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कोरोना से अपनों की मौत के बाद ख़ुद को संभालने के लिए क्या करें?

19-06-2021 15:49:00

कोरोना से अपनों की मौत के बाद ख़ुद को संभालने के लिए क्या करें?

कोरोना से हज़ारों लोगों की असमय मौत के बाद उनके क़रीबी पीछे छूट गए हैं. अपनों को अचानक खोने का ग़म और बेबसी किसी को भी अंदर से खोखला कर सकती है. ऐसे में किसी सहारे की ज़रूरत होती है.

पुनीत अरोड़ा के पिताहरियाणा के रेवाड़ी में रहने वाले पुनीत अरोड़ा ने भी इसी साल मई में अपने पिता को खोया है.वो कहते हैं, "हमारे अपने तो रहे नहीं और अब हमें भी सरकार ने कीड़े-मकोड़ों की तरह छोड़ दिया है. कोई हमारा हाल पूछने वाला नहीं है."पुनीत कहते हैं कि उनके पास तो दुखी होने और ग़मी मनाने की 'सुविधा' भी नहीं है क्योंकि पिता की दवा के ख़र्च से बहुत कर्ज़ हो गया है और अब जैसे-तैसे उसे चुकाना है.

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वो कहते हैं, "सबकुछ अचानक ही हो गया. मैं अपना बिल्कुल भी ख़याल नहीं रख पा रहा हूँ. मैं बस किसी तरह काम-धंधा शुरू करके कर्ज़ा चुकाने की कोशिश कर रहा हूँ."ललित, गौतम और पुनीत तीनों की बातें सुनकर अच्छी तरह समझा जा सकता है कि इन सभी को मदद की ज़रूरत है. किसी ऐसे की ज़रूरत, जिसके सामने ये कम से कम जी भरकर रो सकें.

यह भी पढ़ें:घर में सँभल नहीं पाते, अस्पताल पहुंच नहीं पाते-मानसिक रोगी करें क्या?इमेज कैप्शन,यह लिस्ट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर बनाई गई है.ग्रीफ़ काउंसलिंग और ग्रीफ़ साइकोथेरेपीडॉक्टर नीतू राणाएक क्लीनिकल साइकॉलजिस्ट हैं और उन्हें 'ग्रीफ़ थेरेपी' और 'ग्रीफ़ काउंसलिंग' में विशेषज्ञता हासिल है. headtopics.com

वो बताती हैं कि किसी के करीबी के गुजरने के बाद उसकी मदद के लिए मेंटल हेल्थ प्रोफ़ेशनल्स दो तरह की प्रक्रिया अपनाते हैं:1)ग्रीफ़ काउंसलिंग2)ग्रीफ़ साइकोथेरेपीडॉक्टर नीतू के मुताबिक़ ग्रीफ़ काउंसलिंग तब की जाती है जब किसी के करीबी के मौत के छह महीने से कम वक़्त हुआ हो और उसे मदद की ज़रूरत हो.

ग्रीफ़ काउंसलिंग में कोई ख़ास तकनीक इस्तेमाल नहीं की जाती. इसमें काउंसलर सिर्फ़ सामने वाले की बात सुनता है. इसे 'इंपैथेटिक लिसनिंग' के नाम से जाना जाता है. इसमें काउंसलर लोगों को एक 'सेफ़ स्पेस' देते हैं जहाँ वो दिल खोलकर अपनी बात कह सकें.

डॉक्टर नीतू कहती हैं कि किसी प्रिय की मौत के बाद दुखी होना नॉर्मल है, ख़ासकर छह महीने तक.वो कहती हैं, "इस दौरान अपनों को खोने वाला शख़्स रोता है, परेशान होता है, उसे सपने आते हैं, नींद नहीं आती और भूख कम लगती है. ये सब नॉर्मल ग्रीविंग प्रोसेस का हिस्सा है."

लेकिन अगर छह महीने के बाद भी कोई व्यक्ति सामान्य होने की राह पर नहीं बढ़ पाता और लगातार 'ग्रीविंग पीरियड' में रहता है तो यह मामला क्लीनिकल बन जाता है. मनोविज्ञान की भाषा में इस अवस्था को 'कॉम्पिलकेटे ग्रीफ़' कहा जाता है और इसके लिए 'ग्रीफ़ साइकोथेरेपी' की ज़रूरत पड़ती है. headtopics.com

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इमेज स्रोत,Sonu Mehta/Hindustan Times via Getty Imagesडॉक्टर नीतू बताती हैं, "इस प्रक्रिया में हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि ग्रीफ़ का कौन सा हिस्सा है जिसे सामने वाला प्रोसेस नहीं कर पा रहा है और यह कई बातों पर निर्भर करता है."नीतू राणा इसे उदाहरण के ज़रिए समझाने की कोशिश करती हैं. वो कहती हैं, "मान लीजिए किसी की अचानक मौत हो गई. ऐसे में उसके करीबी मौत जैसी स्थिति के लिए मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं होते और उन्हें गहरा सदमा लगता है."

"या फिर ऐसी स्थिति, जिसमें इंसान किसी की मौत के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार ठहराने लगता है. जैसे- कई बार पेशेंट्स मुझसे कहते हैं कि सुबह मेरा उनसे झगड़ा हुआ था, शायद मैंने ज़्यादा बोल दिया इसलिए ऐसा हुआ. या शायद मैंने उन्हें सॉरी नहीं बोला इसलिए ऐसा हुआ..."

डॉक्टर नीतू कहती हैं कि कोरोना महामारी के दौरान ऐसे कई मामले आए हैं जिनमें लोग अपनों की मौत के लिए ख़ुद के फ़ैसलों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. जैसे- काश मैंने अस्पताल बदल दिया होता, ऑक्सीजन का जल्दी इंतज़ाम कर लिया होता या मेरी वजह से वो भी पॉज़िटिव हो गए.

यानी जब किसी गुज़रने वाले से उसके करीबियों के कई 'अनरिज़ॉल्व्ड मुद्दे' होते हैं वहाँ ग्रीफ़ थेरेपी की ज़रूरत होती है.डॉक्टर नीतू बताती हैं, "कई बार लोग अपनों को खोने के बात इस तरह की बातें सोचते हैं- अभी आप मुझे छोड़कर कैसे जा सकते हैं? अभी तो हमें इतनी बातें करनी थीं या साथ में इतना वक़्त बिताना था. मुझे अपने साथ लेकर क्यों नहीं गए? वगैरह-वगैरह." headtopics.com

ऐसी स्थिति में साइकॉलजिस्ट लोगों से बात करके उन मुद्दों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जहाँ वो अटक गए हैं. ऐसे मामलों में साइकोथेरेपी के लिए कई तरह की तकनीक अपनाई जाती है. मसलन- एंप्टी चेयर टेकनीक और लेटर टेकनीक.इमेज कैप्शन,यह लिस्ट मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर बनाई गई है.

कैसे काम करती है ग्रीफ़ साइकोथेरेपी?एंप्टी चेयर टेकनीक में पीड़ित व्यक्ति को एक खाली कुर्सी के सामने बैठा दिया जाता है और कल्पना करने को कहा जाता है कि गुज़र चुका व्यक्ति उसके सामने है. फिर लोगों से कहा जाता कि उनके पास अपने प्रियजनों से आख़िरी बार बात करने का मौक़ा है, वो जो चाहें, कह सकते हैं.

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ऐसे ही लेटर तकनीक में लोगों से गुज़र गए लोगों को आख़िरी चिट्ठी लिखने को कहा जाता है.डॉक्टर नीतू बताती हैं, "जब एंप्टी चेयर और लेटर तकनीक बार-बार दोहराई जाती है तब धीरे-धीरे लोगों के मन की सारी बात निकल जाती है और उनकी हालत में सुधार होने लगता है."

साइकोथेरेपी में अनसुलझी भावनाओं को प्रोसेस करने के लिए एक और तकनीक अपनाई जाती है. इसके लिए लोगों से गुज़र गए लोगों की तस्वीरें, कपड़े और अन्य चीज़ें लाने को कहा जाता है. उनसे गुज़र गए शख़्स के बारे में बात करने को कहा जाता है. उनसे जुड़ी अच्छी और बुरी यादों की चर्चा की जाती है. उनकी तस्वीरों और कपड़ों को छूने, चूमने और गले लगाकर रोने का मौका दिया जाता है.

डॉक्टर नीतू के मुताबिक़ इस प्रक्रिया में पीड़ित व्यक्ति की अनसुलझी भावनाएं काफ़ी हद तक सुलझ जाती हैं, उसकी शिकायतें कम हो जाती हैं और वो सच्चाई को स्वीकार करने की मानसिक स्थिति में आ जाता है.इमेज स्रोत,MONEY SHARMA/AFP via Getty Imagesमहामारी के बाद और ज़्यादा बढ़ सकती हैं परेशानियाँ

डॉक्टर नीतू के मुताबिक़ कोरोना से जुड़े मामलों में परेशानी यह है कि लोगों को अपने प्रियजनों को अंतिम बार गले लगाने का मौका भी नहीं मिल रहा है.वो बताती हैं, "मेरे पास आने वाले लोगों के मन में यह पछतावा रहता है कि उनके अपने आख़िरी वक़्त तक अकेले रहे और अकेले ही इस दुनिया से चले गए. लोग चाहकर भी अपने करीबियों के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पा रहे हैं. ये सब लोगों को लंबे वक़्त तक परेशान कर रहा है."

डॉक्टर नीतू राणा का मानना है कि महामारी के दौर में लोग ठीक से अपनों के जाने का शोक भी नहीं मना पा रहे हैं.वो कहती हैं, "लोग अभी सदमे में हैं. उनका असली ग्रीविंग प्रोसेस तो अभी शुरू ही नहीं हुआ है. वो अभी ख़ुद को बचाने में, बच्चों को बचाने में और परिवार के अन्य सदस्यों को बचाने में लगे हैं. बहुत से लोगों की नौकरियाँ चली गई हैं, कइयों पर इलाज की वजह से कर्ज़ हो गया है. ऐसे में वो अभी सर्वाइवल मोड में हैं और ठीक से दुखी भी नहीं हो पा रहे हैं."

डॉक्टर नीतू कहती हैं, "मुझे डर है कि जब यह महामारी ख़त्म होगी, दुनिया खुलेगी और सबकुछ सामान्य होगा तब लोगों को अपनों के न होने के अहसास अचानक से बढ़ जाएगा. तब कॉम्प्लिकेटेड ग्रीफ़ और अनरिज़ॉव्ल्ड इमोशंस और तेज़ी से उभर कर सामने आएंगे. मुझे लगता है कि तब लोगों को मानसिक तौर पर और ज़्यादा मदद की ज़ररूत पड़ेगी."

यह भी पढ़ें:सर्वाइवर्स गिल्ट: ज़िंदा बचे रहने का पछतावाअमिता मानीबैंगलोर में बतौर थेरेपिस्ट काम करती हैं और कोरोना की दूसरी लहर के दौरान दिनों उनके पास ग्रीफ़ काउंसलिंग के लिए आने वालों की संख्या काफ़ी बढ़ी है.वो कहती हैं, "ग्रीफ़ काउंसलिंग या ग्रीफ़ थेरेपी का चलन नया नहीं है. ये अलग बात है कि इस बारे में जागरूकता की कमी रही है."

अमिता मानी के मुताबिक़ ग्रीफ़ थेरेपी अकेले शख़्स की भी होती है और ग्रुप में भी. वो कहती हैं, "शुरुआत में हम लोगों को अकेले काउंसलिंग देते हैं और फिर धीरे-धीरे उन्हें ग्रुप थेरेपी में आने के लिए कहते हैं. ग्रुप थेरेपी एक ऐसे सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करती है, जहाँ आप जैसा दुख झेलने वाले और आपको समझने वाले बहुत से लोग हैं."

अमिता मानी कहती हैं कि जब इंसान अपने जैसे कई लोगों को देखता है तो उसे अहसास होता है कि शायद उसका दुख दुनिया में सबसे बड़ा नहीं है.वो बताती हैं, "ग्रुप थेरेपी में लोग एक-दूसरे का सहारा बनते हैं और एक-दूसरे की दुख से उबरने में मदद करते हैं."अमिता कहती हैं कि महामारी के दौरान अपनों को खोने वालों में जो सबसे बड़ी परेशानी देखने को मिल रहा है, वो है- सर्वाइवर्स गिल्ट.

सर्वाइवर्स गिल्ट को आसान शब्दों में समझाएं तो यह एक ऐसी अवस्था है जब किसी वजह से बड़ी संख्या में लोग जान गँवा बैठते हैं और ज़िंदा बच गए लोगों के मन में एक तरह की ग्लानि की भावना भर जाती है.लोग सोचने लगते हैं कि वो ज़िंदा कैसे और क्यों बच गए, उन्हें भी मर जाना जाना चाहिए था.

अमिता बताती हैं, "इन दिनों हमारे सामने सबसे बड़ा काम लोगों को सर्वाइवर्स गिल्ट से बाहर निकालना है. ये इसलिए भी ज़रूरी है कि अगर उनके मन की सभी भावनाएं खुलकर बाहर नहीं आएंगी तो इससे आगे चलकर पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) गंभीर मानसिक परेशानियाँ हो सकती हैं."

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प्रतिमा को समाज के आर्थिक-समामजिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों के साथ काम करने का अनुभव भी है.उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "सबके लिए ग्रीफ़ (दुख) एक जैसा नहीं होता. देश के एक बड़े तबके की तो ज़िंदगी ही दुख से भरी हुई है. महामारी में हमें ऐसे लोगों का ख़ास ख़याल रखना होगा."

वो कहती हैं, "देश में लोग पहले ही ग़रीबी, बेरोज़गारी, बीमारियों, तरह-तरह की हिंसा और भेदभाव से जूझ रहे हैं. अब महामारी में अपनों की मौत उन पर पहाड़ बनकर टूटी है. ऐसी स्थिति में उन्हें न सिर्फ़ काउंसलिंग या थेरेपी बल्कि दूसरे तरह के सपोर्ट की ज़रूरत भी है. मसलन, आर्थिक और सामाजिक सहयोग."

इस पूरी प्रक्रिया में प्रतिमा एक और महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाती हैं.वो कहती हैं, "कोरोना महामारी जैसी भयावह स्थिति में लोगों की परेशानियाँ अकेले सायकाइट्रिस्ट या साइकॉलजिस्ट नहीं संभाल सकते. उन्हें सायकाइट्रिक सोशल वर्कर्स की ज़रूरत है और इसके लिए सामुदायिक स्तर पर काम होना चाहिए."

प्रतिमा कहती हैं कि सायकाइट्रिक सोशल वर्कर्स जिस तरह देश के सुदूर हिस्सों में जाकर अलग-अलग वर्ग के लोगों की मदद कर सकते हैं, मौजूदा हालात में वो साइकॉलजिस्ट और थेरेपिस्ट के लिए मुमकिन नहीं है.प्रतिमा देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की कमी, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और लोगों की आर्थिक-सामाजिक मजबूरियों की याद भी दिलाती हैं.

वो कहती हैं, "दुख की बात यह है कि हमारे देश में सबके पास दुख मनाने की 'लग्ज़री' भी नहीं है."प्रतिमा की बातें सुनकर हिंदी के मशहूर लेखक यशपाल की कहानी 'दुख का अधिकार' की याद आती है, जिसमें लेखक कहता है कि 'शोक करने, ग़म मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और- दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है.'

ये भी पढ़ें-मोदी की नई वैक्सीन नीति पर बोली कांग्रेस- देर आए, पर दुरुस्त नहीं आएअपनों को खोने वाले की मदद कैसे करें?इन सबके बीच यह ज़रूरी है जिन लोगों ने अपनों को खोया है, उन्हें अकेला न छोड़ा जाए. डॉक्टर नीतू राणा और अमिता मानी ने लोगों की मदद के लिए कुछ सुझाव दिए, जो इस तरह हैं:

1) लोगों को उनका स्पेस दीजिए. अगर वो शांत हैं और बात नहीं करना चाहते तो बार-बार उन्हें तंग न करें लेकिन उन्हें ये भी जता दें कि जब वो बात करने की स्थिति में होंगे, आप हमेशा उनके लिए उपलब्ध हैं.2) लोगों को रोने से मत करिए. उन्हें गुज़र गए लोगों की यादों में रहने का वक़्त दीजिए. उनसे 'मज़बूत बनने'और 'ज़िंदगी में आगे बढ़ने' की सलाह मत दीजिए क्योंकि वक़्त के साथ वो अपने आप मूव ऑन करेंगे.

3) उन्हें यह अहसास दिलाइए कि उनका दुख, उनकी भावनाएं और उनकी तकलीफ़ पूरी तरह वाज़िब है और आप हर स्थिति में उनके साथ खड़े हैं.4) ज़रूरी नहीं है कि आप उनसे कुछ बोलें, बात करें या समझाएं ही. आप चुपचाप उनके पास बैठ सकते हैं, उनके सिर पर हाथ फेर सकते हैं और उन्हें गले लगा सकते हैं. इससे भी उन्हें भावनात्मक संबल मिलेगा.

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