आज की पॉजिटिव खबर: लॉकडाउन में अनीश ने महिलाओं को गोबर से दीये और गमले बनाने की ट्रेनिंग दी, अब देशभर में इनके प्रोडक्ट की डिमांड

आज की पॉजिटिव खबर: लॉकडाउन में अनीश ने महिलाओं को गोबर से दीये और गमले बनाने की ट्रेनिंग दी, अब देशभर में इनके प्रोडक्ट की डिमांड #lockdown #inspirational

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06-12-2021 05:30:00

आज की पॉजिटिव खबर: लॉकडाउन में अनीश ने महिलाओं को गोबर से दीये और गमले बनाने की ट्रेनिंग दी, अब देशभर में इनके प्रोडक्ट की डिमांड lockdown inspirational

गांव की महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषों की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। क्योंकि ज्यादातर गांवों में खेती ही आमदनी का जरिया होता है और बहुत कम महिलाएं ही मजदूरी के लिए घर से निकल पाती हैं। शहर जाकर काम करना उनके लिए मुश्किल टास्क है। ऐसे में अगर उनके गांव में ही कमाई का अवसर मिल जाए तो इससे बेहतर क्या होगा। दिल्ली के रहने वाले अनीश शर्मा और उनकी पत्नी अल्का शर्मा ने ऐसी ही एक पहल की है। उन्होंने ... | Delhi's Anish, along with his wife, connected the poor women of the village with employment

गांव की महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषों की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। क्योंकि ज्यादातर गांवों में खेती ही आमदनी का जरिया होता है और बहुत कम महिलाएं ही मजदूरी के लिए घर से निकल पाती हैं। शहर जाकर काम करना उनके लिए मुश्किल टास्क है। ऐसे में अगर उनके गांव में ही कमाई का अवसर मिल जाए तो इससे बेहतर क्या होगा। दिल्ली के रहने वाले अनीश शर्मा और उनकी पत्नी अल्का शर्मा ने ऐसी ही एक पहल की है। उन्होंने यूपी के बागपत और उसके आसपास के क्षेत्रों में महिलाओं को ट्रेनिंग देकर रोजगार से जोड़ा है। ये महिलाएं वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार करने से लेकर गोबर से दीये और गमले बनाने का काम करती हैं। इससे इनकी अच्छी खासी कमाई हो जाती है।

35 साल के अनीश शर्मा एक बिजनेस फैमिली से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने MBA की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपना फैमिली बिजनेस जॉइन कर लिया। करीब 15 साल से वे अपना बिजनेस संभाल रहे हैं। जबकि उनकी पत्नी अल्का यूपी के बागपत की रहने वाली हैं और उनकी पढाई-लिखाई दिल्ली में हुई है।

अनीश की पत्नी अल्का यूपी के बागपत की रहने वाली हैं। वे महिलाओं को रोजगार मुहैया कराने के लिए उन्हें ट्रेनिंग देती हैं।भास्कर से बात करते हुए अनीश बताते हैं कि मैं तो दिल्ली शहर में ही पला बढ़ा, लेकिन शादी बाद हम रेगुलर बागपत जाने लगे। वहां बहुत करीब से गांव की लाइफ को देखने का मौका मिला। जबकि अल्का पहले से ही गांव की लाइफ से परिचित थी। हम दोनों अक्सर आपस में गांव की महिलाओं को लेकर चर्चा करते थे। हम चाहते थे कि गांव के लोगों के लिए कुछ किया जाए, खास करके महिलाओं के लिए। ताकि वे अपनी जरूरत की चीजों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहें। headtopics.com

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किराए पर जमीन ली, वर्मी कंपोस्ट का काम शुरू कियासाल 2018 में अनीश ने बागपत में अपने ससुराल पक्ष से किराए पर कुछ जमीन ली। इसके बाद तय किया कि वे वर्मी कंपोस्ट का काम करेंगे। शहरों में इसकी अच्छी खासी डिमांड है। अनीश कहते हैं कि हमने वर्मी कंपोस्ट की पूरी प्रोसेस समझी। हमें पता चला कि इसके लिए जिन चीजों की जरूरत होती हैं, वो सारी चीजें गांव में आसानी से मिल जाती हैं। इससे गांवों की महिलाओं को भी आमदनी का अवसर मिलेगा।

अनीश ने गांव में वर्मी कंपोस्ट फार्म तैयार किया है। खाद तैयार होने के बाद वे शहरों में इसकी मार्केटिंग करते हैं।इसके बाद अनीश ने गांव के कुछ लोगों को वर्मी कंपोस्ट तैयार करना सिखाया। फिर वे गांव की महिलाओं से ही गोबर खरीद कर खाद तैयार करने लगे। महीने-दो महीने बाद जो भी खाद निकलता वे ऑनलाइन उसकी मार्केटिंग करने लगे। थोड़े दिनों बाद रिस्पॉन्स भी अच्छा मिलने लगा और आमदनी निकलने लगी। यानी यह आइडिया सफल रहा। इससे गांव की महिलाओं को रेगुलर इनकम मिलने लगा। धीरे-धीरे गांव की दूसरी महिलाएं भी अनीश के साथ जुड़ती गईं। इस तरह करीब एक साल तक यह सिलसिला चलता रहा।

लॉकडाउन में महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू कियाअनीश कहते हैं कि कोरोना के दौरान शहरों के साथ-साथ गांवों के लोगों की लाइफ भी काफी प्रभावित हुई। लॉकडाउन की वजह से काम मिलना बंद हो गया। जो लोग बाहर काम करते थे, उनका भी काम बंद हो गया। बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन हुआ। ऐसे में ज्यादातर लोगों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। कई परिवारों के लिए तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो गया था। तब मेरी पत्नी ने सुझाव दिया कि सिर्फ गोबर खरीदने से नहीं होगा। गांव के लोगों की और महिलाओं की लाइफ तभी बेहतर होगी जब वे खुद कुछ कर पाएंगे।

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इस साल दिवाली के मौके पर इन महिलाओं द्वारा बनाए दीयों की खूब डिमांड रही। इससे इनकी अच्छी खासी कमाई हुई।दोनों पति-पत्नी इसको लेकर प्लानिंग करने लगे। इसी बीच उनकी मुलाकात पूजा पुरी से हुई। पूजा पेशे से वकील हैं और लंबे वक्त से सोशल वर्क करती रही हैं। तीनों ने मिलकर पीकेयू केयर फाउंडेशन नाम से एक NGO रजिस्टर किया। चूंकि गांव में गोबर की उपलब्धता भरपूर थी और ईको फ्रेंडली प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ रही थी। इसलिए उन लोगों ने गांव की महिलाओं को गोबर से दीया और गमले बनाने की ट्रेनिंग देना शुरू किया। धीरे-धीरे गांव की कई महिलाएं उनसे जुड़ती गई और दीये और गमले तैयार करने लगीं। headtopics.com

हर महिला 5-6 हजार रुपए महीना कमा रही हैअनीश कहते हैं कि हमने अपना ट्रेनिंग सेंटर गांव में ही रखा है। महिलाएं वही समूहों में काम करती हैं और गोबर से प्रोडक्ट बनाती हैं। इसके बाद हम सोशल मीडिया के जरिए देश भर में ऑनलाइन मार्केटिंग करते हैं। इस साल दिवाली में इन महिलाओं के बनाए दीये की अच्छी डिमांड रही। यूपी के साथ ही देश दूसरे हिस्सों में भी हमने दीये भेजे। इसके अलावा गोबर से बने गमलों की भी अच्छी डिमांड है। फिलहाल हमारे साथ नियमित रूप से 30 महिलाएं जुड़ी हैं। जो अपने हुनर से हर महीने 5-6 हजार रुपए कमा लेती हैं। पहले इन महिलाओं के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं था।

अनीश और उनकी पत्नी गांव की महिलाओं और लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड्स भी प्रोवाइड करती हैं।इसके अलावा ऐसे कई परिवार हैं जो हमें वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के लिए गोबर प्रोवाइड करते हैं। एक रुपए प्रति किलो के हिसाब से हम गोबर खरीदते हैं। इससे उन परिवारों को भी रेगुलर इनकम मिल जाती है। साथ ही अब जैसे-जैसे लोगों को हमारे काम के बारे में पता चल रहा है, दूसरे शहरों और राज्यों से भी लोग हमसे कॉन्टैक्ट कर रहे हैं। हम जल्द ही उन जगहों पर भी इसी तरह के प्रोजेक्ट शुरू करेंगे।

नो पॉलिटिक्स प्लीज

गोबर के दीये और गमले के अलावा अल्का अब महिलाओं को सिलाई-बुनाई और टेराकोटा ज्वेलरी बनाने की भी ट्रेनिंग दे रही हैं। इससे कई परिवारों को जीविका मिल रही है। साथ ही अनीश को भी अपना NGO चलाने में मदद मिल जाती है। हालांकि अभी ज्यादातर फंड वे CSR और खुद की सेविंग्स से ही खर्च कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि जल्द उनका काम को पहचान मिलेगी और मार्केटिंग बढ़ेगा। फिर बाहर से सपोर्ट की जरूरत नहीं पड़ेगी।

गरीब बच्चों को मुफ्त एजुकेशन, महिलाओं को मुफ्त सैनिटरी पैड्सअनीश बताते हैं कि अभी हमारे दो सेंटर्स पर 150 से अधिक बच्चे हैं। हमें इन्हें मुफ्त में पढ़ाते हैं और कंप्यूटर भी सिखाते हैं।अपने NGO के जरिए अनीश यूपी के बागपत के साथ ही दिल्ली और गाजियाबाद में महिलाओं को मुफ्त सैनिटरी पैड्स भी बांटते हैं। पिछले एक साल से वे यह काम कर रहे हैं। हर महीने 300 से ज्यादा महिलाओं को वे सैनिटरी पैड्स मुहैया कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने गरीब बच्चों के लिए मुफ्त एजुकेशन की मुहिम शुरू की है। उन्होंने अपने ट्रेनिंग सेंटर में इसकी व्यवस्था भी की है। जहां फिलहाल करीब 150 बच्चे पढ़ने आते हैं। बच्चों को स्कूली पढ़ाई के साथ ही कंप्यूटर भी सिखाया जाता है। आने वाले दिनों में वे देश के दूसरे हिस्सों में भी यह मुहिम शुरू करेंगे। headtopics.com

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