किसान आंदोलनः सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या सरकार के काम में दख़ल है - BBC News हिंदी

किसान आंदोलनः सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या सरकार के काम में दख़ल है

14-01-2021 06:01:00

किसान आंदोलनः सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या सरकार के काम में दख़ल है

कृषि क़ानूनों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या अदालत ने विधायिका और न्यापालिका के बीच की सीमा को लांघा है? क्या कहते हैं जानकार?

समाप्तपूर्व सॉलिसिटर जनरल ऑफ़ इंडिया मोहन परासरन कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट संसद के बनाए गए क़ानून को चुनौती देना चाह रहा है, ऐसे मामलों में कोर्ट संवैधानिक वैधता को देखता है कि एक क़ानून क्या नियमों के मुताबिक़ बना है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट क़ानूनों को रद्द कर सकता है अगर वह कोर्ट की संविधान के व्याख्या के मुताबिक़ सही नहीं है तो."

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वो आगे कहते हैं, ''दूसरी बात ये कि जब संवैधानिक चैलेंज होता है, तो वो पब्लिक लॉ यानी जन-क़ानून के अंतर्गत आता है. लेकिन ऐसे में मध्यस्थता नहीं हो सकती, यहां लोगों के अधिकारों की बात होती है, इसमें मध्यस्थता कैसे हो सकती है? इस मामले में मान लेते हैं कि मध्यस्थता होती भी है तो इसमें सभी पार्टियों की सहमति होनी चाहिए जो कि कोर्ट के पास नहीं है.''

इमेज स्रोत,Reutersकोर्ट ने चार सदस्यों वाली एक कमेटी बनाई है जिसमें भूपिंदर सिंह मान, प्रमोद कुमार जोशी, अशोक गुलाटी और अनिल घनवत शामिल हैं. इन चारों सदस्यों ने लेख और बयानों के ज़रिए सरकार के नए कृषि क़ानूनों को खुलकर समर्थन दिया है. ऐसे में जैसे ही कोर्ट ने इस नामों का ऐलान किया तो लोगों ने इन सदस्यों के चुनाव पर सवाल उठाएं . headtopics.com

परासरन इस कमेटी के एकतरफ़ा मत रखने को लेकर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ''एक कमेटी बनाई गई, जिसमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस क़ानून का खुल कर समर्थन किया है. क्या वो लोग निष्पक्ष आकलन कर पाएंगे? ये बड़ा सवाल है.''वो आगे कहते हैं, ''इस क़ानून को सरकार ने संसद ने पास किया है. कोर्ट के पास ये अधिकार है कि वह तय करे कि क़ानून संवैधानिक है या नहीं. इसके लिए कमेटी बनाना एक पैरेलल (समानांतर) कमेटी बनाने जैसा है. जैसे कि संसदीय समिति, जो ये देखती है कि क़ानून लोगों के लिए सही है या नहीं. लेकिन ये काम सुप्रीम कोर्ट का नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश बेहद असामान्य है मेरी समझ के अनुसार आमतौर पर कोर्ट ऐसा नहीं करता. क़ानून से प्रभावित होने वाली पार्टिंयां भी इससे ख़ुश नहीं हैं. मुझे लगता है ये आग में घी डालने जैसा फ़ैसला है.''

'एक्सेस ज्यूडिशिल ऐक्टिविज़म'इमेज स्रोत,Getty Imagesपरासरन इस आदेश को एक्सेस ज्यूडिशिल ऐक्टिविज़्म बताते हैं.वह कहते हैं, ''यह संसदीय फ़ैसलों में घुसने की कोशिश है और यही कारण है कि कई लोग कह रहे हैं कि कोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़ा है. सुप्रीम कोर्ट पहले दिन से प्रदर्शन ख़त्म करना चाहता है. वो सरकार के क़दम से भी नाराज़ है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो संसद के कार्यक्षेत्र में दख़ल दे.''

लेकिन क़ानून के जाने-माने जानकार प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा की राय इस मामले में मोहन परासरन से अलग है.फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने हालात को देखते हुए इस मामले को सुलझाने की कोशिश की है और तकनीकियों का हवाला देकर इसे तूल नहीं दिया जाना चाहिए.

फ़ैजान मुस्तफ़ा ने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में साफ़ कहा था कि हम इस वक़्त संवैधानिकता की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि हम चाहते हैं कि इस मुद्दे का हल निकल सके. तो कोर्ट ने उस दिशा में काम किया, हां तकनीकी तौर पर देखें तो ये साफ़ है कि क़ानून अच्छा है या नहीं? ये एक राजनीतिक मुद्दा है और कोर्ट के लिए ये मुद्दा नहीं होता.'' headtopics.com

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विधायिका के काम में दख़ल का आरोपइमेज स्रोत,PANKAJ NANGIA/ANADOLU AGENCY VIA GETTY IMAGESक्या कोर्ट का आदेश प्रथम दृष्टया में विधायिका और न्यापालिका के बीच शक्ति के बंटवारे और उसके तालमेल में दख़ल नहीं माना जाना चाहिए?इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा बताते हैं कि ''इससे जुड़ा एक सिद्धांत है जिसे पॉलिटिकल थिकेट सिद्धांत कहा जाता है. इस में कहा गया है कि कोर्ट नीतियों से जुड़े मामलों में दख़ल नहीं करता.''

लेकिन इसके साथ ही वह इस अंतरिम फ़ैसले के पक्ष में अपनी बात रखते हुए कहते हैं, ''चूंकि सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है ऐसे में वो पूर्ण न्याय देने के लिए कोई भी फ़ैसला दे सकती है. कोर्ट को इस मामले में ये लगा होगा कि पहले ये आंदोलन ख़त्म हो जाए फिर इसकी संवैधानिकता के मामले को देखेंगे.''

क्या सुप्रीम कोर्ट ने वो कर दिया जो कहीं ना कहीं सरकार चाह रही थी?इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं कि ''सरकार ने बातचीत से हल ना निकलने की सूरत में मीडिया के ज़रिए ये बात कह दी कि सुप्रीम कोर्ट मामला हल करेगी''मुस्तफ़ा कहते हैं,''देखिए कोर्ट की चिंता इस बात को लेकर थी कि आंदोलन को कैसे ख़त्म किया जाए. हालांकि ये भी सच है कि कोर्ट के लिए ये सवाल नहीं होना चाहिए लेकिन जैसा कि कोर्ट ने अपनी सुनवाई में कहा था कि हम अपने हाथों में किसी के ख़ून के छींटे नहीं चाहते. ये दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट को ये डर था कि कहीं क़ानून-व्यवस्था की समस्या ना खड़ी हो जाए. इसलिए पहले आंदोलन ख़त्म करें फिर संवैधानिकता की कसौटी पर इसे कसा जाएगा. अक्सर कोर्ट ऐसा करती है.''

इसके उदाहरण में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मराठा आंदोलन का ज़िक्र करते हैं.दरअसल मराठा आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के उस अध्यादेश पर रोक लगा दी थी जिसके तहत मराठा लोगों को 16% आरक्षण देने की बात कही गई थी.हालांकि इस अध्यादेश पर रोक लगाने के पीछे इसकी संवैधानिक वैद्यता और आरक्षण से जुड़ा तकनीकी पक्ष था. ऐसे में ये उदाहरण वर्तमान परिस्थिति को समझने के लिए पेश किए जा रहे उदाहरण के तौर पर ज़्यादा फ़िट नहीं बैठता. headtopics.com

लेकिन फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मानते हैं कि ये एक अंतरिम ऑर्डर है जिसे कोर्ट ने फ़िलहाल के लिए रोक दिया है.'कृषि क़ानून को तो राज्यसभा से पारित ही नहीं किया गया'14वीं और 15वीं लोकसभा के महासचिव और क़ानून के जानकार पीडी थंकप्पन आचार्य इस क़ानून की संवैधानिकता पर सवालिया निशान लगाते हुए कहते हैं, ''इन क़ानूनों को तो राज्यसभा से पारित तक नहीं किया गया. संविधान का अनुच्छेद 100 कहता है कि कोई भी फ़ैसला सदन में वोटो के बहुमत के आधार पर किया जाएगा. बहुमत क्या है? बहुमत का अर्थ है नंबर और गिनती के बिना नंबर कैसे पता चलेगा. राज्यसभा में ध्वनि मत से बिल पास किया गया. आख़िर ध्वनि मत से नंबर कैसे तय किया गया. ये क़ानून तो इसी आधार पर ग़लत है. लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई बहस की ही नहीं."

वो आगे कहते हैं, "सरकार और किसान बातचीत कर ही रहे हैं और कोर्ट ने नई बॉडी को भी ला दिया, इससे कुछ होगा तो वो है कंफ्यूजन. इससे कुछ हल निकलेगा, कम से कम मुझे तो नज़र नहीं आ रहा है."इमेज स्रोत,Reutersआचार्य मानते हैं कि कोर्ट ने कई बातें अपने फ़ैसले में साफ़ नहीं की हैं.

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वो कहते हैं, ''ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कमेटी किसानों और सरकार से बातचीत करेगी लेकिन इसका आधार क्या होगा इसकी कोई जानकारी ही नहीं है. जो लोग किसानों के प्रदर्शन के ख़िलाफ़ बोल चुके हैं वो किसानों से क्या बात करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी नहीं बताया कि किस आधार पर ये चार लोग चुने गए. ऐसा लगता है कि सरकार ने इन नामों की लिस्ट कोर्ट को पकड़ा दी थी.''

''माना ये कमेटी किसानों से और सरकार से बात करके एक रिपोर्ट बनाए और अपने सुझावों वाली रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश करे तो क्या इस रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट इस क़ानून की संवैधानिक वैधता पर फ़ैसला लेगा? क्योंकि कुछ भी करने से पहले मामले की सुनवाई होनी चाहिए वो तो हुई नहीं. कुछ भी कोर्ट ने साफ़ नहीं किया है कि आख़िर एक ओर झुकी इस कमेटी के सुझाव का क्या होगा? ''

वो मानते हैं कि विधायिका के दायरे में दाख़िल होकर सुप्रीम कोर्ट वो करने जा रही है जो अब तक सरकारें करती थीं और वो है बातचीत का काम.उन्होंने कहा,"आमतौर पर कोर्ट ऐसे किसी भी फ़ैसले से पहले मामले की सुनवाई करती है. सभी पक्षों की बात सुनने के बाद अगर कोर्ट को ये लगता है कि रोक लगनी चाहिए तो वह ऐसा करती है, ये बेहद असाधारण है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई भी नहीं की और रोक का आदेश दे दिया."

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ye sab modi sarkar ki hi chal hai judiciary ko sat me leke kisano ke andolan ko kamjor karne ka kam kar rahi hai modi sarkar यदि केंद्र सरकार को यह लगता है कि सुप्रीम कोर्ट हमारे किसी बिल में रुकावट पैदा करता है तो सरकार के प्रवक्ता द्वारा यह कहां जाएगा लेकिन यदि आंदोलनकारी सुप्रीम कोर्ट की बात को नजरअंदाज करते हैं तो कौन किसान आंदोलन की बात को सुनेगा सुप्रीम कोर्ट सर्वोपरि है जिसकी बात सुनना ही पड़ेगा

supremecourtwithmodi खाना चबाकर खाये, पानी गरम पीये, अच्छी निंद ले, व्यायाम करे, पर राजनिती के चक्कर में ना पडे क्यूँकि 2024 में भी मोदी जी ही आयेंगे। It is all scripted. Indian Supreme Court has lost trust and credibility. वकील :- हिरणों को मांसाहारी जीवों से खतरा है मीलॉर्ड जज :- इनकी सुरक्षा का लिए 👉शेर की अध्यक्षता में चीता, बाघ और लोमड़ी की कमेटी बनाई जाए!!

No. पंजाब में अकालीदल स्व0 इंदिरा गांधी जी के हत्‍या का जिम्‍मेदार माना जाता है किंतु पंजाब में उनकी सरकार जनता ने बनायी, तमिलनाडु में डी0एम0के स्‍व0 राजीव गांधी की हत्‍या के लिये जिम्‍मेदार माना जाता है किंतु डी0एम0के0 ने तमिलनाडु में सरकार बनायी। Supreme Court has UNLIMITED Power. It is the single Institution of India, which has million times (UNLIMITED)more power, than what is mentioned in its 'Roles & Responsibility '. Basic purpose is to protect the theme LAW PREVAIL. No one is above the Law.

Saab Moh Maya Hai. 2014 ke baad Supreme Court apna Astitwa kho chuka hai. It's better to call this as Nagpur Court. Ek ek Rajya Sabha seat keliye judges apna iman bech rahe hain. Nahi SC ka aadesh sarkar ke kaam me dhakhal nahi hai kyuki sarkar he ab SC hai.. Face shaving hai sarkar ke liye. दखल? अरे वो तो सरकार का ही काम कर रहे हैं

100% KisanoKiMaanoDushyant अंतिम जीवद्रव्य-जन में! कोरोना से ज्यादा मौत भारत में- दुनिया में कोई शासन हो हत्या आत्महत्या सामूहिक आत्महत्या तभी होती नागरिक जान! मान लेता!! शासन नहीं करेगा काम नहीं देगा न्याय समाधान - मोदी जी किसान श्रमिक निवेशक उपभोक्ता में विशवास नहीं जगा सके; का यह प्रमाण! 💯% कौन गधा कह रहा? कानून की सरंक्षक है मा.सर्वोच्च न्यायपालिका! देश का किसान कड़ाके की ठंड में सड़क पर परिवार समेत बैठा है लेकिन ठग चायवाले narendramodi को अपने AC चैंबर सुइट से रटे-रटाएभाषण देने से फुर्सत न है? मा.CJI ने मानवता के नाते कानून स्थगित करके महानता का परिचय दिया है!

Haan हां Naaaa,,, srkaar ka kaam asaan krne ki taraf ek qadam h ....