कानपुर में 'भीम कथा' पर हुई हिंसा की पूरी कहानी

कानपुर: 'भीम कथा' पर दलितों और सवर्णों के बीच हिंसा- ग्राउंड रिपोर्ट

19.2.2020

कानपुर: 'भीम कथा' पर दलितों और सवर्णों के बीच हिंसा- ग्राउंड रिपोर्ट

पाँच दिन पहले दलितों और सवर्णों के बीच हुए संघर्ष में दलित समुदाय के 28 लोग बुरी तरह घायल हो गए.

कानपुर के उर्सला अस्पताल के वॉर्ड संख्या एक में क़रीब बीस महिलाएं अलग-अलग बिस्तरों पर लेटी हैं. महिलाओं के हाथ-पैर में बँधे प्लास्टर, सिर पर बँधी पट्टी, पीठ और पैरों पर डंडों के निशान और रह-रहकर निकल रहीं उनकी सिसकियां बता रही हैं कि उनके साथ क्या हुआ है. महिलाओं के साथ उनके परिजन भी हैं. कुछ लोग उनका हाल-चाल लेने आए हैं, कुछ पत्रकार ख़बर के मक़सद से वहां डटे हैं तो कुछ लोग संवेदना जताने भी पहुंचे हैं. ये सभी महिलाएं पड़ोसी ज़िले कानपुर देहात के मंगटा गाँव की हैं जहां चार दिन पहले दलितों और सवर्णों के बीच हुए संघर्ष में दलित समुदाय के 28 लोग बुरी तरह घायल हो गए. 20 महिलाओं और चार पुरुषों को कानपुर के उर्सला अस्पताल में भर्ती कराया गया है जबकि कुछ को कानपुर देहात के ज़िला अस्पताल में. इस मामले में दलितों की ओर से दी गई तहरीर के आधार पर पुलिस ने तीस लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द और कुछ अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है. इमेज कॉपीरइट samiratmaj mishra सबसे आगे साठ वर्षीया रजवंती देवी हैं. उनके दोनों हाथो में पट्टी बँधी है और दाहिने पैर में प्लास्टर बँधा है. पीठ पर चोट के इतने निशान हैं कि चमड़ी नीली पड़ गई है. अपनी आपबीती बयां करते-करते रजवंती देवी दर्द भूल जाती हैं और उनकी आंखों में ग़ुस्सा उतर आता है,"बाभन-ठाकुर जलन के मारे इतना पीट दिए हमें. हम लोग उनके भगवान को नहीं मानते. हम अपने यहां भीम भागवत कथा करा रहे थे और भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं, बस इसी बात से चिढ़ गए थे. पोस्टर फाड़ डाले, घरों में घुसकर मारने लगे और हमारे घरों में आग भी लगा दी." कानपुर देहात ज़िला मुख्यालय से क़रीब दस किमी दूर गजनेरा थाने के मंगटा गांव में दलित समुदाय के लोगों ने सात दिवसीय भीम कथा का आयोजन किया था. कथा आठ फ़रवरी को समाप्त हुई और उसके बाद 13 फ़रवरी को शोभा यात्रा निकाली गई. इस बीच, किसी बच्चे ने भीम कथा का पोस्टर कथित तौर पर फाड़ दिया. बस यहीं से दोनों के बीच टकराव हुआ और यह टकराव एकाएक हिंसक हो गया. कानपुर देहात के पुलिस अधीक्षक अनुराग वत्स बताते हैं,"दोनों समुदायों के बीच मन-मुटाव कथा के दौरान ही शुरू हो गया था लेकिन पुलिस को किसी ने कोई सूचना नहीं दी. पीड़ित पक्ष की शिकायत के आधार पर मुक़दमा दर्ज किया गया है. पीड़ितों को एक-एक लाख रुपए का मुआवाज़ा दिया गया है. हम लोगों ने दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश की है कि किसी के बहकावे में न आएं." इमेज कॉपीरइट samiratmaj mishra बताया जा रहा है कि घटना के दौरान दोनों पक्षों की ओर से पथराव हुआ और लाठी-डंडे चले. चोटिल ठाकुर समुदाय के लोग भी हैं लेकिन उनके परिजनों के मुताबिक़, वे सभी किसी 'सुरक्षित' जगह इलाज करा रहे हैं ताकि पुलिस उन्हें पकड़ न सके. अभियुक्तों के ख़िलाफ़ एससी-एसटी ऐक्ट समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया है. एसपी अनुराग वत्स के मुताबिक, 14 लोग गिरफ़्तार करके जेल भेजे जा चुके हैं. घटना के पाँच दिन बाद भी गांव में तनाव बना हुआ है और गांव में जगह-जगह पुलिस बल तैनात हैं. प्रशासनिक अधिकारी हर दिन सुबह से शाम तक दोनों पक्षों को यह समझाने में लगे हैं कि विवाद से कुछ हासिल नहीं होगा. पुलिस अधीक्षक अनुराग वत्स बीबीसी से बातचीत में कहते हैं,"दोनों पक्षों से बातचीत में ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि इनमें इस क़दर विवाद हुआ होगा. अभी भी दोनों एक-दूसरे से हमदर्दी रखते हैं और प्रेम से रहने की बात करते हैं. हम लोग यही समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि मिलजुल कर रहिए." मंगलवार को दोपहर में हम जब मंगटा गांव पहुंचे तो गद्दी यानी बड़े से मंदिर प्रांगण में कुछ स्थानीय नेता ठाकुर परिवारों के साथ बातचीत कर रहे थे जबकि वहां से कुछ दूर भैयालाल के घर पर एसडीएम आनंद कुमार और कुछ पुलिस अधिकारी पीड़ितों की बात सुन रहे थे और उन्हें मिले मुआवज़े की जानकारी दे रहे थे. उनके साथ कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों के लोग भी वहां मौजूद थे. भैयालाल के घर के एक हिस्से को कथित तौर पर ठाकुरों ने आग लगा दी थी. इमेज कॉपीरइट samiratmaj mishra ठाकुर परिवार के लोगों का आरोप है कि दलितों ने उनके घर की महिलाओं को मारा-पीटा और कई युवकों को भी घायल कर दिया. हालांकि वहां कोई भी घायल महिला नहीं मिली जबकि युवकों के बारे में बताया गया कि वो गिरफ़्तारी के डर से भाग गए हैं. बचोले सिंह का बेटा सचिन सिंह भी गिरफ़्तार लोगों में शामिल है. बचोले सिंह कहते हैं,"लड़ाई हो रही थी तो वो था भी नहीं लेकिन उसका नाम लिखा दिया गया और पुलिस उसे भी ले गई. सेना में भर्ती की तैयारी कर रहा था. बेटे की तो ज़िंदग़ी ही ख़राब हो जाएगी." पास में ही खड़े जयबीर सिंह घटना की मूल वजह बताने लगे,"भीम कथा से हमें कोई आपत्ति क्यों होगी लेकिन उस कथा के दौरान हिन्दू देवी-देवताओं के लिए जिस तरह के अपशब्दों और गंदे उदाहरणों को पेश किया जा रहा था वो बहुत आपत्तिजनक था." इमेज कॉपीरइट Image caption गांव के प्रधान बदलू राम गांव के प्रधान बदलू राम भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि आपत्तिजनक बातें कथा के दौरान हुई थीं लेकिन उनके मुताबिक, यह कथा कहने वाले महाराज ने नहीं बल्कि उस दौरान चलने वाले एक गाने में कहा जा रहा था. बदलू राम कहते हैं,"कथा के पांचवें दिन ठाकुरों के यहां शादी थी. वो लोग बोले कि लाउड स्पीकर की आवाज़ कम करा दो. आवाज़ कम भी करा दी गई लेकिन कुछ देर बाद आवाज़ फिर बढ़ा दी गई. इसी बात से वो लोग नाराज़ थे." भीम कथा मंगटा गांव में पहली बार हो रही थी लेकिन आस-पास के कई गांवों में यह पिछले कई साल से हो रही है. मंगटा गांव में भीम कथा कहने के लिए आचार्य सीतापुर से आए थे. दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर पहले हमला करने का आरोप लगा रहे हैं और दोनों की शिकायत है कि पुलिस उस वक़्त मौजूद थी और मूकदर्शक बनी थी. गांव के कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि भीम कथा के नाम पर कुछ बाहरी लोग दलित समुदाय को कथित तौर पर अगड़ी जातियों के ख़िलाफ़ भड़का रहे हैं. मामले में बाहरी तत्वों की भूमिका से एसपी और दूसरे प्रशासनिक अधिकारी भी इनकार नहीं करते हैं. दिलचस्प बात ये है कि जिस भीम कथा को लेकर दलितों और ठाकुरों के बीच इतना विवाद हुआ है, उसके लिए ठाकुरों ने भी चंदा दिया है. गांव के ही एक ठाकुर दीनानाथ तो ये तक कहते हैं,"प्रधानी के चुनाव में दलितों का वोट लेने के लिए ख़ुद ठाकुरों ने ही कथा कराई ताकि दलित उन्हें वोट दें. इस काम में गाँव के ही कुछ ठाकुर लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि ये मामला इतना बढ़ जाएगा और ख़ुद अपने लोग ही फँस जाएंगे." इमेज कॉपीरइट samiratmaj mishra क़रीब पांच हज़ार की आबादी वाले मंगटा गांव में दलितों और ठाकुरों की आबादी लगभग बराबर यानी क़रीब चालीस-चालीस फ़ीसद है. बाक़ी बीस फ़ीसद में ब्राह्मण, अति पिछड़ा वर्ग और अन्य लोग हैं. मौजूदा समय में यह पंचायत आरक्षित है लेकिन उम्मीद है कि अगली पंचवर्षीय योजना में यह अनारक्षित हो जाए. उसी को देखते हुए चुनावी तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं. एसपी अनुराग वत्स और एसडीएम आनंद कुमार भी विवाद के पीछे चुनावी कारण को नकारते नहीं हैं. पुलिस और प्रशासन के लोग दोनों पक्षों में सुलह-समझौते की भी कोशिश कर रहे हैं ताकि गांव में शांति बहाल हो सके. पुलिस का कहना है कि मामले की जांच पड़ताल की जा रही है, दोषियों को सज़ा दिलाई जाएगी और निर्दोष लोगों को प्रताड़ित नहीं किया जाएगा. लेकिन अभी पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह दबाव से कैसे निबटे? दबाव दोनों ओर से है. एक पक्ष का दबाव यह है कि जिन लोगों को इस मामले में ग़लत तरीक़े से गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें छोड़ दिया जाए जबकि दूसरा पक्ष इस बात का दबाव डाल रहा है कि बचे लोगों की गिरफ़्तारी जल्द हो. क्या है भीम कथा भीम कथा दलित समुदाय के बीच मुख्य रूप से भागवत कथा की तर्ज पर शुरू की गई है. यही वजह है कि गांव वाले इसे भागवत कथा भी कहते हैं. भागवत कथा की ही तरह इसका व्यापक पैमाने पर सात दिवसीय आयोजन किया जाता है और कथावाचक हर रोज़ तीन घंटे भीमराव आंबेडकर, महात्मा बुद्ध और दलित समुदाय से जुड़े दूसरे महापुरुषों की कहानियां और उनके जीवन संघर्षों की कथा कहते हैं. इमेज कॉपीरइट Getty Images धनीराम मंगटा गांव में हुई भीम कथा के प्रमुख आयोजकों में से एक थे. वो बताते हैं,"भगवान बुद्ध और महापुरुषों की कथा कहते हैं महराज जी इसमें. सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फुले, शाहूजी महराज, बाबा साहब, संत कबीर, भगवान रविदास, भगवान वाल्मीकि की कथा सुनाते हैं. समाज के लोग जो इनके बारे में कम जानते हैं, वो भी इनसे परिचित होते हैं. चूंकि हम इन महापुरुषों को भगवान मानते हैं तो इनकी आरती-पूजा भी करते हैं." कथा के दौरान इन्हीं महापुरुषों के जीवन-चरित पर आधारित कई गीत भी संगीत की धुनों पर गाए जाते हैं. कथावाचक कुछ गीत ख़ुद भी सुनाते हैं और कुछ रिकॉर्डेड गीत भी इस दौरान चलते रहते हैं. गांव वालों के मुताबिक, कथा के दौरान मुख्य रूप से गौतम बुद्ध और बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा या तस्वीरें रखी रहती हैं जिन पर फूल चढ़ाए जाते हैं और कभी-कभी उनकी आरती भी होती है. कथा के दौरान कुछ कथावाचक संविधान के बारे में भी जानकारी देते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी जगह कथा के दौरान एक ही तरह की रीति-रिवाज़ का पालन किया जाता है. देश भर में अब तक सैकड़ों जगह कथा सुना चुके कथावाचक प्रवीण भाई कहते हैं,"भीम कथा नाम से भ्रम होता है और इसे आडंबर से अलग करने के लिए हम लोग कथा के दौरान संगीत इत्यादि से दूर रहने पर ज़ोर दे रहे हैं. हम चाहते हैं कि समाज के लोगों के बीच पांच हज़ार साल से सताए गए दलितों के महापुरुषों का जीवन और उनका संघर्ष लोगों के सामने आए और लोग उनसे प्रेरणा लें और जागरूक बनें. लेकिन कुछ लोग इसमें उसी तरह आडंबर और प्रदर्शन करने लगे हैं जैसा कि भागवत कथा या फिर हिन्दू धर्म की अन्य कथाओं में होता है." (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप और पढो: BBC News Hindi

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Remove the caste system and caste word from CONSTITUTION.... Ye Sb Murkh Brahmno Ke Gulami Krnevale Hain. यह ठीक नही है।हमें एक-दुसरे की भावनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए।सामाजिक सद्भाव और समरसता बनायें रखना सभी की जिम्मेदारी है।जबतक हम इसी तरह लड़ते रहेंगे,तब तक हम हमारा और भावी पीढ़ी का नुकसान करते रहेंगे।अभी भी समय है,राम और भीम एक हो जाओ वरना बाद में पछताओगे।जयश्रीराम-जयभीम-जयहिन्द।

अरे रे रे क्या हालत बना दी यार रावण की बहुत कम कूटा है लोगों ने........😂😜 अभी तो दशहरा भी नही आया और रावण जलाने की तैयारी शुरू भी कर दी राजस्थान की जनता ने थोड़ा और कूटते तो अच्छा होता...😂😜 p_sahibsingh BJP4India Viral_SMS After all angrezon ki chal kaamyab hoti jaa rhi hai. Ek aur Hindu Muslim ho rha hai aur dusri aur Forward backward ho rha hai.

Thik h..jab log zidd per aajate Hain toh yahi anzaam hota hai. Main khud Apne logon ko smjhata hoon aur kehta hoon ki tm kissi ko v mano.mgar Hindu sabhyata, sanskriti aur Devi Devtawo ke baare me Yun Ulta seedha mat bolo kyunki jab aapko uska gyan nhi h toh niradar v nhi Karna. Jaane kb poori tarah dalito k samjh aayegi ki unhe sirf vote lene aur majority dikhane k liye Hindu mey ginte hai Manuwaadi BJP wale?

इस झगड़े की शुरुआत हमेशा दलित ही करते हैं, वो स्वर्णो को बुरा भला कहते हैं, सोशल मीडिया पर हजारों ऐसी तस्वीरे हैं जो हिन्दू देवीदेवताओं के खिलाफ है, स्वर्णो के तकलीफ देने वाली हैं, भारत में सबको अपने हिसाब से जीने का हक है लेकिन किसी को ठेस पहुंचने का नहीं पक्का स्वर्णो को गाली दिए होंगे, बुरा कहा होगा, क्युकि दलितों की मानसिकता है की वो स्वर्ण को गाली दे अपनी महफ़िल सजाते हैं, लेकिन यह नहीं जानते की गाली और बुरा कहना करना सबको आता है

अंग्रेज चलें गये पर ये काले अंग्रेजों 'फूट डालो और राज करो'की ब्रिटिश नीति से आज भी...!! क्यों अराजक माहौल चाहती है मोदी सरकार..! लगती नही ठीक नीयत आपकी narendramodi ji वाकई आजादी चाहिए संभ्रांतों से, कारपोरेट घरानों से परजीवी नेताओं से.. कट्टरपंथी तत्वों से इंकलाब ज़िन्दाबाद THIS IS RAM RAJAYA BHAI BEHNO BHUKTO

भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर को मुंबई के आजाद मैदान में रैली की अनुमति नहींनालायको उसका नाम आज़ाद नही, रावण है... नाम सही लिखा करो...😠😠😠😠😠😠😠 चंद्रशेखर रावण बहुत सही किया महाराष्ट्र सरकार ने इन जेसे रास्ते चलते छूटभीया नेताओ. को ज़ितनी छूट दी जाती हे उतने ही ये गलत काम जनता को भड़काने का करते हे ये केजरीवाल का दिल्ली नही हे जो भड़का सकोगे ये बाला साहेब की मुंबई हे यहाँ शिव का ही राज चलता हे आमची मुंबई जय महाराष्ट्र गरीबों की आवाज़ सिर्फ और सिर्फ आज़ाद कब तक रोकोंगे तूफान तो पहाड़ों से भी टकरा जाते हैं जय भीम जय भीम आर्मी

मुँह में राम बगल में नाथूराम ! बोलते है हिन्दुओ एक हो जाओ ! एक कैसे होंगे जब जाती आधारित भेदभाव होगा ! Bheem katha!! 🤣🤣🤣 Or ye bhimte humari kathao par question karte h अब बोलती बन्द

गुजरात: पीएम मोदी के गृह राज्य में सेना के जवान के घोड़ी चढ़ने पर बवालआरोप है कि अन्य समुदाय के एक समूह ने दूल्हे के घोड़े पर सवार होने पर इतनी नाराजगी जाहिर की पूरी बारात को ही टारगेट किया गया।

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19 फरवरी 2020, बुधवार समाचार

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