक मुद्दों पर प्रगति के लिए करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस समझौते पर सहमति बनी है, उससे चीन के बाजार तक ज्यादा पहुंच तो बनेगी, लेकिन उससे यूरोपीय निवेश को सुरक्षा नहीं मिलेगी। रीस्टर ने कहा कि चीन में अचानक राष्ट्रीयकरण की संभावना से यूरोपीय कंपनियों को सुरक्षा देना बहुत अहम है। रीस्टर ने दावा किया कि बेल्जियम, लग्जमबर्ग और नीदरलैंड्स भी इस मामले में फ्रांस के रुख के साथ हैं।

उधर पोलैंड ने गुरुवार को ईयू से अनुरोध किया कि वह चीन के साथ समझौता करने में जल्दबाजी ना करे। उसने कहा कि उसे अमेरिका से सहयोग करते हुए इस दिशा में बढ़ाना चाहिए। वेबसाइट पोलिटिको.ईयू के मुताबिक उससे बातचीत में ईयू एक राजनयिक ने यह स्वीकार किया कि ईयू-चीन समझौते के मुद्दे पर ईयू को कई सदस्य देशों के विरोध का सामना करना पड़ा है। विरोध की वजह मुख्य रूप से चीन में निवेश संरक्षण के प्रावधान का कथित रूप से कमजोर होना और इसमें जबरिया श्रम रोकने की शर्त शामिल ना होना है।

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अब तक चीन या ईयू दोनों में से किसी ने ये जानकारी नहीं दी है कि दोनों पक्षों के बीच अगली वार्ता कब होगी। इस बारे में मीडिया के सवालों पर दोनों जगहों से सिर्फ यह कहा गया कि चीन और ईयू लगतार संपर्क में हैं और बचे-खुचे मुद्दों को हल करने की कोशिश कर रहे हैं।

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West Bengal में ध्रुवीकरण से किसे होगा फायदा, चुनाव में क्या हिंदु-मुस्लिम पर जंग? देखें श्वेतपत्र

पश्चिम बंगाल का चुनाव क्या है? ये समझ लीजिए कि इतिहास करवट ले रहा है. अब से 75 साल पहले, यानि 1946 में बंगाल की ज़मीन संप्रदाय के नाम पर डायरेक्ट एक्शन की तलवार से बंटी थी. उस बंटवारे के ठीक 75 साल बाद पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव इसकी सियासी जमीन में गहरी लकीरें खींचते दिख रहे हैं. क्यों और कितना जरूरी है ‘हम’ यानि हिंदू मुस्लिम फैक्टर पश्चिम बंगाल की राजनीति में और क्या इसका असर चुनावों पर पड़ेगा? 2011 की जनगणना ने पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी 27 प्रतिशत दर्ज की थी. कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या के हिसाब से पश्चिम बंगाल देश में चौथे नंबर पर है. लेकिन पहले तीन राज्य लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर और असम की कुल मुस्लिम आबादी को जोड़ भी दिया जाए तब भी पश्चिम बंगाल के 2 करोड़ 46 लाख मुसलमान उन राज्यों से 50 लाख ज्यादा बैठते हैं. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल की सियासत में ये वोट हमेशा अहम रहे हैं. देखें श्वेतपत्र, श्वेता सिंह के साथ.