कोरोनिल: योग गुरु रामदेव की कंपनी पतंजलि की ‘कोरोना की दवाई’ का सच

  • नितिन श्रीवास्तव
  • बीबीसी संवाददाता
बाबा रामदेव

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कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया में दहशत फैला रखी है और सभी को इंतज़ार है, उस एक जाँची-परखी वैक्सीन या दवा का जो कोरोना वायरस से बचा जा सके.

भारत समेत दुनिया के कई देशों में उस एक दवा/वैक्सीन बनाने के दर्जनों क्लीनिकल ट्रायल जारी हैं.

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इसी बीच भारत की पतंजलि आयुर्वेद कंपनी का 'कोरोना को ठीक करने वाले इलाज' का दावा भी आया जिसे भारत सरकार ने फ़िलहाल 'ठंडे बस्ते' में डाल दिया और अब दावे की 'गहन जाँच' चल रही है.

पतंजलि ग्रुप पर इस 'दवा के नाम पर फ़्रॉड' करने के आरोप में चंद एफ़आईआर भी दर्ज हो चुकी हैं.

कोरोना किट

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कैसे होता है क्लीनिकल ट्रायल

मामले की पड़ताल से पहले ये समझना ज़रूरी है कि भारत में किसी दवा के क्लीनिकल ट्रायल के लिए क्या करना पड़ता है:

सबसे पहले ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया यानी डीजीसीआई (DGCI) की इजाज़त चाहिए.

इसके बाद उन सभी संस्थाओं की एथिक्स कमिटी की इजाज़त चाहिए जहाँ ये ट्रायल होंगे.

इसके बाद क्लीनिकल ट्रायल कराने वाली कंपनी को इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर (ICMR) की देख-रेख में चलाई जाने वाली 'क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री- इंडिया' यानी सीटीआरआई (CTRI) नाम की वेबसाइट पर ट्रायल से जुड़ी पूरी प्रक्रिया, संसाधन, नाम-पाते और फ़ंडिंग तक का लेखा-जोखा देना होता है.

बीबीसी हिन्दी के पास सीटीआरआई (CTRI) वेबसाइट पर रजिस्टर किए गए उस फ़ॉर्म (CTRI/2020/05/025273) की कॉपी है जिसमें पतंजलि रिसर्च इंस्टीच्यूट, हरिद्वार ने "कोरोना वायरस बीमारी के इलाज में आयुर्वेदिक दवाओं के असर" पर किए जाने वाले क्लीनिकल ट्रायल की हामी भरी है.

पतंजलि के ट्रायल फ़ॉर्म की कॉपी
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पतंजलि के ट्रायल फ़ॉर्म की कॉपी

इस दस्तावेज़ के मुताबिक़ पतंजलि रिसर्च इंस्टीच्यूट ने 20 मई, 2020 को सीटीआरआई (CTRI) वेबसाइट पर इसे रजिस्टर कराया था और इसमें लिखा है कि इस क्लीनिकल ट्रायल के लिए कोविड-19 के पहले मरीज़ का एनरोलमेंट 29 मई, 2020 को किया गया.

पतंजलि के ट्रायल फ़ॉर्म की दूसरी कॉपी
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पतंजलि के ट्रायल फ़ॉर्म की दूसरी कॉपी

क्लीनिकल ट्रायल की शुरुआत के सिर्फ़ 25 दिन बाद ही, 23 जून, 2020 को, योग गुरू बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि रिसर्च इंस्टीच्यूट ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में 'कोरोनिल टैबलेट' और 'श्वासारि वटी' नाम की दो दवाएं दुनिया के सामने पेश कीं.

पतंजलि के ट्रायल के फ़ॉर्म की तीसरी कॉपी
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पतंजलि के ट्रायल के फ़ॉर्म की तीसरी कॉपी

इस कार्यक्रम में पतंजलि का दावा था कि "इन दवाओं से कोविड-19 का इलाज किया जा सकेगा".

पतंजलि ने यह भी दावा किया कि उन्होंने इसका क्लीनिकल ट्रायल किया है और कोरोना संक्रमित लोगों पर इसका सौ फ़ीसद सकारात्मक असर हुआ है.

दावों से पलटा पतंजलि

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पतंजलि की इस घोषणा के कुछ घंटे बाद ही भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने इस पर संज्ञान लिया और कहा कि मंत्रालय को इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है.

पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को दवा का नाम और उसके घटक बताने के लिए कहा गया है.

पतंजलि से सैंपल साइज़, वो लैब या अस्पताल जहां टेस्ट किया गया और आचार समिति की मंज़ूरी समेत दूसरी महत्वपूर्ण जानकारियां भी देने को कहा गया है.

मंत्रालय ने फ़िलहाल पतंजलि की इस दवा के प्रचार-प्रसार पर रोक लगा दी है. हालाँकि बुधवार यानी 1 जुलाई को पतंजलि ने एक प्रेस विज्ञप्ति में एक नया दावा किया है.

इसके मुताबिक़, "आयुष मंत्रालय के निर्देशानुसार दिव्य कोरोनिल टैबलेट, दिव्य श्वासरि वटी और दिव्य अणु तेल, जिसे कि स्टेट लाइसेंस अथॉरिटी, आयुर्वेद-यूनानी सर्विसेस, उत्तराखंड सरकार से निर्माण एवं वितरण करने की जो पतंजलि को अनुमति मिली हुई है, उसके अनुरूप अब हम इसे सुचारू रूप से सम्पूर्ण भारत में निष्पादित कर सकते हैं."

कोविड-19 संक्रमण से 'रोगियों को मुक्त करा देने' वाले अपने पुराने दावे को न दोहराते हुए पतंजलि ने अब ये भी बताया है कि कैसे कुल 95 कोरोना मरीज़ों पर उनकी स्वेच्छा से ट्रायल किया गया, जिनमें 45 को पतंजलि की औषधि दी गई जबकि 50 को प्लेसेबो दिया गया.

विज्ञप्ति के अनुसार - "ये आयुर्वेदिक औषधियों का कोविड-19 पॉज़िटिव रोगियों पर किया गया पहला क्लीनिकल कंट्रोल ट्रायल था और अब हम इन औषधियों के मल्टीसेंट्रिक क्लीनिकल ट्रायल की दिशा में अग्रसर हैं."

इस सफ़ाई के एक दिन पहले यानी मंगलवार को पतंजलि ने इस बात पर यू-टर्न लेते हुए कहा था कि, "हमने कोरोना किट बनाने जैसा कोई दावा कभी नहीं किया".

बहरहाल, अभी भी कई सवालों के जवाब मिलने बाक़ी हैं.

बाबा रामदेव

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कौन-कौन से हैं सवाल

पहला ये कि इस दावे का क्या प्रमाण है कि कोरोना के जिन मरीज़ों को पतंजलि की आयुर्वेदिक औषधियाँ दी गईं उन सभी औषधियों की मात्रा हर लिहाज़ से बराबर थी.

जानकारों के मुताबिक़ जब भी किसी दवा का क्लीनिकल ट्रायल होता है तो उसमें दवा की मात्रा में परिवर्तन नहीं किया जा सकता.

मिसाल के तौर पर अगर किसी मरीज़ पर पैरासिटामॉल का ट्रायल बुख़ार उतारने के लिए हो रहा है तो सभी डोज़ एक सी होनी चाहिए, चाहे दवा में इसकी मात्रा 10 एमजी, 12 एमजी या 15 एमजी हो. फिर पता चलता है कि आख़िर बुखार किस डोज़ के लगातार लेने पर कम हुआ.

चूँकि पतंजलि का कहना है कि उनकी औषधि आयुर्वेदिक है तो इन औषधियों का फ़ॉर्म्युलेशन भी बराबर मात्रा में होना चाहिए.

इसी से जुड़ा दूसरा सवाल है कि क्या कोविड-19 के 95 मरीज़ों पर किए गए ट्रायल के आधार पर ये घोषणा करना सही था कि ये 'कोरोना का इलाज है' और आनन-फ़ानन में ही 130 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले देश में इसे लॉन्च भी कर दिया गया.

इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के पूर्व प्रमुख एनआरके गांगुली के मुताबिक़, "क्लीनिकल ट्रायल एक लंबी प्रक्रिया होती है और इस पर न सिर्फ़ दवाइयों के भविष्य का बल्कि उन मरीज़ों का भी भविष्य टिका होता है जिन पर ह्यूमन ट्रायल होते हैं."

पतंजलि रिसर्च सेंटर से अभी तक इस बात का जवाब नहीं मिल सका है कि सिर्फ़ 25 दिन के भीतर और सिर्फ़ 95 कोरोना मरीज़ों पर किए गए ट्रायल के आधार पर 'कोरोनिल टैबलेट' और 'श्वासारि वटी' नाम की दो दवाओं को कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी का 'आयुर्वेदिक इलाज' बताकर लॉन्च क्यों किया गया.

जबकि पतंजलि ने सीटीआरआई (CTRI) वेबसाइट पर रजिस्टर किए गए अपने फ़ॉर्म (CTRI/2020/05/025273) में लिख कर दिया था कि क्लीनिकल ट्रायल की अवधि दो महीने की होगी.

तीसरा सवाल उन हालातों पर हैं जिन पर कोरोना के मरीज़ों पर ट्रायल किए गए. पतंजलि का कहना है कि सभी 95 ट्रायल जयपुर के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च की देख रेख में हुए.

आईसीएमआर की सीटीआरआई (CTRI) वेबसाइट पर रजिस्टर करते समय पतंजलि आयुर्वेद ने कहा था वह अपने क्लीनिकल ट्रायल में कोरोना के 'मॉडरेटली सिम्पटोमैटिक' मरीज़ों को शामिल करेंगे, लेकिन ये नहीं किया गया.

'कोरोनिल' दवा के ट्रायल से जुड़े एक वरिष्ठ डॉक्टर ने नाम न लिए जाने की शर्त पर बीबीसी हिन्दी को बताया कि "ट्रायल में शामिल किए गए मरीज़ों की उम्र 35-45 थी और ज़्यादातर एसिम्पटोमैटिक (बिना लक्षण वाले) थे या उनमें बेहद हल्के सिम्प्टम थे."

योग गुरु रामदेव

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पतंजलि ने ट्रायल के बारे में क्यों नहीं बताया?

ग़ौर करने वाली एक और बात ये भी है कि इस ट्रायल में उन मरीज़ों को शामिल नहीं किया गया जिन्हें डायबिटीज़ या ब्लडप्रेशर की शिकायत रही है.

ये अहम इसलिए है क्योंकि डब्लूएचओ समेत दुनिया के बड़े मेडिकल विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों या इनमें से एक भी बीमारी से ग्रसित लोगों के लिए कोरोना ज़्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

जवाब इसका भी नहीं मिल सका है कि जिन मरीज़ों पर पतंजलि के क्लीनिकल ट्रायल हुए वो पहले से कौन सी दवाएँ ले रहे थे क्योंकि कोरोना संक्रमित मरीज़ों के इलाज के लिए आईसीएमआर ने दवाओं की सूची जारी कर रखी है.

ड्रग विशेषज्ञों का सवाल है कि अगर मरीज़ पहले से कोई ऐलोपैथिक दवा ले रहे थे तो फिर आयुर्वेदिक दवा के बाद किसका कितना असर हुआ ये कैसे नापा जा सकेगा.

जाने-माने पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट दिनेश ठाकुर ने भी पतंजलि के क्लीनिकल ट्रायल के नतीजों पर सवाल उठाते हुए कहा, "इतने कम मरीज़ों के ट्रायल के आधार पर आप कोरोना के इलाज का दावा कैसे कर सकते हैं".

आख़िर में सबसे अहम सवाल ये उठता है कि अगर पतंजलि रिसर्च इंस्टीच्यूट ने सीटीआरआई (CTRI) वेबसाइट पर मई महीने में रजिस्टर कर दिया था और कोरोना के मरीज़ों पर क्लीनिकल ट्रायल जारी थे तो फिर डीजीसीआई (DGCI) और आईसीएमआर (ICMR) को इस बात की जानकारी क्यों नहीं मिली कि किन मरीज़ों पर ट्रायल हुए.

भारत में कोरोना संक्रमण के सभी मामलों की लिस्ट न सिर्फ़ आईसीएमआर बल्कि राज्य के कोविड-19 नोडल अफ़सर, ज़िला प्रशासन और मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पास होती है.

हालाँकि पतंजलि की 'कोरोना किट' के मार्केट में लॉन्च होते ही आयुष मंत्रालय हरकत में आ गया था लेकिन इस बात पर सवाल उठने लाज़मी हैं कि आख़िर इस ट्रायल के नतीजों को लेकर पब्लिक में आने के पहले पतंजलि ने मंत्रालय की रज़ामंदी क्यों नहीं ली.

रहा सवाल किसी ऐसी दवा के ट्रायल का जो सीधे मार्केट में पहुँच सकती है तो ऐसे फ़ैसले लेने वाली संस्थानों से जुड़े लोगों को लगता है कि, "नियम-क़ानून अपनी जगह व्यवस्थित हैं और आगे भी रहेंगे".

आईसीएमआर के पूर्व महानिदेशक वीएम कटोच ने बताया, "सीटीआरआई में ड्रग ट्रायल के लिए रजिस्टर कराने का मक़सद एक ही है, सभी प्रोटोकॉल फ़ॉलो करिए. भारत की ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ़ इंडिया यानी डीजीसीआई (DGCI) ने इसे बाध्य किया है तो ऐसा सम्भव नहीं है कि कोई इसको लाँघ सके".

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