कोरोना वायरस ने भारतीय राजनीति को कितना बदला है?

कोरोना वायरस ने भारतीय राजनीति को कितना बदला है?

27-05-2020 18:46:00

कोरोना वायरस ने भारतीय राजनीति को कितना बदला है?

यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसी महामारी से भारतीय राजनीति प्रभावित हुई है लेकिन मौजूदा समय में क्या कुछ बदलाव आए हैं.

शेयर पैनल को बंद करेंकोरोना वायरस संक्रमण से पूरी दुनिया प्रभावित हुई है और इसके प्रभाव से राजनीति भी अछूती नहीं है.भारतीय राजनीति पर भी इसका असर साफ़ नज़र आता है. हालांकि यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब किसी महामारी से भारतीय राजनीति प्रभावित हुई है.संक्रमण की हालत जानने के लिए ज़िले का नाम अंग्रेज़ी में लिखें

कोरोना वायरस: रूस का दावा, उसने कोरोना की वैक्सीन का सफल परीक्षण किया - BBC Hindi सचिन पायलट के साथ माने जा रहे तीन विधायकों का U-टर्न, कहा- 'हम कांग्रेस के सच्चे सिपाही' दिल्ली दंगों से लेकर चीन तक हर मर्ज़ की दवा क्यों हैं अजीत डोभाल?

साल 1918 में स्पैनिश फ़्लू के दौरान भारत को ब्रिटेन की कॉलोनी बने तकरीबन एक सदी बीत चुकी थी. भारत में स्पेनिश फ़्लू उसी साल मई में आया. भारत में इसकी चोट ब्रिटिश नागरिकों से ज्यादा भारतीय आबादी पर पड़ी थी. आंकड़े बताते हैं कि हिंदुओं में अनुसूचित जातियों की मृत्यु दर हर 1,000 लोगों पर 61.6 के स्तर पर पहुंच गई थी जबकि यूरोपीय लोगों के लिए यह प्रति हजार 9 से भी कम थी.

इसके बाद भारतीयों के मन में यह बात गहरे तक बैठ गई थी कि ब्रिटिश शासकों ने इस संकट के दौरान कुप्रबंधन का परिचय दिया है. ठीक इसी प्रकार मौजूदा समय में भी परंपरागत भारतीय राजनीति से इतर कई नई चीज़ें और प्रयोग देखने को मिल रहे हैं.कुछ प्रमुख बदलावGetty Images

संकट को अवसर में बदलने का मौकाप्रधानमंत्री नरेंद्र ने अपने कई संबोधनों में 'संकट को अवसर' में बदलने की बात कही है और ये महामारी केंद्र के लिए और मोदी प्रशााासन के लिए वाकई किसी अवसर से कम नहीं है.भारत ने दुनिया के कई देशों की तुलना में अपने यहां कोविड19 के प्रसार को नियंत्रित किया है और अगर आने वाले वक़्त में सरकार इसे क़ाबू में रखने में कामयाब होती है तो यह वैश्विक स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी.

हालांकि सरकार के लॉकडाउन के फ़ैसले पर लोगों की राय काफी बंटी हुई है. एक ओर जहां सरकार इसे साहसी क़दम बताती है वहीं एक बड़ा वर्ग मानता है कि पहले लॉकडाउन की घोषणा के पहले लोगों को कुछ वक़्त दिया जाना चाहिए था.सरकार इस मोर्चे पर सफल रही या नहीं ये कहना जल्दबाज़ी होगी लेकिन यह ज़रूर है कि इस दौरान नरेंद्र मोदी का क़द पहले से बढ़ा ज़रूर है.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक स्मिता गुप्ता कहती हैं"जनवरी महीने तक देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे थे. नागरिकत संशोधन क़ानून को लेकर लोग आवाज़ उठा रहे थे. भले ही कोई राजनीतिक दल खुलकर इनके साथ नहीं खड़ा हो रहा था लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर ही राजनीतिक गतिविधि चल रही थी. लेकिन लॉकडाउन और कोरोना वायरस की वजह से इन प्रदर्शनों पर एक तरह से विराम लग गया."

इमेज कॉपीरइटPTIवो आगे कहती हैं,"दूसरी बात यह हुई कि लॉकडाउन की वजह से इस बात की संभावना भी नहीं रही कि कोई राजनीतिक दल धरना या प्रदर्शन करे. कोई रैली नहीं कर सकता है. ये बात बीजेपी और केंद्र सरकार पर भी लागू होती है लेकिन प्रधानमंत्री जब भी चाहते हैं राष्ट्रीय चैनल और रेडियो के माध्यम से अपनी बात देशवासियों तक पहुंचा लेते हैं. वो जब चाहे तब लोगों को संबोधित कर सकते हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री की बात तो लोगों तक पहुंच ही रही है."

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वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि कोविड 19 के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी एक नई चीज़ ज़रूर हुई है.वो कहती हैं,"प्रधानमंत्री का राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से मिलना वो भी पांच बार, घंटों-घंटों के लिए, नयी बात है. उन्होंने कहा कि स्टेट्स फ्रंटलाइन वॉरियर्स हैं. तो सही मायने में ये नयी बात है. वरना तीन महीने पहले हम और आप शायद ये सोच भी नहीं सकते थे कि मोदी जो केंद्र में दूसरी बार चुनकर आए हैं ऐसा करेंगे..हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे."

लेकिन नीरजा विकेंद्रीकरण के उलट केंद्रीकरण की बात भी करती हैं.वो कहती हैं,"यह बात ग़ौर करने वाली है कि केंद्र में प्रधानमंत्री और उनका कार्यालय काफी मज़बूत हुआ है. कहीं भी राजनेताओं की भूमिका नहीं दिखती है. यह सही है कि तमाम मीटिंग्स में हर्षवर्धन, राजनाथ सिंह और अमित शाह बैठे रहते हैं लेकिन आमतौर पर पॉलीटिकल क्लास एकदम बाहर हो गया है. अब सबकुछ पीएम और पीएमओ तक ही सिमट कर रह गया है."

नीरजा कहती हैं कि केंद्र में तो यह मॉडल पहले से ही था लेकिन अब राज्यों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति दिख रही है.वो कहती हैं,"राज्यों में भी सीएम और सीएमओ ही सबकुछ हो गया है. विधायकों का रोल कहीं भी दिख ही नहीं रहा है."नीरजा कहती हैं जो मोदी मॉडल सेंटर में था अब वो स्टेट्स में भी लागू होता दिख रहा है.

इमेज कॉपीरइटFBविपक्ष कमज़ोर नज़र आता है.... देशहित में या मजबूरी में!कोविड19 केवल मोदी और मोदी सरकार के लिए अवसर नहीं है. विपक्ष के लिए भी है लेकिन कई जगहों पर जहां विपक्ष ने एक गंभीर और सहयोगात्मक विपक्ष होने का प्रमाण दिया है वहीं कई बार विपक्ष कमज़ोर भी नज़र आता है.

महामारी के शुरू होने के बाद से जिन भी विपक्षी दलों की तरफ़ से बयान आए है सबने 'आपसी सहयोग से महामारी से निपटने' की बात ही की है. सभी राजनीतिक दल इसे एक राष्ट्रीय आपदा के तौर पर देख रहे हैं.लेकिन क्या विपक्ष और ज़िम्मेदारी के साथ सामने आ सकता था?

इस सवाल के जवाब में स्मिता गुप्ता कहती हैं"कांग्रेस पार्टी एक लंबे समय से संकट से जूझ रही है. राहुल गांधी पिछले साल ही अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं और सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी का नेतृत्व कर रही हैं. ऐसे में पार्टी ख़ुद में असमंजस की स्थिति में है. पार्टी अनिश्चितता से जूझ रही है."

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अगर यह स्थिति ना होती तो संभव है कि और बेहतर तरीक़े से चीज़ें सामने आतीं.स्मिता कहती हैं,"जो लोग बीजेपी को पसंद नहीं भी करते हैं वो भी मानते हैं कि यह एक नेशनल क्राइसेस है. तो ऐसे में विपक्ष के दल भी बहुत आक्रोशित होकर सामने नहीं आ रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि इस समय सबको साथ मिलकर इस महामारी से लड़ना चाहिए."

स्मिता कहती हैं"विपक्ष खुलकर नहीं दिख रहा उसका एक बड़ा कारण है कि उनके पास प्लेटफॉर्म ही नहीं है. डिजीटल प्लेटफ़ॉर्म हैं लेकिन क्या उनकी पहुंच उस स्तर की है...?"हालांकि स्मिता कांग्रेस के सरकार और उसकी नीतियों पर उठाए गए सवालों को कोशिश तो मानती हैं लेकिन यह ज़रूर कहती हैं कि विपक्ष खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहा है क्योंकि बाधाएं हैं.

स्मिता कहती हैं"ये सही है कि विपक्ष के पास रैली..धरना देने और अपनी बात पहुंचाने क विकल्प नहीं है लेकिन विपक्ष को चाहिे कि जिन राज्यों में उनकी सरकार है वहां वो बेहतर काम करें. क्योंकि अगर वो अपने यहां परिस्थितियों को संभालने में कामयब होते हैं तो उन्हें और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."

इस विषय पर नीरजा मानती हैं कि एक बड़ी दुविधा विचारों के लिहाज़ से भी है. वो कहती हैं"अगर इस समय में विरोध करेंगे तो लोग कहेंगे कि ऐसे समय में क्या ज़रूरत?"संसद के बंद होने को भी नीरजा एक बड़ा कारण मानती हैं.भारतीय राजनीति का भविष्यनीरजा कहती हैं कि अभी बात हो रही है ऑनलाइन वोटिंग की.

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सरकार फेल और विपक्ष पास Ab public sb fresh maal chunegi, Umeed krta hun , kuch ek aad ko chod ke Nothing more than a whisper अब मास्क के पीछे बोलना पडता है।😀😀 Realiz that none of our politicians are able to handle the situation. Because every Indian are 'Atmanirbhar' and that's why Indian can manage everything in any worst conditions.

Modi h to mumkin h Ek desh ka neta Haatha jod kar desh wasiyo se vinti karta hai aur ek desh ke logo ko gumrah karta hai ....1000 bas ke name pe auto bhejta hai chalte rahagiro ki madad nai kar sakte to kaam se kaam unka time west to nai karte ..... फ़िलहाल राजनीति गलियों में भ्रस्टाचार के लिये कुछ मौका नहीं. खामोशिया है. कोरोना ने यह साबित किया की हमारे हमारे नेता आज तक सिर्फ देश को लूटने का कम किया है. जब तक सरकार शराब नहीं बेचती तब तक आय नहीं होती. देश को लूट कर कंगाली के मोड़ पर ला खड़ा किया है. जय किसान

विश्व गुरु बनने का ख्वाब टूट गया, मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने वालों को अपनी औकात का अंदाजा हो गया। हाहा बीबीसी मतलब दलाल संघी पत्रकारिता ... Jai shri ram 2024 will speak Ghatiya aur ghatiya ho gye. Khaangressi Lockdown has exposed Modi بھارتی فوج کا سنی دیول اجے دیوگن سیف علی خان اور سلمان خان سے رابطہ جلد از جلد چائنہ کے خلاف ایک فلم بنا کر کترینہ کیف کو ہیروئین کاسٹ کر کے چائنہ کو منہ توڑ جواب دیا جائے

Evil designs of Anti nationals have surfaced. Aukat pata chal gyi 😜 कुछ नहीं बदला.. वही जातिवाद और हिन्दू मुस्लिम ही चल रहा और चलता ही रहेगा.. लोगों की मानशिकता यही है.. Corona ne asliyat saamne laakar rakh diyaa hai Dekhnaa Nahi dekhnaa Aapki aankh par hai , sun na Aapke kaan par hai Buss taali thaali ki awaaz naa goonj rahi ho aur patakhe ki roshni mein aankhe chundhiyayi naa hon

झूठ बोलकर अपने को सुपरमैन बताने वाले पुतीन आज कोरोना संक्रमण मे दूसरे नम्बर पर है ? बीबीसी के संघी पत्रकारो को शायद देश की सड़को पर लाखो भूखे प्यासे बेसहारा गरीब पूर्व भक्त हजारो किमी की पदयात्रा का इकलौता विश्व रिकॉर्ड बनाते और जान देते हुये नही दिखे? Bahut jaada badal Dia hai sab ke Sab dare huyen hain

Politics badla ya nahin Rahul Gandhi ki shakal zaroor badal gayi कोरोना ने कई राजनितिज्ञों के चेहरों से नकाब उतार दिये हैं।इन राजनीतिजज्ञों ने राजनीति और राष्ट्रीय एकता को दरकिनार कर राजनीति को सर्वोपरि मानाहै।अगर आज चीन या पाकिस्तान से युद्ध छिड़ जाए तो ये लोग, इनकी पार्टियां केंद्र सरकार कासाथ देने की बजाय राजनीति करेंगी

Now the ball is in the hands Of Rahul Gandhi...It now depends on him whether he can use the circumstances for his own benefit or not ... Nothing has changed in this pandemic, except the mentality of Congress party. All Indians are support to modi government and his administrations for their significant works.

भारतीय राजनीति नहीं बदल सकती है कोरोना को ही बदलना होगा और भारत छोड़कर जाना होगा जुमले बाज लोग हवाई यात्रा भूल गए 20साल_शिक्षामित्र_बेहाल बीजेपी का पर्दाफास हुआ, लेकिन भक्त का कोई इलाज नही हुआ Sab badal gaya he sab ko pata bhi chal gaya he ki ye ek jumla he or kuch nahi public ko gumrah karna unse paise leke unhi ko vyaj pe dena fund ke nam par paise lena or fir kya kiya uska hisab na dena sab politician ka bank account cheak karo property cheak karo patachle😒😠

80% Huge changes in Indian politics गुजरात_मॉडल_वेंटिलेटर_पर_है, मोदी' शाह और रुपाणी' ने अपने 'गुजरात' मॉडल का क्या मस्त 'जुगाड़' सोचा हैं बीमारी' में 'मौतों की तुलना इटली, स्पेन, और अमेरीका, से करते हैं क्या 'सिविल 'अस्पतालों' की तुलना विकास' अच्छे दिन 'पुलिस भ्रष्टाचार की तुलना 'पाकिस्तान' से करते है..?

Unhone Bharat ko badal Diya magar yahi Nahin badle Pura ka pura patallok dikhaya hai Use niche nahi ja sakte ye log Jay hind 🙏 जय श्री राम दोस्तो🙏🙏 इस वीडियो में मैंने बताया है कि चीन क्यो इतना बौखलाया हुआ जिसके कारण वो सीमा पर विवाद को बढ़ा रहा है। आप से गुजारिश है कि वीडियो को जरूर देखें और चैनल को भी जरूर सब्सक्राइब करे🙏🙏। IndiaChinaFaceOff

कोरोना: लॉकडाउन में छूट है लेकिन वायरस यहीं है, कैसे बचेंगे?लॉकडाउन-4 में सरकार की तरफ़ से पाबंदियों में कई तरह की छूट दी गई है. मगर लॉकडाउन में छूट का मतलब कोरोना वायरस से छूट नहीं है.

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