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Modi Government, Agenda Of New Govt

क्या इस बार मोदी सरकार नेता प्रतिपक्ष को मान्यता देगी?

भारतीय संसद की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का न होना कोई असाधारण बात नहीं है (@prasannamohanty)

8.6.2019

भारतीय संसद की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का न होना कोई असाधारण बात नहीं है (prasannamohanty)

भारतीय संसद की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का न होना कोई असाधारण बात नहीं है. 1969 में पहली बार नेता प्रतिपक्ष पद पर किसी नेता को मान्यता दी गई. इसके बाद पांचवीं (1971-77), सातवीं (1980-84) और आठवीं (1984-89) लोकसभा के दौरान यह पद खाली ही रहा.

निर्देश 121(1)(c) कहता है कि संसदीय दल की मान्यता देने के लिए कम से कम निर्धारित कोरम पूरा होना चाहिए जो कि सदन के कुल सदस्यों का 10 फीसदी होता है. इन निर्देशों में नेता प्रतिपक्ष का कोई जिक्र नहीं है, जबकि यह संसदीय दल या समूह की मान्यता देने की बात करता है.

रोहतगी का दूसरा तर्क था कि नेता प्रतिपक्ष की मान्यता 'सेलरी एंड एलाउंसेज ऑफ लीडर ऑफ अपोजीशन इन पार्लियामेंट एक्ट, 1977' के दायरे में नहीं आती है, जबकि नेता प्रतिपक्ष के लिए जो भी नाम सामने आता है, 'सेलरी एंड एलाउंसेज आफ लीडर आफ अपोजीशन इन पार्लियामेंट एक्ट, 1977' उसे संवैधानिक मान्यता देता है और यह पहली बार था जब नेता प्रतिपक्ष पद को कानूनी तौर पर व्याख्यायित किया गया.

हालांकि, 1984-1990 के बीच लोकसभा के महासचिव रहे सुभाष कश्यप 1956 के स्पीकर के निर्देश को प्राथमिकता देते हैं. वे कहते हैं कि 1977 का एक्ट या कोई दूसरा कानून यह नहीं कहता है कि स्पीकर का निर्देश अवैधानिक है, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि स्पीकर को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता देनी चाहिए, क्योंकि यह एक जिम्मेदारी का पद है और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि मजबूत सरकार के खिलाफ एक स्थायी विपक्ष भी हो.

यह मायने नहीं रखता कि कानूनी बहस कौन जीत रहा है. संसद में प्रभावी विपक्ष के लिए नेता प्रतिपक्ष की अपनी महत्ता है. इसके अलावा सीवीसी, सीबीआई, सीआईसी, लोकपाल जैसी जवाबदेह संस्थाओं की नियुक्तियों में निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए भी नेता प्रतिपक्ष का होना बेहद जरूरी है. न ही इसे बढ़ा चढ़ाकर देखना चाहिए और न ही इसे कमतर देखना चाहिए. यह महत्व नहीं रखता कि कानून में कितना झोल या कितनी अस्पष्टता है, जैसा कि रोहतगी ने पेश की थी. पीडीटी आचार्य वेस्टमिंस्टर मॉडल का हवाला देते हैं जिसका भारत अनुसरण कर रहा है. इसमें विपक्ष अपनी स्वतंत्र सत्ता होती है और नेता प्रतिपक्ष को 'प्रधानमंत्री की प्रतिछाया' कहा जाता है जो कि सरकार गिरने की हालत में चार्ज लेने के लिए तैयार रहता है. इसके अलावा सदन में नीतियां बनाने और विधायी कार्यों में नेता प्रतिपक्ष का काम विपक्ष को एकजुट करना और प्रभावी बनाए रखने का होता है. वे कहते हैं कि नेता प्रतिपक्ष को मान्यता देने के लिए अब संसद से पास किया गया कानून मौजूद है, इसे लागू किया जाना चाहिए.

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prasannamohanty 1947 से1977 तक लगातार नेता प्रतिपक्ष नहीं था।1977 में पहली बार नेता प्रतिपक्ष बना। इसके बाद भी लगातार नहीं बना। भारतीय संसद में अजूबा नहीं। prasannamohanty जिधर भी देखो जल्लाद बैठे हैं सम्भाल कर रखो अपनी फूल सी औलाद को क्योंकि हुकूमत के लोग बेऔलाद बैठे हैं!! 😢😢 prasannamohanty Congress ki rajniti jo ish samay hai wah samapt ho rahe hain. Unko neta pratipakch ka pad dena kadapi uchit nahi hoga jo aapne desh ke PM ko chor bata kar poore desh aur videsh me bharat ka seer nicha kar diya. Rahul neta banane layak hi nahi hai to neta pratipakch to kabhi nahi.

prasannamohanty Ethics and BJP prasannamohanty हिटलर के शासन काल में भी नहीं था नेता प्रतिपक्ष? prasannamohanty फिर मन मर्जी prasannamohanty Dono kaam modi Ji hi kar lege prasannamohanty हां लेकिन इसके दूरगामी दुष्प्रभाव होंगे... prasannamohanty Opposition dont deserve post of opposition leader.bcz people of india rejected them. Who is narendramodi to give them that post.

prasannamohanty Vipakchh ka na hona achhi baat nhi sarkar koi glt kadam uthaye agar to bolne wala koi n hoga bjp me bhi sabhi to modiji jese imandar nhi h n prasannamohanty Zaroorat nahi h

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